- ब्रिक्स अब 11 देशों का समूह है और 2026 में इसकी अध्यक्षता भारत कर रहा है.
- दिल्ली सम्मेलन में व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल भुगतान और वैश्विक शासन जैसे मुद्दे सबसे अहम रहेंगे.
- ब्रिक्स का विस्तार ताकत बढ़ाता है, लेकिन सदस्य देशों के मतभेद इसकी सबसे बड़ी चुनौती हैं.
ब्रिक्स अब सिर्फ पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है. विस्तार के बाद इसकी ताकत और चुनौतियां दोनों बढ़ी हैं. भारत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, ऐसे में समझिए ब्रिक्स क्यों अहम है.
ब्रिक्स क्या है?
ब्रिक्स देशों का एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जो आर्थिक सहयोग, व्यापार, निवेश, विकास, तकनीक और वैश्विक मुद्दों पर मिलकर काम करने की कोशिश करता है.
इसका नाम शुरुआती पांच देशों के अंग्रेजी नाम के पहले अक्षरों से बना है- ब्राजील (Brazil), रूस (Russia), भारत (India), चीन (China) और दक्षिण अफ्रीका (South Africa).
भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन यानी ब्रिक्स 2026 का अध्यक्ष है और इसका आयोजन 12 से 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में हो रहा है.

2009 के पहले ब्रिक सम्मेलन की तस्वीर
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ब्रिक्स की शुरुआत कब हुई?
2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ब्रिक देशों के विदेश मंत्रियों की पहली बैठक में ब्रिक को औपचारिक रूप दिया गया था.
शुरुआत में इसमें चार देश थे- ब्राजील, रूस, भारत और चीन. इसे BRIC कहा जाता था. 2009 में इन देशों का पहला शिखर सम्मेलन हुआ. 2012 में भारत पहली बार इसका होस्ट बना.
इसके बाद दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ और 2011 से नाम ब्रिक्स हो गया.
2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हुए. जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य बन गया.
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अभी ब्रिक्स में कितने देश हैं?
ब्रिक्स में 11 पूर्ण सदस्य देश हैं.
1. ब्राजील
2. रूस
3. भारत
4. चीन
5. दक्षिण अफ्रीका
6. मिस्र
7. इथियोपिया
8. ईरान
9. संयुक्त अरब अमीरात
10. सऊदी अरब
11. इंडोनेशिया
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ब्रिक्स का मकसद क्या है?
ब्रिक्स का मकसद सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाना. निवेश और आर्थिक सहयोग बढ़ाना. विकासशील देशों की आवाज मजबूत करना. वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करना. वित्तीय सहयोग बढ़ाना.
तकनीक और डिजिटल क्षेत्र में सहयोग करना. ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर साथ काम करना है.
क्या ब्रिक्स अमेरिका के खिलाफ संगठन है?
सीधे तौर पर ऐसा कहना सही नहीं होगा.
ब्रिक्स में अमेरिका शामिल नहीं है और रूस-चीन समेत कुछ सदस्य पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को कम करने की बात करते हैं. लेकिन ब्रिक्स का आधिकारिक एजेंडा अमेरिका का विरोध करना नहीं है.
भारत ब्रिक्स को अपने लिए एक ऐसा मंच मानता है जहां वह यूरोप, रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग स्तर पर संभालते हुए विकासशील देशों के मुद्दे उठा सकता है.
ब्रिक्स और जी7 में क्या फर्क है?
जी7 में दुनिया की प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं.
ब्रिक्स का मूल आधार उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं रही हैं.
इसलिए दोनों समूहों की राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में अंतर है.
ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद यह बहस और तेज हुई है कि क्या दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक ताकत धीरे-धीरे पश्चिमी देशों के बाहर भी ज्यादा फैल रही है.
ब्रिक्स इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
क्योंकि इसके विस्तार के बाद इसमें दुनिया के अलग-अलग महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हो गए हैं.
अब इसमें एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण अमेरिका की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं.
इससे ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की आवाज के बड़े मंच के रूप में पेश करने की कोशिश मजबूत हुई है.
लेकिन यही विस्तार इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी बन गया है. सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं.
ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
एकता बनाए रखना.
उदाहरण के लिए ईरान और यूएई ब्रिक्स के सदस्य हैं, लेकिन पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में दोनों की स्थिति अलग है.
इस वजह से संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. मई 2026 में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक भी संयुक्त बयान के बिना खत्म हुई थी.
यानी ब्रिक्स जितना बड़ा हुआ है, उसके भीतर अलग-अलग हित भी उतने ही बढ़े हैं.

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भारत के लिए ब्रिक्स क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए ब्रिक्स तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है.
पहला- आर्थिक: भारत व्यापार, निवेश, ऊर्जा और पेमेंट सिस्टम में सहयोग बढ़ाना चाहता है.
दूसरा- कूटनीतिक: भारत एक ही समय में रूस, चीन, ईरान, यूएई और दूसरे देशों के साथ बातचीत का मंच बनाए रख सकता है.
तीसरा- वैश्विक भूमिका: भारत खुद को ग्लोबल की आवाज के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में पेश कर सकता है.

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भारत 2026 में क्या करना चाहता है?
भारत इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है.
भारत ब्रिक्स देशों की सेंट्रल बैंग डिजिटल करेंसी यानी डिजिटल मुद्रा प्रणालियों को जोड़ने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है, ताकि सीमा पार भुगतान आसान और तेज हो सके. इसका उद्देश्य डॉलर को तुरंत हटाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय लेन-देन को आसान बनाना है.
क्या ब्रिक्स अपनी अलग मुद्रा बनाएगा?
फिलहाल इसे पक्का फैसला नहीं माना जाना चाहिए. ब्रिक्स के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा जरूर होती रही है.
लेकिन एक साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाना बहुत जटिल मामला है.
अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्था, ब्याज दर, मुद्रा व्यवस्था और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं.
इसलिए ब्रिक्स की साझा मुद्रा और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए.

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क्या ब्रिक्स की अपनी बैंक है?
हां. ब्रिक्स देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी बनाया है.
इसका मकसद सदस्य और दूसरे विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है.
यह ब्रिक्स की सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत उपलब्धियों में से एक है.
क्या ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन हर साल होता है?
हां. हर साल अध्यक्षता किसी एक सदस्य देश के पास होती है और वही देश शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है. 2025 में ब्राजील अध्यक्ष था. 1 जनवरी 2026 से भारत ने अध्यक्षता संभाली है.

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2026 के ब्रिक्स सम्मेलन में क्या-क्या मुद्दे अहम होंगे?
नई दिल्ली सम्मेलन 2026 में ये प्रमुख मुद्दे शामिल हैं.
- वैश्विक शासन में सुधार.
- बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना.
- व्यापार और निवेश.
- ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा.
- तकनीकी सहयोग.
- डिजिटल भुगतान.
- स्वास्थ्य.
- आपदा से निपटने की क्षमता.
- जरूरी सामान की आपूर्ति व्यवस्था.
- पश्चिम एशिया समेत वैश्विक संकट.

इस बार चीन की मौजूदगी क्यों खास है?
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नई दिल्ली सम्मेलन में शामिल होने वाले हैं. यह सात साल में उनका पहला भारत दौरा होगा. इसलिए ब्रिक्स के अलावा भारत-चीन संबंध भी इस सम्मेलन के दौरान खास चर्चा में रहेंगे.
रूस के लिए ब्रिक्स क्यों महत्वपूर्ण है?
रूस ब्रिक्स को पश्चिमी दबाव के बीच आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखता है.
भारत के लिए रूस ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण भागीदार है.
इसलिए ब्रिक्स भारत को रूस के साथ बातचीत जारी रखने का एक और बहुपक्षीय मंच देता है.
क्या ब्रिक्स नेटो जैसा सैन्य संगठन है?
नहीं. ब्रिक्स कोई सैन्य गठबंधन नहीं है.
इसके पास नेटो जैसी सामूहिक सैन्य सुरक्षा व्यवस्था नहीं है.
यह मुख्य रूप से आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक सहयोग का मंच है.

संयुक्त राष्ट्र संघ
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क्या ब्रिक्स संयुक्त राष्ट्र संघ का विकल्प है?
नहीं. ब्रिक्स संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने वाला संगठन नहीं है.
बल्कि ब्रिक्स देश संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाओं में और अधिक प्रतिनिधित्व को लेकर उनमें सुधार की मांग करते रहे हैं.
ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
इसकी सबसे बड़ी ताकत है अलग-अलग क्षेत्रों की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाना.
लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है.
इतने अलग देशों के हितों को एक साझा नीति में बदलना आसान नहीं है.
2026 का दिल्ली सम्मेलन इसी विरोधाभास की बड़ी परीक्षा है.
ब्रिक्स के बारे में सबसे बड़ा भ्रम क्या है?
दरअसल यह मान लिया जाता है कि ब्रिक्स का मतलब केवल अमेरिका और डॉलर का विरोध करना है. लेकिन तस्वीर इससे कहीं अलग और बड़ी है.
क्योंकि ब्रिक्स में आर्थिक सहयोग, विकास, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, स्वास्थ्य और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों को अहमियत दी जाती है.
दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स 2026 सम्मेलन क्यों अहम है?
पश्चिम एशिया, यूक्रेन-रूस में चल रहे तनाव, तेल-गैस की समस्या और इनकी बढ़ती कीमतों यानी ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक स्तर पर व्यापार गतिविधियों को लेकर विवाद, चीन और अमेरिका बीच प्रतिद्वंद्विता की वजह से बदलती वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत मेजबानी कर रहा है. यानी जब दुनिया कई बड़े संकटों का सामना कर रही है तब 21 देश भारत में जुटे हैं. ऐसे में इन देशों को एक मंच पर साझा सहमति के लिए तैयार करने की भारत की क्षमता पर दुनिया की नजर रहेगी.

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ब्रिक्स की असल ताकत क्या है?
ब्रिक्स की एक ताकत जहां एक ओर उसके सदस्य देशों की संख्या बल में है वहीं इसकी सामूहिक आर्थिक ताकत भी उतनी ही अहम है. पर असली सवाल ये है कि क्या इस सम्मेलन में शामिल होने वाले सभी देश अपने मतभेदों के बावजूद बिजनेस, पेमेंट, डेवलपमेंट और वर्ल्ड ऑर्डर जैसे मुद्दों पर एकमत हो सकते हैं.
भारत के लिए यह उसकी कूटनीतिक ताकत के साथ ही ग्लोबल साउथ में नेतृत्व क्षमता की परख भी है.
ब्रिक्स अब केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है. 11 सदस्यों वाला यह समूह 2026 में भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन कर रहा है. विस्तार से इसकी ताकत बढ़ी है, लेकिन ईरान-यूएई जैसे मतभेदों से चुनौतियां भी बढ़ी हैं. व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल भुगतान, विकास और वैश्विक संस्थाओं में सुधार इसके अहम मुद्दे हैं.
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