
हर भूकंप हमें उस नाजुक जमीन की याद दिलाता है, जिस पर हम खड़े हैं. चाहे वह दिल्ली-नोएडा का शहरी इलाका हो, हिमालय की ऊंची चोटियां हों, या फिर इसके पूर्वी छोर पर म्यांमार की पहाड़ियां. ये सभी क्षेत्र भूकंपीय गतिविधियों के लिए बेहद संवेदनशील हैं. शुक्रवार को म्यांमार के पास Sagaing Fault क्षेत्र में 7.7 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया. यह घटना एक बार फिर सवाल उठाती है कि आखिर इन इलाकों में बार-बार भूकंप क्यों आते हैं? आइए, इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों और इतिहास को विस्तार से समझते हैं.
हिमालय का निर्माण: दो विशाल प्लेटों की टक्कर
हिमालय की कहानी करीब 7 करोड़ साल पहले शुरू हुई, जब इंडियन प्लेट उत्तर की ओर बढ़ने लगी. यह प्लेट, जो कभी गोंडवानालैंड का हिस्सा थी, धीरे-धीरे यूरेशियन प्लेट की ओर खिसकती गई. लगभग 1 करोड़ साल पहले इन दोनों प्लेटों का टकराव हुआ. यह टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि जमीन ऊपर की ओर उभरने लगी और हिमालय जैसी विशाल पर्वत श्रृंखला का जन्म हुआ. यह प्रक्रिया महज एक घटना नहीं थी, बल्कि लाखों साल तक चली एक जटिल भूगर्भीय गतिविधि थी.
इस टकराव से पैदा हुए दबाव ने न केवल हिमालय को जन्म दिया, बल्कि आज भी यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय बना हुआ है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इंडियन प्लेट अभी भी यूरेशियन प्लेट के नीचे हर साल 4 से 5 मिलीमीटर की दर से खिसक रही है. इस खिसकाव के कारण हिमालय की ऊंचाई में भी इजाफा हो रहा है. लेकिन यही गतिविधि इस क्षेत्र में भूकंप का प्रमुख कारण भी है.

भूकंप का केंद्र: Sagaing Fault और उसका भूगोल
शुक्रवार को आया यह भूकंप म्यांमार के पास Sagaing Fault क्षेत्र में दर्ज किया गया. यह इलाका हिमालय के पूर्वी छोर पर स्थित है, जहां इंडियन प्लेट और यूरेशियन प्लेट का टकराव पार्श्व (लेटरल) रूप में होता है. अगर हम भूकंपीय मैप पर नजर डालें, तो कांगड़ा से लेकर उत्तराखंड, बिहार और शिलांग तक एक सेंट्रल साइज्मिक गैप दिखता है. यह वह क्षेत्र है, जहां प्लेटों के बीच लगातार दबाव बन रहा है, जो समय-समय पर भूकंप के रूप में बाहर निकलता है.

Sagaing Fault एक ट्रांसफॉर्म फॉल्ट है, जो इंडियन प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच की सीमा को चिह्नित करता है. इस क्षेत्र में इंडियन प्लेट हर साल 18 मिलीमीटर की दर से यूरेशियन प्लेट में घुस रही है. यह घुसपैठ दबाव पैदा करती है, जो फॉल्ट लाइन के साथ जमा होता है और अचानक रिलीज होने पर भूकंप का रूप ले लेता है. यह क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील है और इसका इतिहास भी इसकी गवाही देता है.

Sagaing Fault का भूकंपीय इतिहास
Sagaing Fault क्षेत्र भूकंपों के लिए कोई नया नाम नहीं है. बीते सौ सालों में यहां कई बड़े भूकंप आ चुके हैं. 1931 में 7.6 तीव्रता, 1946 में 7.5 तीव्रता, 1956 में 7.0 तीव्रता और 1991 में 7.3 तीव्रता के भूकंप इस क्षेत्र को हिला चुके हैं. 2003 में भी इसके आसपास के इलाकों में भूकंपीय हलचल देखी गई थी. शुक्रवार को आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने एक बार फिर इस क्षेत्र की भूकंपीय सक्रियता को रेखांकित किया है. इन भूकंपों का कारण यही प्लेटों का टकराव और उससे उत्पन्न दबाव है.

7.7 तीव्रता का भूकंप: कितना विनाशकारी?
भूकंप की तीव्रता को रिक्टर स्केल पर मापा जाता है, जो लॉगरिदमिक पैमाना है. इसका मतलब है कि तीव्रता में हर एक अंक का अंतर बहुत बड़ा प्रभाव डालता है. उदाहरण के लिए, 5 तीव्रता का भूकंप अगर आए, तो 6 तीव्रता का भूकंप उससे 10 गुना अधिक शक्तिशाली होता है. लेकिन ऊर्जा की बात करें, तो 6 तीव्रता वाला भूकंप 5 की तुलना में 32 गुना अधिक ऊर्जा रिलीज करता है. इसी तरह, 5 की तुलना में 7 तीव्रता का भूकंप 100 गुना अधिक शक्तिशाली और 1000 गुना अधिक ऊर्जा रिलीज करने वाला होता है.
7.7 तीव्रता का यह भूकंप इसी हिसाब से बेहद खतरनाक है. यह न केवल इमारतों को ढहाने की क्षमता रखता है, बल्कि बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान भी कर सकता है. खासकर ऐसे क्षेत्रों में, जहां भूकंपरोधी निर्माण मानकों का पालन कम होता है, इसका प्रभाव और भी विनाशकारी हो सकता है.
भारत और आसपास के क्षेत्रों पर प्रभाव
हालांकि यह भूकंप म्यांमार के पास आया, लेकिन इसकी गूंज भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, बिहार, और यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर तक महसूस की गई. हिमालय के भूकंपीय जोन में भारत का बड़ा हिस्सा आता है. जोन 4 और जोन 5 जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है. दिल्ली-एनसीआर, जो जोन 4 में आता है, भी इस खतरे से अछूता नहीं है.
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