- भारत का चुनाव आयोग एक रिपोर्ट सामने आने के बाद विवादों में हैं, CEC ज्ञानेश कुमार से विपक्ष सवाल कर रहा है
- इस रिपोर्ट में दावा- अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने कामकाज पर 10 महीनों में 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी
- गोवा में 97 वैध वोटरों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं जोड़े जा सके क्योंकि सॉफ्टवेयर तक पहुंच नहीं दी गई- रिपोर्ट
भारत का चुनाव आयोग सुर्खियों में है. अच्छी बातों के लिए नहीं, बल्कि विवादों को लेकर, बहुत ही संगीन आरोपों को लेकर. 23 सितंबर को एक रिपोर्ट सामने आती है और यह सवाल उठने लगता है कि क्या भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपनी मनमर्जी चला रहे हैं. क्या पूरे देश में निष्पक्ष चुनाव की जिम्मेदारी रखने वाले संस्थान में सही से काम नहीं हो रहा है. क्या देशभर के वोटरों के डेटा को दिल्ली से कंट्रोल किया जा रहा है. यह रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस की थी, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने संस्थान के अंदर के कामकाज पर 10 महीनों में 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी. अब पूरे देश में बहस छिड़ गई है.
चलिए आपको हम इस एक्सप्लेनर में एकदम आसान भाषा में बताते हैं कि चुनाव आयोग को लेकर क्या विवाद सामने आया है.
पहले बेसिक समझिए: भारत के चुनाव आयोग में कुल तीन चुनाव आयुक्त हैं, यानी इलेक्शन कमिश्नर. ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं. बाकी दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं. चुनाव आयोग सर्वसम्मति से या फिर बहुमत के आधार पर फैसला लेता है. मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई वीटो पावर नहीं है. वह सिर्फ एक समान रैंक वाले आयुक्तों में पहले हैं. लेकिन रिपोर्ट के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को छोड़कर बाकी के दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर आपत्ति दर्ज कराई हैं कि चुनाव आयोग में बिना उनकी मंजूरी या जानकारी के फैसले लिए जा रहे हैं या आदेश जारी किए जा रहे हैं.
चुनाव आयोग का कामकाज- यह 4 बड़े सवाल भी उठे
सवाल नंबर 1: नियम बदले बिना फॉर्म-6 में बदलाव क्यों किया गया?
पहले समझिए कि फॉर्म-6 क्या है. वोटर लिस्ट में नया नाम जुड़वाने और नया वोटर आईडी कार्ड बनवाने के लिए यह फॉर्म-6 भरना पड़ता है. अगर आप अपना एड्रेस बदलते हैं, तब भी चुनाव आयोग का यह फॉर्म बदलना पड़ता है. लेकिन जुलाई में सामने आया कि इस फॉर्म में एक ऐसा सवाल जोड़ दिया गया है जो पहले था ही नहीं. अब इस एप्लीकेशन को SIR से जोड़ दिया गया है. फॉर्म में यह पूछा गया कि क्या नया वोटर या उसके माता-पिता / दादा-दादी 'पिछली SIR की वोटर लिस्ट' में शामिल हैं. इसका जवाब नहीं दिया तो आपका नाम वोटर लिस्ट में नहीं जुड़ेगा.
अब इस रिपोर्ट से पता चला कि फॉर्म में बदलाव से पहले ही मई में चुनाव आयुक्त जोशी ने लेटर लिखकर चेतावनी दी थी कि सरकार द्वारा नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म 6 को इस तरह से नहीं बदला जा सकता. आयुक्त संधू भी इससे सहमत थे. फिर भी, यह बदलाव किया गया.
नोट- SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision यानी विशेष गहन पुनरीक्षण है. चुनाव आयोग का कहना है कि इसके जरिए देश की वोटर लिस्ट को पूरी तरह शुद्ध और अपडेट किया जा रहा है. दावा उन नामों को निकालने का भी है जो देश के असली वोटर नहीं हैं. जून 2025 में बिहार से शुरू हुई इस प्रक्रिया के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं.

सवाल नंबर 2: वोटर लिस्ट पर किसका कंट्रोल? स्थानीय अधिकारियों से पावर छीन ली गई
कानून कहता है कि हर चुनाव क्षेत्र की वोटर लिस्ट वहां के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ERO द्वारा तैयार और कंट्रोल की जाती है. आमतौर पर ERO सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट या SDM होता है. यह लिस्ट ERONet और उसके बाद आए ECINet सॉफ्टवेयर पर होती है. इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक साल में, दोनों आयुक्तों ने बार-बार यह सवाल उठाया है कि क्या अब ERO की इस लिस्ट तक पहुंच को सीमित किया जा रहा है. आरोप है कि अब दिल्ली में चुनाव आयोग का IT डिपार्टमेंट यह तय कर रहा है कि स्थानीय अधिकारी (ERO) इस सॉफ्टवेयर पर क्या कर सकते हैं.
अपनी आपत्तियों में चुनाव आयुक्त संधू ने इस बात की ओर इशारा किया कि चुनाव आयोग की IT डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना के पास कानूनी अधिकारियों को कानून के तहत मिली सही और पूरी पहुंच और काम करने की आजादी को रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
सवाल नंबर 3- बंगाल में चुनाव आयोग की ओर से अपील किसने की?
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ था. वोटर लिस्ट से नाम हटाने के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में दखल दिया और 60 लाख वोटरों के मामलों की जांच न्यायिक अधिकारियों को दी. बाद में आयोग ने 27 लाख नाम हटा दिए. इसके बाद कोर्ट ने रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों के ट्रिब्यूनल को उन फैसलों के खिलाफ अपील सुनने का आदेश दिया. इन फैसलों के खिलाफ 38 लाख अपील लंबित हैं, जिनमें 22.21 लाख हटाए गए वोटरों ने नाम वापस जोड़ने की मांग की है. बाकी 16.10 लाख अपील ऐसे वोटरों के खिलाफ हैं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने लिस्ट में शामिल किया था.
आयोग ने यह नहीं बताया कि लिस्ट में शामिल किए गए वोटरों के खिलाफ 16 लाख से अधिक अपील किसने दाखिल की. इसी पर आयुक्त संधू ने सवाल उठाया कि आयोग की ओर से ये अपील किसने और किसकी अनुमति से दाखिल की. आयुक्त को खुद पता नहीं था.
सवाल नंबर 4- गोवा के उन 97 वोटरों का हक किसने मारा?
सेंट्रलाइजेशन की इसी समस्या के कारण गोवा में वैध वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर रह गए. गोवा में ERO ने पहले की लिस्ट से हटाए गए 97 वोटरों को सही पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में इन नामों को दोबारा जोड़ने का विकल्प नहीं था. रिपोर्ट के अनुसार 11 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के ऑफिस ने इन वोटरों का नाम वापस जोड़ने के लिए 8 बार चुनाव आयोग के सीनियर अधिकारी को लेटर लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. नतीजा यह हुआ कि 97 वोटरों के नाम फाइनल वोटर लिस्ट में नहीं आ सके. यह मामला सिर्फ 97 वोटरों का नहीं. लोकतंत्र का तकाजा है कि हर सही वोट को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है.
विपक्ष क्या कह रहा है?
यह रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने मुख्य आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई की मांग की है. एक तरफ तो कुछ नेताओं ने मांग की कि आगे आने वाले चुनाव ज्ञानेश कुमार की निगरानी में न हों, वहीं दूसरों ने उन्हें हटाने, गिरफ्तार करने या हालिया चुनावों की समीक्षा करने की मांग की. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस रिपोर्ट पर अपना रिएक्शन देते हुए कथित "वोट चोरी" को भारत की जनता के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला बताया है. एक वीडियो जारी करके राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से कहा, “मैं चुनाव आयोग और चुनाव अधिकारियों से साफ-साफ कह रहा हूं- आप जो कर रहे हैं, वह गलत है. यह देशद्रोह है, यह देश के खिलाफ है. यह बात न भूलें. वह समय आएगा! हम आपको पकड़ेंगे! आपको बख्शा नहीं जाएगा.”
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने कहा कि यह हमारे संविधान और लोकतंत्र के लिए खतरा है. AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और उन पर मुकदमा चलाने की मांग की, साथ ही दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में हाल ही में हुए चुनावों को रद्द करके दोबारा कराने की भी मांग की. ऐसी ही मांग ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे ने की है.
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