जातिगत जनगणना पर इतने असमंजस में क्यों है BJP..?

बिहार पहला राज्य है जहां ये सत्ता में सहयोगी हैं और बेमन से समर्थन करना इनकी मजबूरी हैं. लेकिन भाजपा नेताओं की मानें तो अगर बिहार में सर्वदलीय बैठक में पार्टी के नेता भाग ले लेते हैं और फिर कैबिनेट में इनके मंत्रियों की उपस्थिति में ये पारित होता है, उसके बाद ना तो केंद्र और ना दूसरे भाजपा शासित राज्यों में वहां के विपक्ष की मांग के सामने ख़ारिज करना संभव होगा.

जातिगत जनगणना पर इतने असमंजस में क्यों है BJP..?

पटना:

भारतीय जनता पार्टी (BJP), बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) से नाराज है और नाराजगी का कारण किसी से छिपा भी नहीं है. जातिगत जनगणना (Cast Census) पर सर्वदलीय बैठक बुलाने के अलावा, पिछले दिनों राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव पर सीबीआई की छापेमारी के बाद उनका इस मुद्दे से दूर भागते हुए ठंडा बयान भी है.

लेकिन सवाल है कि जो भाजपा छापेमारी के बाद इस बात को आश्वस्त थी कि अब नीतीश कुमार जो तेजस्वी यादव की मांग और आंदोलन की धमकी को आधार बनाकर जातिगत जनगणना पर कदम बढ़ा रहे थे, वो एक बार फिर बचाव की मुद्रा में इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिए मजबूर होते, लेकिन वो भी अब मानते हैं कि हुआ बिल्कुल उल्टा और नीतीश या उनकी पार्टी के किसी प्रवक्ता ने छापेमारी के दिन से मौन रहना बेहतर समझा और जो बयान भी आया, उससे संदेश यही गया कि नीतीश तो कम से कम इससे खुश नहीं हैं. इसके बाद सोमवार को जैसे नीतीश ने सर्वदलीय बैठक और फिर कैबिनेट में लाकर इसे असलीजामा पहनाने की घोषणा की, उससे भाजपा के नेताओं को सांप सूंघ गया है.

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भाजपा नेताओं का कहना है कि नीतीश जानते हैं कि जातिगत जनगणना भाजपा के एजेंडा का हिस्सा कभी नहीं रही. उसके बावजूद विधान सभा और विधान परिषद में इस संबंधित प्रस्ताव का पार्टी ने पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की नाराज़गी नहीं झेलनी पड़े, इसलिए समर्थन किया. यहां तक कि प्रधानमंत्री से मिलने के लिए जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया तो उपमुख्य मंत्री की जगह खान मंत्री जनक राम को भेजा गया, लेकिन पार्टी ने सोचा था कि बात इससे आगे नहीं बढ़ेगी. पार्टी इसलिए असमंजस में है कि विपक्ष में रहकर वो चाहे कर्नाटक हो या उड़ीसा या तेलंगाना, इसने समर्थन तो किया लेकिन कभी भी सत्ता में रहकर ना तो आदेश जारी किया ना इस सम्बंध में कोई पहल की.

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बिहार पहला राज्य है जहां ये सत्ता में सहयोगी हैं और बेमन से समर्थन करना इनकी मजबूरी हैं. लेकिन भाजपा नेताओं की मानें तो अगर बिहार में सर्वदलीय बैठक में पार्टी के नेता भाग ले लेते हैं और फिर कैबिनेट में इनके मंत्रियों की उपस्थिति में ये पारित होता है, उसके बाद ना तो केंद्र और ना दूसरे भाजपा शासित राज्यों में वहां के विपक्ष की मांग के सामने ख़ारिज करना संभव होगा और जातिगत जनगणना का जैसे ही उसके सर्वे के रिपोर्ट आयेंगे, फिर उसके आधार पर मांग की अलग राजनीति शुरू हो जायेगी, जो भाजपा अपने एजेंडा से अलग मानती है. इसलिए नीतीश पर दबाव बनाकर पिछले साल अगस्त से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सर्वदलीय बैठक की मुलाकात के बाद इस मामले को दबाया हुआ था.

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लेकिन भाजपा नेता कहते हैं कि नीतीश ने तेजस्वी की मांग की आड़ में जैसे उन्हें घेरने की चाल चली है, वैसे में उनके पास सीमित विकल्प बचा हैं. या तो पार्टी सरकार से कोई ना कोई बहाना बनाकर अलग हो जाये, क्योंकि जातिगत जनगणना पर सम्बंध तोड़ने से ग़लत संदेश जायेगा. दूसरा नीतीश के एजेंडा पर चलकर साथ दे, लेकिन भविष्य में उसका ख़ामियाज़ा पार्टी को उठाना पड़ सकता है. फिलहाल भाजपा के नेता मानते हैं कि नीतीश ने उन्हें बैकफूट पर तो कर ही दिया है.