- 2012 में धीमी अर्थव्यवस्था, महंगाई और रेटिंग घटने के खतरे ने भारत को ब्रिक की कमजोर कड़ी की छवि दी थी.
- 2026 की पहली तिमाही में 7.8 फीसद जीडीपी ग्रोथ ने भारत की तेज आर्थिक विकास की कहानी को फिर मजबूत किया है.
- दिल्ली में चीन, रूस, ईरान समेत 21 देशों के नेताओं का जुटना भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका को दिखाता है.
एक समय था जब सवाल उठता था कि भारत को ब्रिक्स में होना भी चाहिए या नहीं. आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. 2026 में भारत न सिर्फ ब्रिक्स की मेजबानी कर रहा है, बल्कि तेज आर्थिक विकास और बढ़ते वैश्विक असर के साथ इसकी अहम ताकत बनकर उभरा है.
भारत 2026 में अभी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. ऐसे में उस 14 साल पहले की तस्वीर याद करना जरूरी है जब भारत ने 2012 में पहली बार इस सम्मेलन की मेजबानी की तब भारत को लेकर दुनिया का नजरिया आज से काफी अलग था.
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तब बहस यह नहीं थी कि भारत ब्रिक (तब दक्षिण अफ्रीका इसका सदस्य नहीं था) को कितना प्रभावित कर सकता है. बल्कि सवाल यह था कि क्या भारत को इस समूह में अपनी जगह बनाए रखने का हक भी है.
उस समय ऐसे सवाल लगातार उठते थे. क्या भारत को सच में ब्रिक्स में होना चाहिए? इंडोनेशिया के शामिल होने से बने ब्रिक्स में क्या भारत की जगह यह ईस्ट इंडीज देश ले सकता है? क्या भारत इस समूह की सबसे कमजोर कड़ी है?
इन सवालों की वजह तब की भारतीय अर्थव्यवस्था भी थी. करीब डेढ़ दशक पहले देश महंगाई डायन से जूझ रहा था. रुपया बेहद दबाव में था, डॉलर के मुकाबले तेजी से इसमें गिरावट आ रही थी. 2012 से 2013 के दौरान रुपये की कीमत 50 से घटकर 60 प्रति डॉलर हो गया था. यानी केवल दो सालों के दौरान ही इसकी कीमत में 20 फीसद गिरावट देखी गई थी. ऐसे में आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही थी.
2012 में भारत को लेकर क्यों उठ रहे थे सवाल?
गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने वैल्यूएशन के नजरिए से भारत को ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था में सबसे कम आकर्षक बताया था.
तब स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स ने चेतावनी दी थी कि भारत ब्रिक्स नेशंस के बीच पहला ऐसा देश बन सकता है, जिसकी निवेश योग्य सॉवरेन रेटिंग खत्म हो जाए. मूडीज, स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स और फिच जैसी प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसियां किसी देश के आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता, विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय घाटे की स्टडी करके यह रेटिंग तय करती हैं.
तब भारत की रेटिंग BBB- थी, जो निवेश योग्य दर्जे की सबसे निचली सीढ़ी थी. बीबीबी- माइनस जिस देश को रेटिंग दी जाती है, उसकी अर्थव्यवस्था कर्ज चुकाने में सक्षम तो मानी जाती है लेकिन वित्तीय स्थिति बहुत मजबूत नहीं मानी जाती है और वह आर्थिक बदलावों के प्रति संवेदनशील मानी जाती है. स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स ने भारत के आर्थिक विकास में कमजोरी और बढ़ते चालू खाते के घाटे को लेकर चिंता जताई थी.
भारत की विकास दर भी तेजी से नीचे आई थी. 2012-13 में अर्थव्यवस्था की सालाना विकास दर करीब 5 फीसद रही. 2012 के आसपास महंगाई भी बड़ी चुनौती बनी हुई थी. उस समय की सरकारी आर्थिक रिपोर्टों में धीमी घरेलू विकास दर और ऊंची महंगाई को बड़ी चिंता बताया गया था.
यानी तब भारत को ब्रिक्स की अगली बड़ी ताकत के बजाय उसकी कमजोर कड़ी के तौर पर देखने की कहानी मजबूत हो रही थी.
फिर ब्रिक्स में भारत की तस्वीर कैसे बदली?
आज यानी 2026 में भारत की कहानी काफी अलग है. भारत की आर्थिक विकास की रफ्तार में सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिलता है.
भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 फीसद वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर्ज की. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह वित्त वर्ष 2025-26 की इसी तिमाही के 6.9 फीसद से ज्यादा है.
यही वह बदलाव है जिसने कमजोर कड़ी की पुरानी छवि से निकालकर भारत को आज ब्रिक्स समूह के बड़े ग्रोथ इंजनों में ला खड़ा किया है.
2010 के शुरुआती वर्षों में जहां भारत की धीमी होती विकास दर चिंता का कारण थी, वहीं 2026 में तेज आर्थिक विकास भारत की सबसे बड़ी ताकतों में गिना जा रहा है.
रेटिंग की कहानी भी बदली
2012 में बड़ा सवाल ये था कि क्या भारत की रेटिंग निवेश योग्य से भी नीचे जा सकती है. पर आज भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर तस्वीर इसके उलट दिखती है.
इसी महीने जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की सॉवरेन रेटिंग BBB+ से बढ़ाकर A- कर दी और आउटलुक स्थिर रखा.
BBB+ वाले देश की वित्तीय स्थिति मध्यम से संतोषजनक मानी जाती है और उसे अपने कर्ज चुकाने में सक्षम माना जाता है. वहीं A- वाले देश की वित्तीय स्थिति मजबूत और उसके ऋण चुकाने की क्षमता अच्छी मानी जाती है. यह AAA और A+ जैसी सर्वोच्च रेटिंग से एक पायदान नीचे होती है.
रेटिंग एजेंसी ने भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, वित्तीय स्थिति में सुधार, मजबूत बैंकिंग व्यवस्था और बेहतर बाहरी स्थिति को इसके पीछे प्रमुख वजहों में गिना.
यह उस बड़े बदलाव को दिखाता है जिसमें भारत को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार का भरोसा 2012 की तुलना में काफी मजबूत हुआ है.
कई मोर्चे पर मजबूत हुआ भारत
आज भारत की ताकत केवल इसकी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी नहीं है. यह अब कई मोर्चे पर एक साथ दिखाई दे रही है.
पहला- भारत बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.
दूसरा- देश डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पेमेंट और नई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है.
तीसरा- भारत मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े क्षेत्रों में अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
चौथा- आर्थिक मोर्चे पर पहले से अधिक मजबूती ने वैश्विक राजनीति में भी भारत की अहमियत पहले की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है.
भारत ब्रिक्स 2026 के सम्मेलन की ऐसे समय में मेजबानी कर रहा है जब उसकी लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक स्वायत्तता की नीति का अंतरराष्ट्रीय महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ा हुआ है.
रणनीतिक स्वायत्तता किसी देश की वह क्षमता है जिसके तहत वह बिना किसी बाहरी दबाव या अन्य देशों पर अत्यधिक निर्भर हुए, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र विदेश, रक्षा और आर्थिक नीतियां तय करता है.
लंदन स्थित अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक चैथम हाउस ने कहा है कि अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता और भू-राजनीतिक बंटवारे से तेजी से बदलती दुनिया में, स्ट्रैटेजिक हेजिंग और मिडिल-पावर डिप्लोमेसी के प्रति भारत का नजरिया बहुत अहम हो गया है.
स्ट्रैटेजिक हेजिंग अनिश्चितता और जोखिम को कम करने के लिए अपनाई जाने वाली एक सुनियोजित नीति है, जिसका उपयोग आर्थिक मोर्चे और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किया जाता है. वहीं मिडिल पावर डिप्लोमेसी उन देशों की विदेश नीति को कहते हैं जो सुपरपावर नहीं हैं, फिर भी वैश्विक राजनीति में अहम प्रभाव रखती हैं.
अमेरिका और चीन के बीच भारत की अलग जगह
दुनिया इस समय अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, व्यापार तनाव और अलग-अलग भू-राजनीतिक खेमों में बंटने की चुनौती का सामना कर रही है.
इस विकट परिस्थिति में भी भारत किसी एक खेमे में पूरी तरह बंधने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के आधार पर रिश्ते आगे बढ़ाने की कोशिश करता है.
ब्रिक्स के लिए भी यही भारत की खासियत है.
रूस के साथ भारत का एक लंबे समय से चला आ रही स्ट्रैटेजिक रिश्ता है. चीन के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा और सीमा पर गहरे मतभेद सर्वव्यापी है, इसके बावजूद वो ड्रैगन कंट्री के साथ बातचीत जारी रखे है. वहीं अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक रिश्ते पहले के मुकाबले में और वृहद हुए हैं.
ब्रिक्स 2026 के सम्मेलन में यही संतुलन भारत की बड़ी अग्निपरीक्षा भी है.
दिल्ली में जुट रहे दुनिया के बड़े नेता
भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत का एक संकेत यह भी है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दुनिया के कई बड़े नेता नई दिल्ली पहुंच रहे हैं.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से लेकर अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान तक- नई दिल्ली में इतने बड़े नेताओं का एक साथ जुटना ही भारत के बढ़ते कूटनीतिक रसूख और अलग-अलग देशों को एक मंच पर लाने की क्षमता को दर्शाता है.
इसलिए, भारत एक दशक पहले की तुलना में बिल्कुल अलग स्थिति के साथ ब्रिक्स 2026 में प्रवेश कर रहा है. भारत की मजबूत विकास दर, बेहतर होती साख (सॉवरेन क्रेडिबिलिटी), बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में नेतृत्व, नए और अहम क्षेत्रों में गहरी भागीदारी और भू-राजनीतिक स्तर पर अब उसकी स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत है.
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