- अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने दावा किया है कि SIR प्रोसेस में उनका एप्लीकेशन अधूरा दिखा रहा है.
- सुरजीत भल्ला IMF में भारत के कार्यकारी निदेशक और PM की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके हैं.
- उन्होंने कहा- कागजात सही होने के बाद भी दो बार लाइन में लगे, ECI नहीं बता पाया कमी क्या है.
चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रोसेस में अर्थशास्त्री और लेखक सुरजीत भल्ला का नाम कट गया. सुरजीत भल्ला IMF यानी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत के कार्यकारी निदेशक रह चुके हैं. वे मोदी सरकार में आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे हैं. फिलहाल वे 'हाउसहोल्ड इनकम सर्वे ऑफ इंडिया' के लिए बने टेक्निकल एक्सपर्ट ग्रुप के अध्यक्ष हैं. इसके बाद भी एसआईआर प्रोसेस के सिस्टम में उनका फॉर्म अधूरा दिखा रहा है. सुरजीत भल्ला राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हैं और पिछले 30 साल से वोट करते आए हैं.
सुरजीत भल्ला का दावा है कि उन्होंने एसआईआर प्रोसेस के दौरान कई बार अप्लाई किया. बीएलओ के पास दो बार लाइन में लगे. चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में नाम-एड्रेस सब कुछ सही है. डॉक्यूमेंटेशन में कोई गलती नहीं मिली. इसके बाद भी सिस्टम में फॉर्म अधूरा दिखा रहा है.
सुरजीत भल्ला लिखते हैं, "एसआईआर ने प्रोसेस पलट दिया है. 2002 में मौजूदा रोल को सही मानकर वेरिफिकेशन होता था लेकिन अब हर वोटर को नए सिरे से खुद को साबित करना पड़ रहा है. इससे 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट रोल से कट गए, जिनमें कितने असली वोटरों के नाम कटे, इसका हिसाब ही नहीं है."
एसआईआर का मकसद कुछ बुनियादी सवालों के जवाब तलाशना है. जैसे- "क्या वोटर का एड्रेस तो नहीं बदल गया? क्या उसके नाम की स्पेलिंग और उम्र गलत है? क्या वोटर अभी उसी पते पर रहता है, जो वोटर लिस्ट में दर्ज है?" एसआईर प्रोसेस में मौजूदा रिकॉर्ड की जांच होती है. अगर गलतियां होती हैं, तो सुधारा जाता है. और नया वोटर अपनी उम्र और एड्रेस का सबूत पेश करता है.
सुरजीत भल्ला सवाल उठाते हुए कहते हैं कि एक आसान और आम सी प्रक्रिया इतनी मुश्किल क्यों हो गई है कि लगातार कोशिशों के बाद भी मैं अपनी एप्लीकेशन को ठीक नहीं करवा पाया हूं? मेरा नाम नहीं बदला है. मेरा पता नहीं बदला है. मैं अभी जिंदा हूं. और मैंने वे सभी जरूरी काम किए हैं, जो मुझसे करने को कहा गया था.

सुरजीत भल्ला
"सबूत देने की जिम्मेदारी राज्य की..."
सुरजीत भल्ला एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए लिखते हैं, "किसी असली नागरिक का नाम हटाने से उसका वोट पक्के तौर पर छिन जाता है. वोटर लिस्ट में 'घोस्ट' नाम होने से नुकसान तभी होता है, जब कोई बूथ पर आकर उस शख्स के नाम पर वोट डाले. और इसके लिए पोलिंग एजेंट, अमिट स्याही और 'टेंडर्ड बैलेट' जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं. ज्यादा बड़ी गलती वोटिंग का अधिकार छिन जाना है. इसलिए सबूत देने की जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए. वोटर का नाम लिस्ट में तब तक बना रहना चाहिए, जब तक राज्य यह साबित न कर दे कि वह कहीं और चला गया है, मर गया या उसका नाम दो बार गिना गया है."
सुरजीत भल्ला लिखते हैं, "जब सारी जिम्मेदारी वोटर पर होती है, तो राज्य को अपनी गलतियों का हिसाब रखने की जरूरत नहीं पड़ती. किसी ने यह नहीं बताया कि कितने असली वोटरों के नाम गलत तरीके से हटाए गए. मुख्य चुनाव आयुक्त ने 12 राज्यों में 'जीरो अपीलट का हवाला देते हुए कहा है कि यह इस बात का सबूत है कि प्रक्रिया सही ढंग से काम कर रही थी. ऐसे में अपील को बहुत मुश्किल बना दिया गया."
सुरजीत भल्ला अपने स्कूल टाइम को याद करते हुए एक 1962 का क्लासमेट से जुड़ा एक वाकया साझा करते हैं. वे कहते हैं, "मेरे सहपाठी को सजा के तौर पर चिलचिलाती धूप में बाहर खड़ा किया गया था. उसने जोर से कहा था- 'कोई सवाल न पूछो, तो तुम्हें कोई झूठ नहीं बोला जाएगा.' वह उस जमाने का Gen-Z था. चौंसठ साल बाद, चुनाव आयोग ने इसी तरह बात न मानने या विरोध करने को अपनी पॉलिसी बना लिया है. इलेक्शन कमीशन मुझे यह नहीं बता पाया कि मेरी एप्लीकेशन में क्या कमी थी. फर्क बस इतना है कि मेरे सहपाठी को उसके किए गए किसी काम के लिए सजा दी जा रही थी."
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