- जंतर-मंतर में जेन Z के विरोध-प्रदर्शन को ढाका, कोलंबो और काठमांडू की घटनाओं से जोड़ना गलत समझ का नतीजा है
- CJP आंदोलन की शुरुआत एक ऑनलाइन मीम से हुई थी, जिसे पेशेवर एक्टिविस्टों ने व्यापक रूप दिया था
- NEET विरोधों में आत्महत्या की संख्या सांख्यिकीय अनुमान से कम है, जो सामाजिक संकट को झूठा साबित करती है
Delhi Protest: जंतर-मंतर में जेन Z के विरोध-प्रदर्शनों की छवि दुनिया भर में गलत तरीके से बनी है. हैरानी इस बात की है भारत में इसे गलत तरीके से समझा गया. इसे ढाका, कोलंबो और काठमांडू की घटनाओं से प्रेरित माना गया. NDTV को दिए एक इंटरव्यू में, सिडनी यूनिवर्सिटी में कार्यरत अमेरिकी मूल के पॉलिटिकल साइंटिस्ट साल्वाटोर बाबोनस ने कहा कि इस तरह की तुलना करना पूरी तरह से गलत नजरिया है.

Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
NDTV से बात करते हुए, बाबोनस ने सबसे पहले इस आंदोलन की शुरुआत के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि CJP आंदोलन कभी भी छात्रों का कोई स्वाभाविक विद्रोह नहीं था, जैसा कि दूसरी जगहों पर ऐसे आंदोलन होते रहे हैं. इसकी शुरुआत एक ऑनलाइन मीम के तौर पर हुई थी और इसके बड़े पैमाने ने इसे कुछ खास तरह के लोगों के लिए इसे बहुत आकर्षक बना दिया. पेशेवर देशी-विदेशी एक्टिविस्टों ने दो करोड़ फॉलोअर्स वाले इस मीम में एक मौका देखा और तुरंत इससे जुड़ गए.

बाबोनस ने NDTV को बताया कि ग्रेटा थनबर्ग का ऐसे विरोध-प्रदर्शन को समर्थन देना उनके काम के दायरे से पूरी तरह बाहर था. ये कोई अजीब बात नहीं थी, बल्कि इसी पैटर्न का एक उदाहरण था. यानी अपनी अहमियत बनाने के बजाय, पहले से मौजूद अहमियत को हथियाने की होड़. बाबोनस का तर्क था कि यह सोच एक बड़ी और ज्यादा बुनियादी चीज का हिस्सा है. वो चीज है पश्चिमी मीडिया की ऐसी कहानियों की चाहत जो भारत (और साथ ही हिंदुओं और हिंदू राजनीतिक नेतृत्व) को बुरी छवि में दिखाती हैं. उन्होंने इसकी सीधी तुलना इजरायल-विरोधी एक्टिविज्म के ढांचे से की, जहां ऐसे समूह और लोग (जिनका इजरायल-गाजा के मुद्दे से कोई ठोस लेना-देना नहीं होता) फिर भी एकजुट हो जाते हैं; वे विशेषज्ञता के बजाय विचारधारा की सुविधा से प्रेरित होते हैं. उन्होंने बताया कि इसमें शामिल संगठन अक्सर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. और उनके तरीके भी एक जैसे ही होते हैं.

NDTV को बाबोनस ने बताया कि ये आंकड़े दिखाते हैं कि इस मामले में ध्यान देने का तरीका कितना चुनिंदा है. पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों (जहां खबरों के मुताबिक दर्जनों लोग मारे गए हैं) पर दुनिया भर में बहुत कम ध्यान दिया जाता है. इसके उलट, भारत में इस्तेमाल होने वाले आंसू गैस के गोले अंतरराष्ट्रीय खबर बन जाते हैं, जबकि भारत की पुलिस जिन तरीकों (जैसे पैलेट गन और भीड़ को काबू करने के उपाय) का इस्तेमाल करती है, वे लोकतांत्रिक देशों में आम हैं. उन्होंने कहा कि यह अंतर भारत के बर्ताव पर कोई टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह इस बात पर टिप्पणी है कि किन चीजों को खबर माना जाता है.
बाबोनस ने कहा कि NEET के विरोध-प्रदर्शन कुछ जायज शिकायतों पर आधारित हैं. परीक्षा से जुड़ी परेशानी सच है. हालांकि, उसके बाद जो हुआ, वह आंकड़ों के आधार पर बदली हुई एक कहानी है, जिसमें संदर्भ (context) को नजरअंदाज किया गया है. NDTV को डेटा समझाते हुए, बाबोनस ने बताया कि लगभग 20 लाख छात्रों ने NEET परीक्षा दी थी. भारत में उस उम्र के लोगों में आत्महत्या की सामान्य दर प्रति 1,000,000 पर लगभग 25 को आधार मानें, तो सांख्यिकीय उम्मीद के मुताबिक उस आबादी में आत्महत्याओं की संख्या लगभग 500 होनी चाहिए. NEET से जुड़ी परेशानी के कारण बताई गई संख्या बीस है. उन्होंने कहा कि यह तुलना इसलिए चौंकाने वाली है, क्योंकि यह हर संख्या को संकट का सबूत मानने की सोच को उलट देती है. NDTV से प्रोफेसर बाबोनस के शब्दों में 500 की उम्मीद के मुकाबले बीस की संख्या कोई बहुत बुरी बात नहीं है, हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक भी जान जाना बहुत ज्यादा है. लेकिन उनका तर्क था कि परीक्षा के कारण बड़े पैमाने पर त्रासदी होने की कहानी सांख्यिकीय आंकड़ों का नतीजा है, न कि कोई सामाजिक सच्चाई र सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने की हिम्मत भारत के सामाजिक वैज्ञानिकों में ज्यादातर नहीं दिखी है.

NDTV को बाबोनस ने बताया कि यही बात उस रोजगार की कहानी पर भी लागू होती है, जो युवाओं के गुस्से को हवा दे रही है. भारत में पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए फॉर्मल सेक्टर (संगठित क्षेत्र) में काम करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है — और यह रफ्तार विकासशील दुनिया के ज्यादातर देशों से कहीं ज्यादा है. उनके नजरिए से, जो स्थिति "बिना नौकरियों के विकास" जैसी लगती है, वह असल में इसके ठीक उलट समस्या है: विकास की गति इतनी तेज है कि यह औपचारिक अर्थव्यवस्था में तेजी से और ज्यादा लोगों को खींच रही है, जबकि अर्थव्यवस्था उन्हें तुरंत खपा नहीं पा रही है. इस नजरिए से देखें तो निराशा, मौकों की कमी का नहीं, बल्कि बढ़ते मौकों का नतीजा है.
बाबोनस ने यह भी कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि 'जेन जी' (Gen Z) की बेचैनी गलत या कुछ समय के लिए है. उनके हिसाब से, यह एक काम कर रहे लोकतंत्र की स्थायी विशेषता है, न कि कोई ऐसा संकट जिसे बस किसी तरह सुलझाकर खत्म कर दिया जाए. उन्होंने NDTV को समझाया कि भारत और उन पड़ोसी देशों के बीच, जहां सरकारें गिर गईं, बुनियादी फर्क है: भारत में नाराजगी जाहिर करने के लिए सही रास्ते मौजूद हैं — जैसे वोटिंग, संगठित विरोध-प्रदर्शन, और सत्ताधारी पार्टी जो इतनी समझदार है कि जानती है कि उसका भविष्य इसी पीढ़ी के वोट पर टिका है. इसके साथ ही, यहां की इकॉनमी अभी भी उम्मीद जगा रही है, भले ही उसने हर वादे के मुताबिक नौकरी न दी हो.

सोशल मीडिया की इस सबमें भूमिका को लेकर बाबोनस बिल्कुल भी परेशान नहीं दिखे. उन्होंने भारत के हालात की तुलना ऑस्ट्रेलिया में युवाओं के लिए सोशल मीडिया पर लगी रोक से की — जिसके बारे में उनका कहना था कि इसके असरदार होने के बहुत कम सबूत हैं. उन्होंने कहा कि ये प्लेटफॉर्म बस एक नया मैदान हैं जहां पीढ़ियों के बीच की पुरानी बहस चल रही है. उन्होंने NDTV से कहा कि हर पीढ़ी ने अपने से पहले वाली पीढ़ी को बेचैन किया है. यह लोकतंत्र का कमजोर पड़ना नहीं, बल्कि हालात के हिसाब से ढलना है. बाबोनस ने कहा कि अब असली परीक्षा यह नहीं है कि भारत की Gen Z (नई पीढ़ी) बेचैन रहती है या नहीं — वे तो रहेंगे ही. असली बात यह है कि उस बेचैनी को संभालने के लिए बनाए गए सिस्टम, दुनिया की उस कहानी के साथ तालमेल बिठा पाती है या नहीं जिसे दुनिया सुनाना चाहती है.
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