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विपक्ष मांग रहा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी, यह कानूनी रूप से संभव क्यों नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को CJI के पास भेज दिया है. जानिए इस कानून में ऐसा क्या है जो मुख्य चुनाव आयुक्त को गिरफ्तारी से बचाता है.

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की फाइल फोटो
  • एक रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमलावर, उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रहा
  • विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है लेकिन कानूनी तौर पर 2023 के कानून के तहत यह संभव नहीं
  • सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के चुनाव आयुक्त कानी को चुनौती देने वाली याचिकाओं को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया है

23 सितंबर की सुबह एक बड़ी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट सामने आती है और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया पर आम जनों तक सरगर्मी बढ़ जाती है. मामला चुनाव आयोग से जुड़ा था जिसपर भारत में निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने की जिम्मेदारी है. इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने इस रिपोर्ट में दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग के उन कई फैसलों पर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई जो कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे. 10 महीनों में 14 बार ऐसी आपत्ति दर्ज कराई गई. 

मामला संगीन और आरोप बड़ा. चुनाव आयोग में 3 आयुक्त हैं. आयुक्त माने कमिश्नर. यहां फैसला बहुमत के आधार पर होता है. लेकिन अगर तीन में से दो चुनाव आयुक्त असहमत थे तो फिर फैसले कैसे लिए गए. क्या वे गैरकानूनी नहीं होंगे. यही सवाल विपक्ष उठा रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है. लेकिन सवाल है कि क्या यह कानूनी रूप से संभव भी है?

2023 में बदला कानून 

2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कानून में बदलाव किया गया था. इस नए कानून का नाम है- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023. जब यह कानून संसद से पास हुआ था तब भी इसपर जमकर विवाद हुआ था. अब इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद यह कानून फिर से विवादों में है. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने बुधवार को इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को चीफ जस्टिस (CJI) के पास भेज दिया. अब इन याचिकाओं को CJI के पास इसलिए भेजा गया है ताकि वे संविधान पीठ (जिसमें कम से कम पांच जज होते हैं) के गठन पर विचार कर सकें.

2023 के इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में भारत के चीफ जस्टिस (CJI) को शामिल नहीं किया गया है. पहले चुनाव आयुक्त के चुनाव करने वाले पैनल में पीएम, चीफ जस्टिस और नेपा प्रतिपक्ष शामिल होते थे. 2023 के कानून में चीफ जस्टिस को हटाकर प्रधान मंत्री द्वारा नॉमिनेट एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को जगह दे दिया गया. यानी बहुमत अब सरकार के पास है और विपक्ष ने इसपर खूब सवाल उठाए थे.

2023 के कानून से कैसे मिली मुख्य चुनाव आयुक्त को सुरक्षा

इस कानून में एक ऐसा सेक्शन भी है जो मौजूदा और पूर्व, दोनों चुनाव आयुक्तों को गिरफ्तारी से बचाता है. इस कानून के अनुसार चुनाव आयुक्तों पर उनके आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों (ऑफिसियल ड्यूटी) के दौरान किए गए किसी भी काम या कही गई बात के लिए कोई क्रिमिनल केस नहीं चलाया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि यह इम्युनिटी पहले भी थी. 1991 से 2023 तक चुनाव आयुक्तों से जुड़े कानून में सुरक्षा का ऐसा कोई प्रावधान नहीं था. यहां तक कि जब 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में नया चुनाव आयुक्त बिल पहली बार पेश किया गया, तो उस बिल में भी यह सुरक्षा (इम्युनिटी) शामिल नहीं थी.

इसे बाद में जोड़ा गया था. 12 दिसंबर 2023 को सरकार ने इस कानून में एक नया क्लॉज 15A जोड़ने के लिए संशोधन पेश किया और इस संशोधन को संसद से मंजूरी मिल गई. इस तरह यह कानूनी सुरक्षा 2023 के कानून का सेक्शन 16 बन गया. अब अगर विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी की मांग कर भी रहा है तो वह कानूनी रूप से संभव नहीं है. उन्होंने पद पर रहते हुए जो भी फैसले लिए हों, 2023 के कानून का सेक्शन 16 उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है.

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