- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है, जो सांता की लाल टोपी से जुड़ा है.
- कोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों को जबरन सांता की लाल टोपी नहीं पहनाई जा सकती है.
- आगरा से जुड़े एक मामले में यह टिप्पणी हाईकोर्ट की तरफ से की गई है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि कंपनियां कर्मचारियों को जबरन सांता क्लॉस की लाल टोपी नहीं पहना सकती हैं. हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक को अपने धर्म, आस्था और विश्वास का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता देती है. किसी भी कर्मचारी पर किसी विशेष धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक को थोप अनिवार्य करना उसकी व्यक्तिगत धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है. इससे इससे कार्यस्थल का शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण भी प्रभावित हो सकता है. कोर्ट ने माना कि यह किसी तरह अलग-अलग धर्मों और मान्यताओं के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा है. देश के लोकतांत्रिक सिस्टम में इस तरह की कार्रवाई की इजाजत नहीं है. देश में सब अपना धर्म मानने के लिए आजाद हैं, इसलिए उन पर कुछ भी थोपा नहीं जा सकता.
आगरा के शॉपिंग बाजार से जुड़ा है मामला
दरअसल, मामला आगरा के एक शॉपिंग बाजार से जुड़ा हुआ है, बाजार के सीनियर अधिकारियों पर आरोप लगा था कि उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को जबरन सांता क्लॉस की लाल टोपी पहनने के लिए निर्देश जारी किए और इसका प्रेशर भी बनाया. इससे कुछ कर्मचारियों की भावनाएं आहत हुई थी, जिसके बाद आगरा के सदर बाजार थाने में पुलिस शिकायत दर्ज कराई गई थी. यह एफआईआर बाजार के सीनियर मैनेजर विक्रम सिंह के खिलाफ दर्ज हुई थी. आगरा अदालत ने संज्ञान लेते हुए विक्रम सिंह को समन जारी किया था. जिसके बाद विक्रम सिंह ने हाईकोर्ट में इसको चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने रद्द किया था समन
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने मुख्य कानूनी तर्क यह दिया कि आईपीसी की धारा 298 और 504 दोनों ही गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आती हैं. कहा गया कि सीआरपीसी की धारा 2(d) के अनुसार यदि पुलिस जांच के बाद किसी गैर-संज्ञेय अपराध में चार्जशीट दाखिल करती है तो उसे पुलिस केस नहीं माना जा सकता बल्कि उसे 'शिकायत' (complaint) की तरह माना जाना चाहिए. हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस कानूनी तर्क को पूरी तरह स्वीकार किया. कोर्ट ने पाया कि आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने गैर-संज्ञेय अपराधों की चार्जशीट पर राज्य के मुकदमे के रूप में संज्ञान लेकर गंभीर कानूनी त्रुटि की है। इसी तकनीकी व प्रक्रियात्मक आधार पर हाईकोर्ट ने आवेदक विक्रम सिंह के खिलाफ आगरा के सीजेएम द्वारा दिसंबर 2023 में जारी किए गए समन आदेश को रद्द कर दिया.
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कोर्ट ने माना लाल टोपी पहनने का दबाव बनाया था
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस आदेश से ट्रायल कोर्ट की शक्तियों पर कोई रोक नहीं लगेगी, यदि कानून के अनुसार आवश्यक समझा जाए तो संबंधित अदालत इस मामले को एक 'शिकायत वाद' के रूप में मानकर आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रख सकती है. वहीं कानूनी प्रक्रियात्मक पहलू को स्पष्ट करने के साथ-साथ हाईकोर्ट ने इस मामले में प्रबंधन के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया. याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों का अवलोकन करते हुए कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साफ झलकता है कि वी बाजार के उच्च अधिकारियों ने कर्मचारियों पर सांता क्लॉस की टोपी पहनने का दबाव बनाया था.
अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी बाध्यता विभिन्न आस्थाओं और विश्वासों के लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाती है. अदालत ने याचिकाकर्ता और संस्थान के अन्य उच्च अधिकारियों को सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा कि वो भविष्य में कार्यस्थल पर इस प्रकार के निर्देश दोहराने से बचें जिससे कर्मचारियों के बीच का सौहार्दपूर्ण वातावरण बिगड़े. हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कानूनी आधार पर राहत दी लेकिन साथ ही संस्थानों को यह संदेश भी दिया कि वो अपने कर्मचारियों की धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमा का पूरा सम्मान करें.
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