चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों को लेकर सामने आई रिपोर्ट के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव आयोग से अधिक पारदर्शिता की मांग की है. उनका कहना है कि अगर आयोग के तीन में से दो सदस्यों ने किसी प्रक्रिया या फैसले पर आपत्ति जताई थी, तो आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उसे औपचारिक असहमति माना गया था या नहीं.
'EC हर बात साफ-साफ बताए'
NDTV को दिए इंटरव्यू में अशोक लवासा ने कहा कि मौजूदा रिपोर्टों से यह स्पष्ट नहीं है कि चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज आपत्तियां औपचारिक असहमति थीं या सिर्फ आंतरिक टिप्पणियां. लवासा ने कहा, 'अगर यह वास्तव में असहमति थी, तो चुनाव आयोग को तारीखों और पूरे विवरण के साथ सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना चाहिए.' उन्होंने सवाल उठाया कि अगर दो चुनाव आयुक्तों की राय अलग थी, तो फिर किसी फैसले को लागू कैसे किया गया. उनके मुताबिक, इस पूरे मामले में कई बातें स्पष्ट किए जाने की जरूरत है.
SIR के तीसरे चरण को रोकने की मांग
पूर्व चुनाव आयुक्त ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तीसरे चरण को भी रोकने की मांग की है. उन्होंने कहा कि वोटर मैपिंग, डेटा मिलान और अन्य तकनीकी पहलुओं को लेकर अभी भी पर्याप्त स्पष्टता नहीं है. लवासा ने कहा कि ऐसी स्थिति में तीसरे चरण को जारी रखना उचित नहीं होगा. उन्होंने कहा कि प्रक्रिया से जुड़ी कथित 'लॉजिकल दिक्कतों' और अन्य सवालों का पहले समाधान किया जाना चाहिए.
फॉर्म-6 में बदलाव पर भी सवाल
लवासा ने नए वोटर्स के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कथित बदलावों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना इस तरह के फॉर्म में बदलाव नहीं कर सकता. अगर कोई बदलाव किया गया है, तो आयोग को बताना चाहिए कि क्या इसके लिए जरूरी नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया था.
'नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल'
लवासा ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अपीलों के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में मामलों में वोटर्स के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे और बाद में उन्हें बहाल करना पड़ा. उन्होंने सुझाव दिया कि जिन लोगों के नाम गलती से हट गए हैं, उनके लिए आसान और समयबद्ध पुनर्बहाली व्यवस्था होनी चाहिए.
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि पिछले एक साल के दौरान लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे. आयोग ने कहा कि लिखित टिप्पणियां, सुझाव और तकनीकी नोट्स संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं. आयोग के मुताबिक, सभी निर्णय कानून और स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप लिए गए.
क्या है पूरा विवाद?
विवाद उस रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इनमें SIR प्रक्रिया और फॉर्म-6 से जुड़े फैसले भी शामिल बताए गए. इसी रिपोर्ट के बाद विपक्ष लगातार चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है. वहीं चुनाव आयोग और सरकार का कहना है कि सभी फैसले संस्थागत चर्चा के बाद सर्वसम्मति से लिए गए थे.
कौन हैं लावासा?
लावासा ने 2018 से 2020 तक चुनाव आयुक्त के रूप में काम किया और अपना कार्यकाल पूरा होने से दो साल पहले ही पद छोड़ दिया. 2019 के आम चुनाव के दौरान, उन्होंने चुनाव आयोग के कुछ फैसलों पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी. उनकी हालिया टिप्पणियों ने आंतरिक मतभेदों के साथ उनके पुराने अनुभव को फिर से चर्चा में ला दिया है, क्योंकि मौजूदा चुनाव आयुक्तों द्वारा जताई गई आपत्तियों की प्रकृति को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
यह भी पढ़ें: 'चुनाव आयोग का स्वतंत्र दिखना ही काफी नहीं', चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले कानून पर SC में उठे सवाल
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं