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कैसे बदल रहा है वर्ल्ड ऑर्डर? क्या हो सकता है उसमें भारत का रोल? NDTV World Summit में शशि थरूर ने समझाया

NDTV World Summit 2026 के दूसरे दिन 'Demystifying a World Between Orders' विषय पर डॉ शशि थरूर ने पहले अपना लेक्चर दिया और फिर उन्होंने सवालों का जवाब दिया. इस सत्र में उन्होंने वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलावों और उनसे जुड़ी चुनौतियों पर अपने विचार रखे.

NDTV World Summit 2026 के मंच पर डॉ. शशि थरूर ने रखे अपने विचार

दुनिया में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. उनके साथ-साथ देशों के बीच रिश्ते भी बदल रहे हैं. सबसे बड़ा बात है कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है और उसके बीच भारत की भूमिका भी अहम होती जा रही है. सवाल उठ रहा है कि क्या दुनिया एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ रही है. इस बदलते दौर को कैसे समझा जाए और क्या भारत की विदेश नीति इस बदलाव के अनुरूप है. 22-23 अक्टूबर को हुए NDTV World Summit 2026 में कांग्रेस सांसद और विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष डॉ. शशि थरूर ने इन्हीं सवालों का जवाब दिया.

'Demystifying a World Between Orders' विषय पर सत्र में शशि थरूर ने अपना लेक्चर दिया और इस मुद्दे को समझाया. उनके अनुसार पिछले करीब आठ दशकों से हम दुनिया के मामलों को एक तय वैश्विक व्यवस्था के नजरिए से समझते आए हैं लेकिन अब कहानी अलग है.

कैसे बदल रहा ग्लोबल पावर का संतुलन

शशि थरूर ने NDTV वर्ल्ड समिट के मंच से अपने लेक्चर में बताया कि पहले शीत युद्ध के दौरान दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी. इसके बाद सोवियत संघ के टूटने के बाद एक ऐसा दौर आया, जब अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा. फिर वैश्वीकरण का दौर आया, जिसमें दुनिया के देश एक-दूसरे से तेजी से जुड़ते चले गए. उन्होंने कहा, "हर दौर में तनाव और विरोधाभास थे, लेकिन हर दौर के पीछे दुनिया को चलाने का एक तय तरीका भी था. आज उस तरीके को समझना बहुत मुश्किल हो गया है. दुनिया की पुरानी संस्थाएं नई परिस्थितियों से निपटने में संघर्ष कर रही हैं. दुनिया में ताकत का संतुलन इस तरह बदल रहा है, जिसकी कल्पना एक दशक पहले तक भी बहुत कम लोगों ने की होगी. दूसरे शब्दों में कहें तो हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां पुरानी मान्यताएं और भरोसे तेजी से खत्म हो रहे हैं, लेकिन उनकी जगह लेने के लिए नई मान्यताएं अभी तैयार नहीं हैं."

उन्होंने आगे बताया, "पुराना तंत्र से भरोसा तेजी से खत्म हो रहा है, लेकिन उसकी जगह नया तंत्र भरोसा नहीं बन पा रहा है. अमेरिका की ताकत अब भी बहुत बड़ी है, लेकिन वह इसका इस्तेमाल अनियमित तरीके से कर रहा है और दुनिया में उसके दबदबे को लगातार चुनौती मिल रही है. चीन आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक क्षेत्र में एक बड़ी प्रतिस्पर्धी ताकत बनकर उभरा है. रूस ने सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है. भारत समेत उभरती हुई ताकतें अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ा रही हैं. लेकिन यह सिर्फ एक बड़ी ताकत की जगह दूसरी ताकतों के आने की कहानी नहीं है. हम दुनिया में ताकत के बंटवारे में बदलाव देख रहे हैं, लेकिन इस बात पर सहमति नहीं है कि इस ताकत का इस्तेमाल किन नियमों के तहत किया जाना चाहिए."

शशि थरूर के अनुसार दुनिया में प्रभाव अब पहले से ज्यादा देशों के बीच बंट रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि देश आपस में ज्यादा सहयोग भी कर रहे हैं. उनके अनुसार "कई देशों की ताकत होना और देशों का मिलकर काम करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. दुनिया में ताकतवर देशों की संख्या बढ़ने से प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ सकती हैं. ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक ये देश ताकत के इस्तेमाल को सीमित करने वाले नियमों पर सहमत नहीं होते."

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भारत की विदेश नीति क्या इन बदलावों के अनुरूप है?

शशि थरूर के अनुसार भारत के लिए इस बदलती दुनिया में रास्ता निकालने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता को समझना जरूरी है. यह सिद्धांत हमारी विदेश नीति की परंपरा में गहराई से जुड़ा हुआ है. यही सिद्धांत है गुटनिरपेक्षता का. रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब अपना फैसला खुद लेना, किसी बड़े देश के दबाव में न आना.

शशि थरूर के अनुसार गुटनिरपेक्षता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता इस सोच से निकली थी कि एक नए आजाद हुए देश को अपनी जरूरतों और हितों को किसी प्रतिस्पर्धी महाशक्ति के अधीन नहीं करना चाहिए. न ही किसी दूसरे देश को यह तय करने देना चाहिए कि दुनिया में भारत का रुख क्या होगा. "यह सोच आज भी प्रासंगिक है, हालांकि परिस्थितियां बदल गई हैं."

शशि थरूर ने आगे कहा, "आज भारत के अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं. रूस के साथ उसके लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा संबंध रहे हैं. यूरोप के साथ उसके रिश्ते लगातार अहम हो रहे हैं. इसके अलावा एशिया, अफ्रीका और खाड़ी देशों के साथ भी भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध हैं. भारत क्वाड में शामिल है, लेकिन ब्रिक्स में भी सक्रिय है. गंभीर मतभेदों और सीमा से जुड़े अनसुलझे सवालों के बावजूद भारत चीन के साथ बातचीत और संबंध बनाए हुए है.ठ

शशि थरूर के अनुसार ये सभी रिश्ते हमेशा आसान नहीं होते और न ही ये पूरी तरह एक-दूसरे के अनुकूल हैं. "लेकिन कूटनीति का मतलब ऐसे दोस्तों को इकट्ठा करना नहीं है, जिनकी सोच और हित पूरी तरह एक जैसे हों. कूटनीति का असली मतलब अलग-अलग हितों के बीच तालमेल बैठाना और अपने फैसले खुद लेने की आजादी बनाए रखना है."

उनके अनुसार भारत के सामने चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि वह दूसरे देशों से यहां आने वाले निवेश को आकर्षित करे. असली चुनौती देश के भीतर ऐसी क्षमताएं विकसित करना है, जिससे हम दूसरे देशों में लिए गए फैसलों के कारण कम प्रभावित हों. उन्होंने कहा, "भारत को न तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की हर पुरानी विशेषता को बचाने की कोशिश करनी चाहिए और न ही दुनिया में बढ़ते बिखराव का जश्न मनाना चाहिए. हमारा काम अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है. लेकिन साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन, तकनीक के इस्तेमाल से जुड़े नियम, आर्थिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों का समाधान कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता."

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