- विकास, संस्थागत सुधार, तकनीक, कनेक्टिविटी और ग्लोबल साउथ की आवाज को ब्रिक्स में लाने की कोशिश.
- चीन आर्थिक ताकत देता है, जबकि रूस ब्रिक्स को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के लिए अहम मंच मानता है.
- 3. विशेषाधिकार से साझेदारी की ओर बढ़ने की सोच को भरोसे और ठोस संस्थागत व्यवस्था में बदलना.
भारत की मेजबानी में सम्पन्न हुआ ब्रिक्स 2026 शिखर सम्मेलन वैश्विक स्तर पर फैसले लेने की व्यवस्था में एक अहम मोड़ साबित हो सकता है. ब्रिक्स के 20 साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे संगठन के लिए परिपक्व होने का दौर बताया है. उन्होंने अगले दो दशकों के लिए ऐसे महत्वाकांक्षी एजेंडे की जरूरत बताई, जिसमें सभी देशों को साथ लेकर चलने वाली बहुपक्षीय व्यवस्था हो.
इस पूरी सोच के केंद्र में ग्लोबल साउथ की बढ़ती मांग है. ग्लोबल साउथ ऐसी ज्यादा बराबरी वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहता है, जिसमें व्यापार, कनेक्टिविटी और आर्थिक हितों को भू-राजनीतिक संकटों से बचाने के लिए भरोसेमंद सुरक्षा व्यवस्था हो. साथ ही ऐसी व्यवस्था हो जो अलग-अलग देशों की अलग परिस्थितियों को समझ सके.
पश्चिम एशिया का संकट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरुआती संबोधन को पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता की पृष्ठभूमि में समझना होगा. इसका असर वैश्विक कारोबार, खासकर समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और समुद्र में बिना रोक-टोक आवाजाही के सिद्धांत पर पड़ रहा है.
रणनीतिक रूप से अहम समुद्री रास्तों में होने वाली रुकावट यह दिखाती है कि कोई भू-राजनीतिक संघर्ष भले ही किसी देश से दूर हो, लेकिन उसका बोझ उन देशों को भी उठाना पड़ सकता है जो उस संघर्ष का हिस्सा नहीं हैं.
इसीलिए भारत विकास, संस्थागत सुधार, आर्थिक सहयोग, तकनीक, कनेक्टिविटी और ग्लोबल साउथ की आवाज को ब्रिक्स के केंद्र में रखने पर जोर दे रहा है. मकसद ब्रिक्स को ज्यादा काम करने वाला संगठन बनाना और उसे भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण से कम प्रभावित होने वाला बनाना है.
भारत के दो मुख्य लक्ष्य हैं. पहला, रणनीतिक स्वायत्तता और दूसरा, रणनीतिक बहुलता. इसका एक अहम उद्देश्य यह भी है कि ब्रिक्स पर किसी एक ताकत का दबदबा न बन सके.
बराबरी की मांग
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ताकत के असमान बंटवारे को लेकर भारत का रुख ग्लोबल साउथ के भीतर मौजूद व्यापक असंतोष को भी दिखाता है.
समस्या सिर्फ यह नहीं है कि सभी देशों को बराबर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. समस्या ऐसी संस्थागत व्यवस्था की भी है, जिसमें जिन देशों के पास फैसले लेने की सबसे ज्यादा ताकत होती है, जरूरी नहीं कि उन फैसलों का सबसे बड़ा असर भी उन्हीं पर पड़े.
भारत के सामने विकल्प है कि वह मजबूती और नए प्रयोगों के जरिए विकास की कहानी को आगे बढ़ाए और एजेंडा तय करने की ताकत हासिल करे. इसके बजाय वह केवल डॉलर से दूरी बनाने या भू-राजनीतिक टकराव पर जोर देने का रास्ता भी चुन सकता था.
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी का पिरामिड ऑफ प्रिविलेज से पिरामिड ऑफ पार्टनरशिप की ओर बढ़ने का आह्वान खास महत्व रखता है.
भारत की अध्यक्षता के सामने अब असली चुनौती यह है कि सुधार की बात को जमीन पर काम करने वाली व्यवस्था में कैसे बदला जाए. खास तौर पर व्यापार को झटकों से बचाने, वित्तीय व्यवस्था, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और समुद्री स्थिरता जैसे क्षेत्रों में ठोस व्यवस्था बनानी होगी.
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि साझेदारी केवल ताकत और विशेषाधिकार की ऊंच-नीच पर आधारित न रहे, बल्कि ऐसी संस्थागत व्यवस्था बने जिससे इसके फायदे ज्यादा देशों तक पहुंचें.
आर्थिक सहयोग बढ़े
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बिजनेस फोरम में ब्रिक्स के दायरे को बढ़ाने और अलग-अलग देशों की एक-दूसरे से जुड़ी क्षमताओं का इस्तेमाल करके एक आर्थिक व्यवस्था तैयार करने की जरूरत पर जोर दिया.
ब्रिक्स ने क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने, मजबूत व्यापार व्यवस्था बनाने और फोटो-वोल्टाइक क्षेत्र में विकास यानी सौर ऊर्जा से बिजली बनाने के क्षेत्र में विकास के लिए सहयोग बढ़ाने की दिशा में अपनी पहुंच बढ़ाई है. इसके साथ संस्थागत स्तर पर ब्रिक्स इनक्यूबेटर नेटवर्क (नए कारोबार और स्टार्टअप को बढ़ावा देने वाला ब्रिक्स नेटवर्क), एमएसएमई पोर्टल और स्टार्टअप इनोवेशन फंड जैसी पहलें भी शामिल हैं.
अब आगे जरूरी है कि मुद्रा के हस्तांतरण, सीमा पार भुगतान व्यवस्था और डिजिटल सुधारों को लागू करने के लिए तय समयसीमा जैसी जरूरी व्यवस्थाएं बनाई जाएं. इससे आर्थिक सहयोग का यह आधार और मजबूत हो सकता है.
सहमति का नया मॉडल
भारत की सफलता के कई पहलुओं को सामने रखा जा सकता है. भारत ने ब्रिक्स को सहमति तक नहीं पहुंच पाने की स्थिति से निकालकर दिल्ली घोषणा के तहत ऐसी सहमति के ढांचे की ओर ले जाने की कोशिश की है, जिसमें मतभेदों को संभालते हुए आगे बढ़ा जा सके.
यह सहमति अस्पष्टता और एकरूपता न होने पर आधारित थी. इसका मतलब जरूरी नहीं कि समझौता हो. इसके बजाय यह व्यावहारिक सोच पर जोर देती है.
प्रधानमंत्री मोदी ने सहयोग के लिए चार पहल वाले विचार साझा किए. इनमें ब्रिक्स के तीन अध्यक्ष देशों- पिछले, मौजूदा और अगले- के बीच तालमेल की व्यवस्था, वर्ल्ड ऑर्डर में सुधार केलिए आगे की योजना, समुद्री जहाजों में काम करने वाले लोगों का नेटवर्क और ग्लोबल साउथ के देशों को अंतरराष्ट्रीय बातचीत और समझौते में मदद देने की व्यवस्था शामिल हैं.
नाम लिए बिना ईरान-यूएई दोनों के लिए रास्ता
भारत ने किसी देश का सीधे नाम लेने से भी बचने की कोशिश की और ऐसी भाषा अपनाई जो ईरान और यूएई दोनों के लिए स्वीकार्य हो सके.
इससे यह संकेत मिलता है कि भारत ब्रिक्स को वैश्विक व्यवस्था में सुधार और संतुलन लाने वाले एक साधन के रूप में बदलने की कोशिश कर रहा है.
ब्रिक्स बिजनेस फोरम से उभरता एजेंडा विकास आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था की ओर भी इशारा करता है. इसमें विकासशील देशों की सुरक्षा और समृद्धि को वैश्विक स्थिरता का जरूरी हिस्सा माना जाता है, न कि ऐसी चिंता जिसे किनारे रखा जा सकता है.
साझेदारी पर आधारित व्यवस्था का मतलब यह जरूरी नहीं कि मौजूदा संस्थाओं को खत्म कर दिया जाए. इसके बजाय कोशिश यह हो सकती है कि इन संस्थाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने वाला, ज्यादा जवाबदेह और ज्यादा प्रभावी बनाया जाए, ताकि वे ज्यादा विविध वैश्विक व्यवस्था के हितों को जगह दे सकें.
चीन का बढ़ता वजन
चीन और रूस ने ब्रिक्स में पहले से चल रहे सहयोग को आगे बढ़ाने में मदद की है, हालांकि दोनों देशों की ब्रिक्स को लेकर अपनी-अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं भी हैं.
चीन का बढ़ता आर्थिक वजन और ग्लोबल साउथ के लिए ज्यादा प्रभावशाली मंच की उसकी इच्छा ब्रिक्स को पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली संस्थाओं के सामने ज्यादा मजबूत चुनौती देने की क्षमता देती है.
चीन ऐसी परिस्थितियों में कर्ज देने में सक्षम है, जहां प्रक्रियात्मक नियमों की पाबंदियां कम होती हैं. इससे उन विकासशील देशों को कुछ गुंजाइश मिलती है, जिन्हें वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के नियमों के तहत पूंजी हासिल करने में मुश्किल होती है.
चीन का मानना है कि ब्रिक्स को नए प्रयोगों और तकनीक के सहारे विकास को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए.
रूस की अलग प्राथमिकता
दूसरी ओर, पश्चिमी देशों के साथ भू-राजनीतिक तनाव का सामना कर रहा रूस ब्रिक्स को अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता बनाए रखने और ज्यादा बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को आगे बढ़ाने के एक अहम माध्यम के रूप में देखता है.
द्विपक्षीय बैठक के दौरान पुतिन ने जी7 पर भी तंज किया कि वह ग्लोबल साउथ की आवाजों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करता.
ब्रिक्स की सोच और भारत की अपनी राह
भारत चीन के प्रभाव को पूरी तरह रोक नहीं सकता. वह ब्रिक्स के भीतर चीन के आर्थिक वजन की बराबरी भी नहीं कर सकता और न ही चीन को संगठन के सबसे प्रभावशाली देशों में से एक बनने से रोक सकता है.
लेकिन भारत ब्रिक्स की सोच और संस्थागत दिशा तय करने की होड़ में जरूर शामिल हो सकता है.
भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने के लिए रूस और चीन दोनों की जरूरत है. साथ ही वह बड़ी वैश्विक व्यवस्था के लिए नियमों और मानकों की दिशा तय करने वाली ताकत भी बनना चाहता है.
2026 के शिखर सम्मेलन में भारत ने विकास और साझेदारी के साथ-साथ आतंकवाद के खिलाफ मजबूत विचारों के लिए भी समर्थन हासिल किया है.
नई बहुपक्षीय व्यवस्था
2026 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अहमियत इस कोशिश में है कि यह दिखाया जा सके कि बहुपक्षीय व्यवस्था का एक अलग मॉडल भी संभव है.
ऐसी व्यवस्था जिसमें वैश्विक स्तर पर फैसले लेने का आधार विशेषाधिकार नहीं, बल्कि साझेदारी हो.
लेकिन मजबूत साझेदारी तभी सफल हो सकती है जब उसकी नींव भरोसे पर हो. भारत की 2026 की अध्यक्षता की अहमियत का एक हिस्सा इसी कोशिश में है कि तेजी से अलग-अलग दिशाओं में बंटते सदस्य देशों के बीच राजनीतिक भरोसा बनाया जाए.
समाज तक पहुंच
ब्रिक्स ने समाज के अलग-अलग हिस्सों को साथ लेकर चलने वाले नजरिए को अपनाते हुए विभिन्न साझेदारों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई है.
भारत ने भरोसा बनाने की कोशिश की है. आज बंटी हुई वैश्विक व्यवस्था में भरोसा खुद एक बेहद महत्वपूर्ण पूंजी बन गया है.
ब्रिक्स ने क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने, मजबूत व्यापार व्यवस्था, एमएसएमई को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने और फोटो-वोल्टाइक क्षेत्र में विकास के लिए सहयोग बढ़ाने की दिशा में अपनी पहुंच बढ़ाई है.
इसके साथ इनक्यूबेटर नेटवर्क्स जैसी पहलें भी की गई हैं, ताकि तेजी से बदलती तकनीकों से पैदा होने वाले झटकों का सामना करने में मदद मिल सके.

ब्रिक्स का नया डीएनए
कुल मिलाकर भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स ने सबको साथ लेकर चलने, नए तरीके अपनाने, टिकाऊ विकास और आपसी सहयोग पर जोर दिया है.
यह उस चुनौती का जवाब है जो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में हो रहे तेज बदलाव सामने ला रहे हैं.
2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन संगठन के 20 साल पूरे होने के साथ एक नए दौर की ओर इशारा करता है. भारत ने विकास, संस्थागत सुधार, आर्थिक सहयोग, तकनीक, कनेक्टिविटी और ग्लोबल साउथ की आवाज को आगे रखा है. चीन अपने आर्थिक वजन और रूस अपनी बहुध्रुवीय व्यवस्था की सोच के जरिए ब्रिक्स को रणनीतिक ताकत दे रहे हैं. भारत चीन के आर्थिक प्रभाव की बराबरी नहीं कर सकता, लेकिन ब्रिक्स की बौद्धिक और संस्थागत दिशा को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है. अब असली चुनौती साझेदारी को भरोसे और ठोस व्यवस्था में बदलने की है.
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