अयोध्या के वकीलों ने राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गबन के आरोपियों का केस न लड़ने का फैसला लिया है. इस मामले में आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. सोमवार को अयोध्या बार एसोसिएशन की बैठक में आरोपियों की पैरवी न करने का फैसला लिया गया है.
बार एसोसिएशन ने यह भी तय किया है कि अगर कोई वकील इन आरपियों का केस लड़ने की कोशिश करता है तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा.
बैठक में वकीलों ने मांग की कि मंदिर ट्रस्ट से जुड़े रहे चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव को अयोध्या छोड़ देना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर तीन दिन के भीतर तीनों अयोध्या से बाहर नहीं गए तो पूरे शहर की घेराबंदी कर दी जाएगी.
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में आठ आरोपियों- अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लव कुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे, राम शंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और रमाशंकर उर्फ टिन्नू यादव को गिरफ्तार किया गया है. इन आठों को सोमवार को कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.
लेकिन केस क्यों नहीं लड़ेंगे वकील?
वकीलों का कहना है कि चढ़ावे में चोरी से भावनाएं आहत हुई हैं, इसलिए केस न लड़ने का फैसला लिया गया है.
बार एसोसिएशन के सचिव शैलेंद्र जायसवाल ने कहा, 'मंदिर के चढ़ावे की चोरी से हम सभी की भावनाएं आहत हुई हैं. फैजाबाद के वकील गिरफ्तार आरोपियों की ओर से मुकदमा नहीं लड़ने पर सहमत हो गए हैं. इस मामले में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और बार की आम सभा ने फैसला लिया है. इसके बाद आगे की रणनीति तैयार की जाएगी.'
VIDEO | Ayodhya, Uttar Pradesh: Ayodhya Bar Association president Kalika Sharan Mishra, says, "It was decided in the meeting that no lawyer will defend the accused (in Ram Temple donation theft case). It was resolved that the lawyers of our Bar Association will not represent the… pic.twitter.com/Cbu3UaQ3HG
— Press Trust of India (@PTI_News) June 29, 2026
बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कालिका मिक्ष ने रविवार को कहा था कि 2005 में भी अयोध्या के वकीलों ने ऐसा ही फैसला लिया था, तब राम जन्मभूमि परिसर पर हुए आतंकी हमले के आरोपियों की पैरवी नहीं करने का फैसला किया गया था.
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संविधान क्या कहता है?
यह पहली बार नहीं है जब वकीलों ने किसी आरोपी का केस लड़ने का फैसला लिया हो. कई बार वकील ऐसा कर चुके हैं.
हालांकि, भारत का संविधान हर आरोपी को कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार देता है. संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है कि हर किसी को अपनी पसंद के वकील के जरिए अपना बचाव करने का पूरा अधिकार है और इससे वंचित नहीं किया जा सकता.
इसके अलावा, अनुच्छेद 14 के तहत समानता और अनुच्छेद 39A न्याय तक बराबर पहुंच और मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था करता है.
क्या वकील केस लड़ने से मना कर सकते हैं?
ऐसे मामलों में 2010 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक माना जाता है. एएस मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा था कि बार एसोसिएशन के ऐसे प्रस्ताव न सिर्फ असंवैधानिक हैं, बल्कि प्रोफेशनल एथिक्स के खिलाफ भी हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'यह बार की उन परंपराओं के खिलाफ है, जो हमेशा आरोपी का बचाव करने के लिए खड़ी रही है. असल में ऐसा प्रस्ताव कानूनी समुदाय के लिए शर्म की बात है.'
तब कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, 'हम ऐलान करते हैं कि बार एसोसिएशन के ऐसे सभी प्रस्ताव अमान्य और बेकार हैं. अगर वकील चाहते हैं कि देश में लोकतंत्र और कानून का शासन बना रहे तो उन्हें ऐसे प्रस्तावों को नजरअंदाज करना चाहिए.'
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया था कि हर आरोपी, चाहे उसने कितना ही बड़ा अपराध क्यों न किया हो, उसे अपना बचाव करने का अधिकार है. बार एसोसिएशन की ओर से जारी पैरवी न करने वाले प्रस्तावों को सुप्रीम कोर्ट ने 'कानूनी समुदाय के लिए शर्म की बात' बताया था.
अदालत ने यह भी कहा था कि वकील किसी आरोपी का प्रतिनिधित्व करने से इनकार करके जज की भूमिका नहीं निभा सकते. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया था कि प्रोफेशनल एथिक्स के तहत वकीलों को सभी आरोपियों को बचाव करना चाहिए, चाहे लोगों की राय कुछ भी हो.
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बार काउंसिल के नियम क्या कहते हैं?
इसे लेकर बार काउंसिल के भी नियम हैं. बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम साफ करते हैं कि हर वकील को अपने मुवक्किल की पैरवी करना चाहिए, सिवाय उन मामलों के जहां मना करने का कोई ठोस कारण हो. नियम कहते हैं कि किसी खास हालात में किसी खास केस को लेने से इनकार करना सही ठहराया जा सकता है.
बार एसोसिएशन दूसरे वकीलों को रोक सकता है?
कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं, जब बार एसोसिएशन दूसरे वकीलों को भी आरोपी का केस लड़ने से रोकते हैं. अयोध्या के मामले में भी ऐसा ही है. फैजाबाद बार एसोसिएशन का कहना है कि अगर कोई वकील केस लड़ता है तो 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा.
लेकिन बार एसोसिएशन ऐसा नहीं कर सकते. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के वकीलों को साफ कहा था कि वे गुरुग्राम के एक स्कूल में 7 साल साल के लड़के की हत्या के मामले में आरोपी का बचाव कर रहे किसी भी वकील के काम में रुकावट न डालें.
पिछले साल उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी साफ किया था कि कोई वकील किसी खास केस में पेश न होने का फैसला कर सकता है. लेकिन बार एसोसिएशन की सदस्यता कम करने की धमकी देकर उसे किसी आरोपी का बचाव करने से नहीं रोका जा सकता.
आरोपी का केस न लड़ना एक तरह से कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालना भी है. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2019 में एक फैसले में कहा था कि जो वकील अदालत की कार्यवाही में बाधा डालते हैं, उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है.
2020 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी कहा था कि वकीलों का आरोपियों की पैरवी न करने के लिए प्रस्ताव पास करना अनैतिक और गैर-कानूनी है.
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