विज्ञापन

बालाघाट में 32+ बच्चों की मौत: न महामारी विशेषज्ञ, न लैब; केंद्र की रिपोर्ट में MP सरकार की खुली पोल

बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत के मामले में NJORT की रिपोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर की हैं. महामारी विशेषज्ञ और माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पद खाली होने से लेकर ASHA कार्यकर्ता की कमी तक कई सवाल उठे हैं.

बालाघाट में 32+ बच्चों की मौत: न महामारी विशेषज्ञ, न लैब; केंद्र की रिपोर्ट में MP सरकार की खुली पोल

मध्यप्रदेश के बालाघाट में 32 से ज्यादा बैगा आदिवासी बच्चों की मौत पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दौरे को जहां राज्य सरकार 'पॉलिटिकल टूरिज्म' और वोटों की राजनीति बताती रही, वहीं अब खुद केंद्र सरकार की एक जांच रिपोर्ट ने सरकार के इन दावों की पोल खोल दी है.NDTV के पास मौजूद नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम (NJORT) की इस अंतिम रिपोर्ट के मुताबिक, बालाघाट में बीमारी की निगरानी करने वाली रोग निगरानी प्रणाली (डिजीज सर्विलांस) पूरी तरह फेल हो चुकी थी. जिले में न तो महामारी विशेषज्ञ यानि एपिडेमियोलॉजिस्ट था और न ही जिला जनस्वास्थ्य प्रयोगशाला ही थी. यहां तक की सबसे बुरी तरह प्रभावित गांव तो पिछले एक साल से बिना किसी आशा कार्यकर्ता के चल रहा था.यानी विपक्ष के आरोपों से पल्ला झाड़ने वाली सरकार के अपने ही सिस्टम की नाकामियों को केंद्र की रिपोर्ट ने पूरी तरह बेनकाब कर दिया है. 

Balaghat Children Deaths: नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम की इसी रिपोर्ट ने जिले में स्वास्थ्य इंतजाम के पोल खोल दिए हैं.

Balaghat Children Deaths: नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम की इसी रिपोर्ट ने जिले में स्वास्थ्य इंतजाम के पोल खोल दिए हैं.
Photo Credit: अनुराग द्वारी

जिला अस्पताल से ब्लॉक तक खाली हैं पद

केंद्रीय जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा है कि जिले में रोग निगरानी प्रणाली  यानी डिजीज सर्विलांस बेहद कमजोर है. बालाघाट जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तकनीकी रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले महामारी विशेषज्ञ और माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पद लंबे समय से खाली पड़े थे. एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) की पूरी यूनिट सिर्फ एक डेटा मैनेजर के सहारे घिसट रही थी. बिरसा ब्लॉक में कई स्वीकृत पदों का काम बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर चलाया जा रहा था. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस गांव में बीमारी का प्रकोप सबसे ज्यादा था, वहां एक साल से अधिक समय से कोई आशा कार्यकर्ता ही नियुक्त नहीं थी, जिससे बीमार बच्चों की पहचान और उनका फॉलोअप करने वाला कोई नहीं बचा.

Latest and Breaking News on NDTV

खसरा, मलेरिया और कुपोषण की तिहरी मार.

आंकड़ों के खेल में भी स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही खुलकर सामने आई. फाइलों में जहां सिर्फ 65 मरीज दर्ज थे, वहीं जमीनी स्तर पर हुई जांच में 196 बीमार बच्चे मिले. इनमें से 80 फीसदी बच्चे 10 साल या उससे कम उम्र के थे. जांच के दौरान 25 बच्चे खसरा पॉजिटिव, 27 मलेरिया पॉजिटिव और 12 मासूम दोनों ही खतरनाक बीमारियों की चपेट में एक साथ मिले. इसके साथ ही डेंगू और चिकनगुनिया के भी मामले दर्ज किए गए. कुपोषण का आलम यह था कि बोंदरी गांव की एक 3 साल की बच्ची को जब अस्पताल लाया गया, तो उसका वजन सिर्फ 4.9 किलो था और उसने दो दिन में दम तोड़ दिया. मैदानी इलाकों में 20 से 25 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से दुबले मिले, लेकिन सरकारी पोषण ट्रैकर में इनमें से सिर्फ 30 से 35 फीसदी बच्चे ही रजिस्टर्ड थे.

सुध लेने कोई डॉक्टर नहीं पहुंचा, अपनों को खोने का दर्द

केंद्रीय रिपोर्ट के इन आंकड़ों पर पीड़ित परिवारों की गवाही भी मुहर लगाती है. जंगला गांव के बामिन बैगा ने बताया कि उनकी बेटी के पूरे शरीर पर दाने (माता आना) निकले थे. अस्पताल में सात दिन इलाज के बाद भी उसकी जान नहीं बच सकी.

बामिन अब अपने गांव में ही एक अस्पताल चाहती हैं. वहीं हिरोंदी नाम की महिला ने रोते हुए बताया कि उनके बच्चे को पीलिया, बुखार और दाने थे, लेकिन घर पर कोई सरकारी डॉक्टर दवा देने नहीं आया, जिसके कारण उन्हें कर्ज लेकर निजी डॉक्टर से इलाज कराना पड़ा.

कई पीड़ित परिवारों ने बताया कि मौत के बाद न तो उन्हें कोई मुआवजा मिला और न ही कोई अधिकारी उनके आंसू पोंछने पहुंचा.

15 दिन पहले ही कलेक्टर के पास थी रिपोर्ट, फिर भी नहीं जागा सिस्टम

केंद्रीय टीम ने अपनी मैदानी जांच 13 से 18 अगस्त के बीच पूरी कर ली थी. इसके बाद 16 सितंबर को ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्य प्रदेश ने इस अंतिम रिपोर्ट को बालाघाट कलेक्टर को सौंपकर जरूरी कार्रवाई और बिंदुवार रिपोर्ट मांगी थी. यानी राहुल गांधी के एक अक्टूबर के दौरे से दो सप्ताह से भी पहले ये सारे चौंकाने वाले तथ्य प्रशासन के सामने थे, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

राहुल गांधी का हमला: "शासन की बहुत बड़ी विफलता है"

रिपोर्ट आने के ठीक 15 दिन बाद यानी एक अक्टूबर को कांग्रेस नेता राहुल गांधी बैहर विधानसभा क्षेत्र के जगला गांव पहुंचे. उन्होंने बैगा आदिवासियों के साथ जमीन पर बैठकर करीब आधे घंटे तक उनका दर्द सुना. इसके बाद राहुल गांधी ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, “मध्य प्रदेश में शासन की बहुत बड़ी विफलता है. सरकार पूरी तरह विफल हो गई है. देश के बीचोंबीच आदिवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है.” राहुल ने इस दौरान सभी बच्चों की मौत को कुपोषण से जोड़ा.

सीएम और डिप्टी CM का पलटवार: बताया ‘पॉलिटिकल टूरिज्म'

राहुल गांधी के इस हमले पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तीखा पलटवार किया. उन्होंने राहुल गांधी के दौरे पर अप्रत्यक्ष हमला करते हुए कहा कि प्रदेश से नक्सलियों के सफाए के बाद वोटों के भूखे नेता बालाघाट पहुंच रहे हैं. मुख्यमंत्री ने पूछा, “अरे भैया, जब तुम्हारी सरकार थी, तब बालाघाट आकर क्यों नहीं दिखाया?” वहीं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने राहुल के इस दौरे को पूरी तरह 'पॉलिटिकल टूरिज्म' करार दिया. उन्होंने कभी 'बीमारू' रहे मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में देश में पहले नंबर पर होने की बात कही. शुक्ल ने सरकार के बचाव में कहा कि मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों ने खुद प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया है. इसके साथ ही उन्होंने चार ब्लॉक महिला विकास अधिकारियों की तैनाती और क्षेत्र में 14 नए उपस्वास्थ्य केंद्रों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू होने का हवाला दिया.
ये भी पढ़ें: धार में कुपोषण की मार: 25 हजार बच्चे कुपोषित, 5 हजार से ज्यादा अति गंभीर श्रेणी में; पोषण व्यवस्था पर उठे सवाल

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Balaghat News In Hindi, Balaghat Tribal Children Death, Rahul Gandhi, Madhya Pradesh News
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com