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सुभाष चंद्रा की मुश्किलें बढ़ीं, LIC से 980 करोड़ के लोन मामले में CBI ने किया केस, नेटवर्थ पर भी सवाल

नेटवर्थ सर्टिफिकेट DIM & Co. की तरफ से 28 मार्च 2018 को जारी किया गया था. इसमें कहा गया था कि 31 मार्च 2017 तक सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ 6,197.62 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 59,113 करोड़ रुपये थी.

सुभाष चंद्रा की मुश्किलें बढ़ीं, LIC से 980 करोड़ के लोन मामले में CBI ने किया केस, नेटवर्थ पर भी सवाल
नई दिल्ली:

एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड यानी LICHFL से करीब 980 करोड़ रुपये के लोन से जुड़े मामले में CBI ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन रहे सुभाष चंद्रा और दूसरे लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. CBI की FIR में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, भरोसा तोड़ने और गलत तरीके से फायदा पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए हैं. ये मामला LICHFL की तरफ से CBI मुख्यालय में दी गई शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया है.

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ यानी उनकी कुल संपत्ति को लेकर है. LICHFL की शिकायत के मुताबिक, दो अलग-अलग लोन लेते समय सुभाष चंद्रा की तरफ से जो नेटवर्थ सर्टिफिकेट दिए गए थे, उनमें उनकी संपत्ति हजारों करोड़ रुपये बताई गई थी, लेकिन बाद में जब सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया यानी Personal Insolvency Resolution की कार्रवाई हुई, तो उन्होंने खुद इन आंकड़ों पर सवाल उठाया और कहा कि उनकी असली नेटवर्थ इतनी नहीं थी.

CBI को दी गई शिकायत के मुताबिक, पहला मामला Vasant Sagar Properties Pvt. Ltd. और उसकी को-बॉरोअर यानी साथ में लोन लेने वाली कंपनी Pan India Infra Projects Pvt. Ltd. से जुड़ा है. इन दोनों कंपनियों को LICHFL ने करीब 500 करोड़ रुपये का लोन दिया था. यह लोन बिजनेस बढ़ाने के लिए Takeover और Top-up Facility के तौर पर दिया गया था.

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इस लोन के लिए सुभाष चंद्रा ने 28 मार्च 2018 को गारंटी दी थी. शिकायत के मुताबिक, लोन मंजूर करने के दौरान सुभाष चंद्रा की तरफ से दिया गया नेटवर्थ सर्टिफिकेट भी अहम आधार था.

यह नेटवर्थ सर्टिफिकेट DIM & Co. की तरफ से 28 मार्च 2018 को जारी किया गया था. इसमें कहा गया था कि 31 मार्च 2017 तक सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ 6,197.62 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 59,113 करोड़ रुपये थी.

दूसरा मामला Digital Subscriber Management and Consultancy Services Pvt. Ltd. और उसकी को-बॉरोअर कंपनी Spirit Infra Power and Multi Ventures Pvt. Ltd. को दिए गए करीब 480 करोड़ रुपये के लोन से जुड़ा है.

यह लोन किराये से होने वाली कमाई के आधार पर दिया गया था. इस लोन के लिए भी सुभाष चंद्रा ने गारंटी दी थी. इस मामले में LICHFL को दिए गए एक दूसरे नेटवर्थ सर्टिफिकेट में सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ 40,562 करोड़ रुपये बताई गई थी. यह सर्टिफिकेट MPJ & Co., Chartered Accountants ने 6 जुलाई 2018 को जारी किया था.

यानी दोनों लोन को मिलाकर करीब 980 करोड़ रुपये की लोन सुविधा दी गई थी और इन लोन के समय सुभाष चंद्रा की आर्थिक हैसियत हजारों करोड़ रुपये की बताई गई थी.

शिकायत के मुताबिक, बाद में इन दोनों लोन में डिफॉल्ट हो गया. इसके बाद मामला आगे बढ़ा और Insolvency and Bankruptcy Code यानी IBC के तहत सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई. यहीं से इस मामले में सबसे बड़ा सवाल सामने आया.

CBI की FIR के मुताबिक, इस Insolvency प्रक्रिया के दौरान सुभाष चंद्रा ने उन नेटवर्थ सर्टिफिकेट में बताए गए आंकड़ों को अपनी असली संपत्ति मानने से इनकार कर दिया.

यानी जिस समय LICHFL से लोन लिया गया था, उस समय दस्तावेजों में उनकी नेटवर्थ हजारों करोड़ रुपये बताई गई थी. लेकिन बाद में Insolvency की कार्रवाई के दौरान उनकी तरफ से कहा गया कि उनकी संपत्ति इतनी नहीं थी.

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LICHFL की शिकायत में यह भी कहा गया है कि Insolvency Proceedings के दौरान सुभाष चंद्रा ने साल 2024 में अपनी नेटवर्थ करीब 31.79 करोड़ रुपये बताई. साथ ही, उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि साल 2017-18 में भी उनकी नेटवर्थ 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं थी. यही बड़ा अंतर अब CBI की जांच का मुख्य हिस्सा है.

एक तरफ लोन लेते समय दिए गए दस्तावेजों में उनकी नेटवर्थ करीब 59,113 करोड़ रुपये और दूसरे मामले में 40,562 करोड़ रुपये बताई गई थी. दूसरी तरफ बाद की Insolvency प्रक्रिया में उनकी तरफ से इन आंकड़ों को स्वीकार नहीं किया गया.

अब CBI यह जांच करेगी कि LICHFL से लोन लेने के लिए क्या जानबूझकर नेटवर्थ को गलत या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया था. क्या इन दस्तावेजों के आधार पर लोन की मंजूरी और पैसा जारी करवाया गया? और अगर नेटवर्थ से जुड़े दस्तावेज गलत पाए जाते हैं, तो उन्हें तैयार करने और इस्तेमाल करने में किन लोगों की भूमिका थी?

CBI यह भी जांच करेगी कि लोन लेने वाली कंपनियों, गारंटर और दूसरे संबंधित लोगों के बीच कोई आपराधिक साजिश थी या नहीं. साथ ही यह भी देखा जाएगा कि करीब 980 करोड़ रुपये के लोन का इस्तेमाल उसी काम के लिए किया गया या नहीं, जिसके लिए लोन मंजूर किया गया था.

CBI की कार्रवाई सिर्फ सुभाष चंद्रा तक सीमित नहीं है. FIR में दूसरे लोगों और संबंधित कंपनियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है. जांच एजेंसी यह पता लगाएगी कि लोन के लिए दिए गए दस्तावेजों की जांच कैसे हुई, नेटवर्थ के आंकड़ों को किस आधार पर सही माना गया और बाद में लोन डिफॉल्ट क्यों हुआ?

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