दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनाव में NSUI की हार के बाद कांग्रेस में बैचेनी है. राहुल गांधी नाराज बताए जा रहे हैं और यह भी कहा जा रहा है उन्होंने इस हार पर एक विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है. जाहिर है जब छात्रों की गूंज को लेकर जब राहुल गांधी अलग-अलग शहरों में जा रहे हैं, छात्रों की बातें कर कहे हैं, ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में एनएसयूआई की हार अपने आप में काफी कुछ कहती है. कांग्रेस के एक नेता ने निजी बातचीत में बताया कि ये तो अच्छा हुआ कि दिल्ली में छात्रों की गूंज का प्रोग्राम दिल्ली में नहीं किया. हालांकि उनका यह भी कहना था कि इससे हम जीत भी सकते थे.
कांग्रेस दफ्तर में DU चुनाव की चर्चा
इतना तो जरूर है कि आजकल कांग्रेस दफ्तर में दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव की ही चर्चा है और अब एक बलि का बकरा भी तलाश किया जा रहा है जिसके माथे पर इस हार का ठीकरा फोड़ा जाए.
क्या कह रही पार्टी?
वैसे कांग्रेस आलाकमान का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव एनएसयूआई जाति समीकरण के वजह से हारी है. एनएसयूआई का उम्मीदवार अध्यक्ष पद पर इसलिए नहीं लड़ना चाहता था कि उसी की जाति का उम्मीदवार एबीवीपी से लड़ रहा था. कांग्रेस आलाकमान इस बात से खुश हैं कि उन्होंने एक प्रयोग के तौर पर अध्यक्ष पद पर विजय शंकर मीणा को चुनाव लड़ाया जिसकी दिल्ली विश्वविद्यालय में संख्या नगण्य के बराबर है. लेकिन इसके बावजूद उसे 22523 वोट मिले और जीत का अंतर केवल 2053 वोटों का ही रहा.
Gen-Z आंदोलन के बाद इस चुनाव पर थी सबकी निगाहें
दरअसल दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए Gen-Z आंदोलन के बाद सबकी निगाहें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव पर थीं. सबको लगता था कि यह चुनाव एनएसयूआई के लिए आसान होगा मगर उम्मीद से उल्टे नतीजे ने सबको हैरत में डाल दिया. इससे भी हैरत की बात है कि कांग्रेस अभी भी इसे अपनी हार की तरह नहीं देख रही है. उसे लगता है कि उम्मीदवार के गलत चयन और गलत आकलन की वजह से उनकी हार हुई है. कोई भी इस पर ऑन रिकॉर्ड पर नहीं बोल रहा है मगर साथ में इस बात से भी इंकार नहीं कर रहे हैं कि मौका चूक गए, माहौल तो राहुल गांधी ने सही बनाया था.
लेकिन चुनाव का संचालन करने वाले नेताओं ने सही ढंग से काम नहीं किया. यही नाराजगी राहुल गांधी को भी होगी क्योंकि उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर गया. फिर सवाल ये भी उठता है कि क्या राहुल गांधी को इस चुनाव से पहले दिल्ली में छात्रों की गूंज क्यों नहीं की. यदि वो दिल्ली से बाहर पांच शहरों में जा सकते हैं तो उनको दिल्ली में भी ये प्रोग्राम करना चाहिए था.
दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में हार के बाद कुछ नेताओं पर गाज गिरनी तय है. दूसरी बात ये भी उभर कर आ रही है कि एकाध सीट पर क्या कांग्रेस को गठबंधन में जाना चाहिए था. क्या यही आज की राजनीति की सच्चाई है. चाहे वो विश्वविद्यालय का चुनाव हो या फिर विधानसभा या लोकसभा का.
कांग्रेस के आलाकमान की मानें तो राहुल गांधी की छात्रों की गूंज अभी जारी रहेगी और वे युवाओं से संवाद जारी रखेंगे. इतना जरूर है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव से उन्हें सीख मिली है कि किसी भी चुनाव को हल्के में लेने या कुछ ही नेताओं के हाथों में छोड़ना नहीं चाहिए. हर चुनाव की मोनिटरिंग उच्चतम स्तर पर करने की जरूरत है. जाहिर है कि सबको इंतजार रहेगा कि राहुल गांधी के पास हार की समीक्षा रिपोर्ट कब पहुंचती है और उस पर वो क्या कार्रवाई करते हैं. कहीं ऐसा ना हो कि ये भी आई गई बात हो कर रह जाए.
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