इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में एक हिन्दू लड़की सोनिका द्वारा मुस्लिम लड़के से शादी करने के मामले में अहम फैसला सुनाया है. सोनिका के पति अकबर ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर उसे सामने लाने की अदालत से गुहार लगाई थी. हाईकोर्ट में 22 सितंबर को पेश लड़की ने कहा कि बालिग होने के साथ उसने अपनी मर्जी से शादी की है और उसे पिता द्वारा घर में कैद करके रखा गया है. कोर्ट ने पति, सोनिका और उनके पिता की बात सुनने के बाद सोनिका को अपनी इच्छा के मुताबिक पति के साथ जिंदगी बिताने की आजादी दी.
गाजियाबाद का मामला
दरअसल, गाजियाबाद इंदिरापुरम इलाके की सोनिका चौहान ने अकबर खान से ईस्ट दिल्ली में स्पेशल मैरिज एक्ट में शादी कर ली थी. उस पर अपनी ही सोनिका को अगवा करने का आरोप लगा. फिर गुंडा एक्ट के तहत जिलाबदर की कार्रवाई हुई.आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों को साथ रहने की इजाजत दी है.
बालिग जोड़े पर कोई शर्त नहीं थोप सकते परिवार वाले
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए बालिग व्यक्तियों के निजी जीवन, स्वतंत्रता और विवाह के अधिकार को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों के अंतर्गत किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने और अपने तरीके से जीवन जीने का पूरा हक है. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी बालिग व्यक्ति का यह फैसला उसका नितांत व्यक्तिगत अधिकार है, जिसे माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों की इच्छाओं के आधार पर न तो नियंत्रित किया जा सकता है और न ही उस पर कोई शर्त थोपी जा सकती है. यह आदेश जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने गाजियाबाद की युवती द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.
इंदिरापुरम पुलिस ने लड़की को पेश किया था
हाईकोर्ट के 8 सितंबर के निर्देश के अनुपालन में मंगलवार को गाजियाबाद जिले के इंदिरापुरम थाने की पुलिस ने युवती को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया. अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता मुस्लिम युवक अकबर और पीड़ित लड़की सोनिका और उनके पिता से सीधे बातचीत की. बातचीत में 26 साल की ग्रेजुएट लड़की ने अदालत को बताया कि उसने 28 अगस्त 2022 को अपनी मर्जी, बिना किसी दबाव, डर या अनुचित प्रभाव के इस्लाम धर्म से जुड़े युवक के साथ विवाह किया था. उसने कोर्ट को जानकारी दी कि युवक को जीवनसाथी चुनने के कारण उसके पिता उसे लगातार डरा-धमका रहे हैं और उस पर दबाव बना रहे हैं. लेकिन वह अपने पति के साथ उसके ससुराल में रहना चाहती है.
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इस्लाम धर्म से शादी करने से अमान्य नहीं
युवती के पिता ने कोर्ट में दलील दी कि उनकी बेटी पर याचिकाकर्ता (पति) का अनुचित प्रभाव है और उसे ब्लैकमेल किया जा रहा है. उन्होंने शादी को मान्यता देने से इन्कार करते हुए कहा कि उनकी बेटी से शादी करने वाला युवक इस्लाम धर्म से. उनकी बेटी हिंदू धर्म से है इसलिए यह विवाह कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकता. उन्होंने यह भी दावा किया कि बेटी उनकी सहमति से उनके साथ रह रही है. दोनों पक्षों को सुनने और लड़की से प्रत्यक्ष बातचीत करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि युवती बालिग है और अपने फैसलों और उसके नतीजों को अच्छी तरह समझती है. कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि जिससे यह साबित हो सके कि वह किसी दबाव में काम कर रही है. अदालत ने टिप्पणी की कि बालिग होने के नाते हिंदू युवती द्वारा मुस्लिम युवक को अपने जीवनसाथी के तौर पर चुनना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है. इसका सम्मान और संरक्षण किया जाना आवश्यक है.
पुलिस सहायता देने का निर्देश
कोर्ट ने युवती को अपनी इच्छानुसार युवक के साथ रहने के लिए पूर्ण आजादी दे दी. हाईकोर्ट ने यूपी सरकार और संबंधित प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वो युवती और उसके पति की सुरक्षा सुनिश्चित करें. आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उनके स्थान तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पुलिस सहायता प्रदान करें. अदालत ने युवती के परिजनों को भी सख्त चेतावनी दी कि वो जोड़े के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न करें. इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार कर निस्तारित कर दिया.
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