छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है....ताजा मामला धमतरी जिले का है. यहां 117 साल पुराने मेनोनाइट चर्च समेत 40 से ज्यादा चर्चों ने अपने यहां एक बोर्ड लगाया है- चर्च में गैर ईसाइयों का प्रवेश वर्जित है....तो दूसरी तरफ जिले के विभिन्न इलाकों से 1500 से अधिक लोगों ने कलेक्टर कार्यालय में आवेदन देकर ईसाई प्रार्थना सभा में शामिल होने की जानकारी दी है. सूत्रों का ये भी कहना है कि ये संख्या 4000 के आसपास हो सकती है लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. उधर इस मामले को लेकर हिंदू संगठनों और आदिवासी समाज ने गंभीर आपत्ति जताई है, जबकि ईसाई समाज ने सभी आरोपों को खारिज किया है. गौर करने वाली बात ये भी है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने इसी साल धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम" भी लागू किया है. क्या है पूरा मामला जानिए इस रिपोर्ट में
कलेक्ट्रेट पहुंचे 1500 आवेदन, प्रशासन भी सतर्क
धमतरी में पिछले डेढ़ महीने के दौरान बड़ी संख्या में आवेदन प्रशासन तक पहुंचने की बात सामने आई है. दावा है कि नगरी, कुरूद और धमतरी क्षेत्र से करीब 1500 लोगों ने प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए सूचना पत्र दिए हैं. सूत्रों के मुताबिक नगरी क्षेत्र से करीब 600, कुरूद से 595 और धमतरी क्षेत्र से लगभग 310 लोगों ने आवेदन दिया है. हालांकि प्रशासन ने आधिकारिक रूप से कुल संख्या की पुष्टि नहीं की है. इनमें साहू समाज और आदिवासी समुदाय के लोगों की संख्या अधिक बताई जा रही है.अपर कलेक्टर इंद्रा नवीन सिंह ने आवेदन मिलने की बात स्वीकार की है. उन्होंने बताया कि संबंधित आवेदन प्राप्त हुए हैं और उन्हें नियमानुसार एसडीएम कार्यालय को भेजा जाएगा. प्रशासन का कहना है कि यह सूचना स्वरूप दिया गया आवेदन है और इस पर किसी प्रकार की तत्काल कार्रवाई का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है.

Dhamtari conversion controversy: धमतरी में चर्चों के आगे इसी तरह के बोर्ड लगे हैं. जिसमें कहा गया है कि चर्च में केवल ईसाई समुदाय ही प्रवेश करें.
Photo Credit: पूनम शुक्ला
117 साल पुराना मेनोनाइट चर्च क्यों चर्चा में है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में धमतरी का ऐतिहासिक सुंदरगंज मेनोनाइट चर्च भी है. यह चर्च करीब 117 साल पुराना माना जाता है और धमतरी में ईसाई मिशनरी गतिविधियों के शुरुआती दौर का प्रतीक माना जाता है. शहर की पहचान बन चुके इस चर्च ने भी हाल में अपने परिसर के बाहर सूचना बोर्ड लगाया है. जिसमें लिखा है- यहां गैर ईसाइयों का प्रवेश वर्जित है. चर्च प्रबंधन का कहना है कि यह कदम किसी समुदाय को रोकने के लिए नहीं, बल्कि विवाद और असामाजिक गतिविधियों को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है. लेकिन विरोधी पक्ष इसे चर्चों के बदलते रवैये और बढ़ते विवाद का संकेत बता रहा है.
40 चर्चों के बाहर बोर्ड, बढ़ी सियासी और सामाजिक बहस
क्रिश्चियन फोरम के मुताबिक जिले के करीब 40 चर्चों और प्रार्थना स्थलों पर ऐसे सूचना बोर्ड लगाए गए हैं. उनका कहना है कि हाल के महीनों में प्रार्थना सभाओं को लेकर बढ़े विवाद और विरोध प्रदर्शनों के बाद यह फैसला लिया गया. दूसरी तरफ हिंदू संगठनों का आरोप है कि चर्चों में होने वाली गतिविधियों को लेकर पहले से विवाद रहा है और अब बड़ी संख्या में आवेदन सामने आने से संदेह और गहरा गया है.क्रिश्चियन फोरम के महासचिव डॉ. डायमंड फिलिप्स का कहना है कि ईसाई धर्म किसी भी व्यक्ति को चर्च आने से नहीं रोकता. उनके अनुसार प्रार्थना सभा में शामिल होने वाले लोग अपनी इच्छा से आते हैं और कानून के मुताबिक प्रशासन को सूचना देते हैं.
धर्मांतरण पर नया कानून क्यों लाई सरकार?
दरअसल, छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस चल रही है. इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार ने वर्ष 2026 में नया "धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम" लागू किया. सरकार का कहना है कि बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन रोकने के लिए कानून को और सख्त बनाया गया है. नए कानून में सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में उम्रकैद तक का प्रावधान है, जबकि धर्म परिवर्तन से पहले प्रशासन को सूचना देना भी अनिवार्य किया गया है.
सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?
धर्मांतरण पर सख्त कानून का मसौदा तैयार करते समय राज्य सरकार ने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा था कि वर्ष 2021 से 2025 के बीच कथित अवैध धर्मांतरण से जुड़ी दर्ज शिकायतों की संख्या 100 से कम रही. सरकार का तर्क था कि शिकायतों की संख्या सीमित होने के बावजूद राज्य में यह मुद्दा लगातार सामाजिक और राजनीतिक तनाव का कारण बनता रहा है. दूसरी ओर भाजपा और विभिन्न संगठन वर्षों से विशेषकर बस्तर और सरगुजा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का आरोप लगाते रहे हैं. धमतरी का मामला ऐसे समय सामने आया है जब राज्य में नया धर्मांतरण कानून लागू हो चुका है और धर्मांतरण की बहस पहले से ज्यादा संवेदनशील हो गई है. एक तरफ 1500 आवेदनों का दावा है, दूसरी तरफ 117 साल पुराने चर्च समेत 40 से अधिक चर्चों के बाहर लगे बोर्ड चर्चा में हैं. ऐसे में प्रशासन की जांच, समाजों की बैठकों और आगे उठाए जाने वाले कदमों पर पूरे प्रदेश की नजर टिकी हुई है.
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