- ब्रिक्स में 5 से बढ़कर 11 सदस्य हुए, जिससे संगठन का आर्थिक और राजनीतिक वजन काफी बढ़ा.
- लेकिन ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे सदस्य देशों के अलग-अलग हितों के बीच सहमति बनाना.
- और दिल्ली समिट में साझा घोषणा हासिल करना ब्रिक्स की एकता और भारत की कूटनीति, दोनों के लिए अहम होगा.
भारत 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है. भारत चौथी बार इस बड़े सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी भारत इसकी मेजबानी कर चुका है. इस बार का सम्मेलन भारत के लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि अगले 10 सालों तक उसे फिर इस समिट की मेजबानी का मौका नहीं मिलेगा क्योंकि 2024 और 2025 में इस मंच से जुड़े नए साथियों की मेजबानी का एक नया दौर 2028 से शुरू होने वाला है.
यानी भारत के पास इस बार सिर्फ एक सम्मेलन आयोजित करने की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि ब्रिक्स को एक ऐसे मोड़ पर संभालने की चुनौती है, जहां संगठन के भीतर देशों के हित और विदेश नीति की प्राथमिकताएं कई जगह एक-दूसरे से टकरा रही हैं.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत सभी सदस्य देशों को एक साझा घोषणा पर सहमत करा पाएगा?
मामला इतना मुश्किल क्यों है?
ब्रिक्स की शुरुआत 2009 में रूस में हुए पहले आयोजन से हुई थी. तब भारत समेत ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका इसके पांच संस्थापक सदस्य देश थे. लेकिन अब संगठन काफी बड़ा हो चुका है. 2024 में संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, मिस्र और इथियोपिया इसमें शामिल हुए. 2025 में इंडोनेशिया भी ब्रिक्स का सदस्य बना.
यानी पांच देशों से शुरू हुआ यह संगठन अब 11 देशों का एक बड़ा समूह है.
इस विस्तार से ब्रिक्स की आर्थिक और राजनीतिक ताकत तो बढ़ी, लेकिन इसके साथ एक नई मुश्किल भी आई. अब इतने सारे देशों के अलग-अलग हितों के बीच सहमति बनाना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो गया है.
सबसे बड़ी चुनौती युद्धों ने बढ़ाई
ब्रिक्स के सामने पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध की चुनौती थी. फरवरी 2022 से जारी इस युद्ध को लेकर ब्रिक्स की बैठकों में लगातार चर्चा होती रही है.
लेकिन अब पश्चिम एशिया का संकट भी संगठन के अंदर पहुंच गया है.
लेख के मुताबिक, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने ब्रिक्स के भीतर ही अलग-अलग पक्ष खड़े कर दिए हैं. ईरान ब्रिक्स का सदस्य है, वहीं सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी संगठन का हिस्सा हैं.
यानी जिस मुद्दे पर देशों के हित और नजरिए अलग हैं, उसी पर ब्रिक्स को साझा भाषा तैयार करनी है.
यही भारत के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है.
इसकी झलक मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भी दिखी. बैठक के बाद साझा घोषणा जारी नहीं हो सकी. खास तौर पर पश्चिम एशिया और ईरान-अमेरिका तनाव जैसे मुद्दों पर अलग-अलग रुख सामने आए.
हालांकि दूसरे आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में ब्रिक्स के भीतर सहमति बनाने का काम चलता रहा.

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आखिर ब्रिक्स इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
ब्रिक्स का मूल मकसद दुनिया की आर्थिक व्यवस्था में बड़े उभरते देशों की आवाज को मजबूत करना था. बाद में इसका दायरा बढ़कर विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ के मुद्दों तक पहुंच गया.
2015 में ब्रिक्स ने न्यू डेवलपमेंट बैंक और आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था की शुरुआत की. इनका मकसद सदस्य देशों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को वित्तीय सहयोग देना था.
पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता कम करने की चर्चा के बीच कई विकासशील देशों की ब्रिक्स में दिलचस्पी बढ़ी.
2024 और 2025 में हुए विस्तार के बाद ब्रिक्स का वजन और बढ़ गया.
लेख में दिए आंकड़ों के मुताबिक, नए सदस्यों के साथ ब्रिक्स देश दुनिया की करीब 49 फीसद आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनकी तेल उत्पादन में हिस्सेदारी करीब 40 फीसद और क्रय शक्ति समानता यानी पीपीपी के आधार पर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में हिस्सेदारी करीब 40 फीसद बताई गई है. इसके मुकाबले जी7 देशों की पीपीपी आधारित हिस्सेदारी करीब 28 फीसद है.
इसके अलावा ब्रिक्स देशों के पास बड़ी मात्रा में खनिज, दुर्लभ खनिज और दूसरी अहम प्राकृतिक संपदाएं भी हैं.
लेकिन यहां एक बड़ी बात समझनी जरूरी है. सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था और बड़ी आबादी से ताकत नहीं आती. असली ताकत तब बनेगी, जब ये देश किसी बड़े मुद्दे पर साथ खड़े हो सकें. ब्रिक्स 2026 की यही असली परीक्षा भी है.
भारत की अध्यक्षता में क्या हुआ?
ब्रिक्स 2026 के लिए भारत ने चार मुख्य आधार तय किए हैं. ये हैं- मजबूती, नए विचार, सहयोग और टिकाऊ विकास.
भारत की अध्यक्षता के दौरान 350 से ज्यादा बैठकें आयोजित की गई हैं. इनमें विदेश मामलों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, ब्रिक्स राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों, मंत्री स्तरीय बैठकें, शेरपा और एजेंसी स्तरीय बैठकें शामिल हैं.
विदेश, वित्त, उद्योग, व्यापार, ऊर्जा, कृषि, संचार, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा प्रबंधन, खेल, विज्ञान, तकनीक, परिवहन, न्याय, महिला, रोजगार, संस्कृति, युवा और पर्यटन जैसे कई क्षेत्रों में बैठकें हुई हैं.
इन बैठकों में कई मुद्दों पर साझा सहमति बनी है.
इनमें खेती, स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा, पारंपरिक ज्ञान, टिकाऊ जीवनशैली, युवाओं की क्षमता बढ़ाने, स्मार्ट बिजली व्यवस्था, ऊर्जा भंडारण, स्टार्टअप और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
एमएसएमई फोरम, ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल, थिंक टैंक काउंसिल, एकेडमिक फोरम और सिविल ब्रिक्स काउंसिल जैसे मंचों पर भी बैठकें हुई हैं.
यानी राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद के बावजूद आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी सहयोग के मोर्चे पर ब्रिक्स का काम आगे बढ़ा है.

ब्रिक्स 2026
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अब सबसे बड़ा सवाल- क्या साझा घोषणा आएगी?
दिल्ली समिट में सबसे ज्यादा नजर इसी बात पर रहेगी कि क्या 11 देश एक साझा घोषणा पर सहमत हो पाते हैं.
भारत के लिए सबसे मुश्किल काम ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के बीच ऐसे शब्दों पर सहमति बनाना होगा, जिन पर सभी देश राजी हों.
भारत के पास ऐसा करने का अनुभव भी है.
2023 में नई दिल्ली में हुए जी20 सम्मेलन में भी रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर देशों के बीच गहरे मतभेद थे. इसके बावजूद भारत ने सभी देशों को साथ लाकर साझा घोषणा हासिल की थी.
अब ब्रिक्स में भारत को कुछ वैसी ही कूटनीतिक भूमिका निभानी होगी.
ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मिस्र, रूस और दूसरे सदस्य देशों से भारत को सहयोग मिलने की उम्मीद है. चीन के साथ भारत के रिश्तों में भी हाल के समय में सुधार के संकेत मिले हैं.
भारत के लिए असली चुनौती क्या है?
भारत के सामने सिर्फ एक घोषणा जारी कराने का सवाल नहीं है.
असली सवाल यह है कि ब्रिक्स के विस्तार के बाद क्या यह संगठन एक मजबूत और भरोसेमंद मंच बन पाएगा?
अगर सदस्य देश अपने मतभेदों के बावजूद साझा मुद्दों पर साथ काम करते हैं, तो ब्रिक्स की ताकत काफी बढ़ सकती है.
लेकिन अगर बड़े भू-राजनीतिक विवाद संगठन के भीतर ही सहमति को रोकते रहे, तो इसके विस्तार से पैदा हुई ताकत का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा.
इसलिए दिल्ली समिट भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है.
यह भारत की कूटनीतिक क्षमता और ब्रिक्स के भविष्य, दोनों की परीक्षा है.
कुल मिलाकर, दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स समिट यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि 11 देशों का यह बड़ा समूह सिर्फ आंकड़ों में ताकतवर है या वास्तव में दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता भी रखता है.
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