चुनाव आयोग के भीतर हाल के महीनों में कई अहम मुद्दों को लेकर मतभेद सामने आए. इनमें वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने वाले फॉर्म-6 में बदलाव, ECINet प्लेटफॉर्म का केंद्रीकरण और पश्चिम बंगाल में लंबित 34 लाख मामलों को लेकर किए गए फैसले शामिल हैं. कुछ मामलों में चुनाव आयुक्तों ने प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर आपत्तियां दर्ज कराईं.
फॉर्म-6 में बदलाव पर मतभेद
फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है. हाल ही में चुनाव आयोग ने इस फॉर्म में एक नया हिस्सा जोड़ा, जिसमें आवेदकों से उनके माता-पिता की जानकारी मांगी जाने लगी. इसके तहत पूछा जा रहा है कि पिछले SIR में माता-पिता का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज था या नहीं. सूत्रों के मुताबिक, इस बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के भीतर पूरी सहमति नहीं थी. आपत्ति यह भी थी कि ऐसे बदलाव के लिए फॉर्म में औपचारिक संशोधन और गजट नोटिफिकेशन जरूरी था.
ECINet और ERO के अधिकारों पर सवाल
एक अन्य विवाद ECINet प्लेटफॉर्म को लेकर सामने आया. ERO यानी इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर वह अधिकारी होता है जो वोटर लिस्ट तैयार करने और मतदाताओं के दावों एवं आपत्तियों पर फैसला लेने का काम करता है. आमतौर पर हर विधानसभा क्षेत्र में SDM स्तर का अधिकारी ERO की भूमिका निभाता है. पहले वोटर सूची से जुड़े काम ERO-Net सॉफ्टवेयर के जरिए किए जाते थे. लेकिन 22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINet लॉन्च किया, जिसमें 40 से ज्यादा ऐप और पोर्टल को एक प्लेटफॉर्म पर एकीकृत किया गया.
सूत्रों के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस सिस्टम को लेकर सवाल उठाए. उनका कहना था कि ERO को वोटर लिस्ट से जुड़े कामों में पहले जैसी स्वतंत्र पहुंच नहीं मिल रही थी और अधिकारी वही कार्रवाई कर पा रहे थे, जिसकी अनुमति सॉफ्टवेयर देता था.
बताया जाता है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू पहले से ही इस पर आपत्ति जता रहे थे. उनकी आपत्तियों के बावजूद ECINet लॉन्च किया गया. अप्रैल 2026 में संधू ने नए मॉड्यूल और पोर्टल को लेकर पत्र लिखा और कहा कि इन बदलावों की जानकारी न तो उन्हें दी गई और न ही आयोग के समक्ष रखी गई. इसके बाद मई 2026 में दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी इस मुद्दे पर अपनी आपत्तियां पत्र के माध्यम से दर्ज कराईं.
पश्चिम बंगाल के 34 लाख मामलों पर भी उठे सवाल
पश्चिम बंगाल में ट्राइब्यूनल के समक्ष लंबित करीब 34 लाख मामलों को लेकर भी आयोग के भीतर मतभेद सामने आए. सूत्रों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस मामले में सवाल उठाया कि आयोग की ओर से संबंधित कार्रवाई के लिए किस अधिकारी को और किसके आदेश पर अधिकृत किया गया था. उन्होंने यह भी लिखा कि पश्चिम बंगाल की मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नीलम मीणा को इस संबंध में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई थी.
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