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वैभव सूर्यवंशी को XI से बाहर रखने के फैसले में गौतम गंभीर एंड प्रबंधन पूरी तरह सही

टीम इंडिया आयरलैंड से 2-0 से हारी, तो तमाम चर्चा हार-जीत से हटकर वैभव सूर्यवंशी पर आकर सिमट गई, सूर्यवंशी को शुरुआती दो मैचों से से बाहर रखने पर शोर तूफान सा गूंज रहा है, फैंस गंभीर के पीछे पड़े हुए, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है

वैभव सूर्यवंशी को XI से बाहर रखने के फैसले में गौतम गंभीर एंड प्रबंधन पूरी तरह सही
आयरलैंड से हार से ज्यादा चर्चा वैभव सूर्यवंशी को न खिलाने की हो रही है
Source: Social media

पिछले दिनों आयरलैंड के खिलाफ दो टी20 मैचों की सीरीज और फिर इंग्लैंड के खिलाफ बारिश के कारण रद्द हुए पांच टी20 मैचों की सीरीज के पहले मुकाबले तक पहुंचते-पहुंचते टीम इंडिया प्रदर्शन में सुधार करती दिखाई पड़ी है. इसकी वजह चेस्टर-ली-स्ट्रीट में लगभग भारत जैसी पिच का मिलना रहा. उम्मीद है कि बाकी चार मैचों में लगभग ऐसी ही पिचें मिलेंंगी और श्रेयस अय्यर एंड कंपनी बेहतर प्रदर्शन करते हुए उबल रहे आलोचकों का गुस्सा शांत करने में सफल रहेगी, जो आयरलैंड दौरे में टीम की हार से कहीं ज्यादा वैभव सूर्यवंशी को XI में मौका न देने से उपजा. आयरलैंड पहुंचने के बाद से अभी तक टीम इंडिया की इस छोटी यात्रा तक तमाम पंडितों, पूर्व क्रिकेटरों और खासकर मीडिया की चर्चा का  केंद्र पूरी तरह से वैभव सूर्यवंशी बन गए हैं. सवाल और बहस विश्व कप चैंपियनों की आयरलैंड दौरे में दुनिया की नंबर-12 टीम से हारने पर ज्यादा होने चाहिए थी, लेकिन यह हार पीछे छूट गई. और वैभव सूर्यवंशी को भारतीय XI में मौका देने या न देने का विषय फ्रंटफुट पर आ गया.

आयरलैंड की मुश्किल पिचों पर टीम अय्यर की 2-0 से एक बार टीम इंडिया की हार क्या हुई कि यह चर्चा एक अलग ही स्तर पर पहुंच गई. और हार के बाद ज्यादातर मौकों की तरह हेड कोच गौतम गभीर विशेष रूप से उस बड़े वर्ग के निशाने पर आ गए, जो चयन 'परंपरा', तर्कों और बाकी तमाम बातों से परे हर हाल में वैभव सूर्यवंशी को पहले ही मैच से भारतीय XI का हिस्सा बनते देखना चाहता था. और गौतम पर लगाए हगए निशाने की 'धार' कितनी तेज है, यह सोशल मीडिया पर कमेंटों और कुछ विद्वानों के बयाने में साफ देखा जा सकता है, जिनका सोशल मीडिया पर नियमित अंतराल पर आना जारी है. पानी पी-पीकर गौतम गंभीर को कोसने ने एक नया ही स्तर हासिल कर लिया. ध्यान दीजिए  कि यह गुस्सा हार के लिए नहीं,  बल्कि वैभव सूर्यवंशी को सीरीज में मौका न देने के लिए रहा. 

इस स्थिति के लिए बहुत हद तक ऑफिशियल ब्रॉडकास्टर भी जिम्मेदार है. मानो सब कुछ बाजार हो चला है, तो कुछ दिन पहले श्रीलंका में हुई A टीमों की त्रिकोणीय सीरीज के लिए वैभव सूर्यवंशी का चयन होते ही चैनल ने सूर्यवंशी को "भुनाने" को लेकर'फर्स्ट गीयर' डाल लिया. एकदम से आखिरी पलों में A सीरीज के सीधे प्रसारण का चैनल ने फैसला लिया. और आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे के लिए वैभव का टीम इंडिया में चयन होते ही  चैनल ने सूर्यवंशी को केंद्र में "धुरंधर प्रोमो (विज्ञापन)" तैयार करा दिया.

सोशल मीडिया के पोस्टर सहित चैनल प्रोमो में पहली बार कप्तान बने श्रेयस अय्यर से भी बड़ा सूर्यवंशी का चेहरा! सूर्यवंशी मैच में नहीं खेले, लेकिन मैच के दौरान हर दस मिनट ब्रेक के बाद उनके नाम के साथ प्रोमो के साथ स्क्रीन पर 'धुरंधर' उपस्थित थे. दुनिया भर के करोड़ों फैंस ने दे दनादन वैभव के लिए 399 रुपये का सब्स्क्रिप्शन सीरीज शुरू होने से पहले ही  करा लिया था. और जब सूर्यवंशी को मौका नहीं ही मिला, तो टीम इंडिया को मिली हार के बाद तमाम सोशल मीडिया धुरंधरों के निशाने पर हेड कोच गौतम गंभीर आ गए. आखिर गौतम गंभीर कहां गलत हैं? चलिए करीब तीन महीने पीछे का रुख करते हैं.

करीब तीन महीने पहले ही 8 मार्च को करोड़ों भारतीय फैंस भारत की टी20 विश्व कप की खिताबी जीत पर झूम रहे थे. हमारी यादाश्त इतनी छोटी क्यों हो चली है? क्या हम बहुत ज्यादा कृतघ्न हो चले हैं? क्या हमें हकदार लोगों को श्रेय देना नहीं आता? या हम बहुत ज्यादा उतावले हैं? या "तस्वीरें" हमारी इंद्रियों को ज्यादा आनंद प्रदान करती हैं? और क्या ये 'तस्वीर' ठीक वही होनी चाहिए, जो हम देखना चाहते हैं? करीब तीन महीने पहले ही यह संजू सैमसन ही थे, जिन्होंने मेगा टूर्नामेंट मे आखिरी तीन पारियों में सुपर से ऊपर की पारियां खेलते हुए टीम इंडिया को विश्व कप जिताकर 'प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट' बने थे? आखिरकार दुनिया की किसी भी टीम का प्रबंधन  किस मुंह और किस तर्क से संजू सैमसन को XI से बाहर बैठा सकता था? अभिषेक शर्मा भी विश्व कप विजेता टीम का हिस्सा थे? और जब लंबे ब्रेक के बाद कोई सीरीज आ रही थी, तो इस अति प्रतिस्पर्धात्मक पेशे (जहां सप्ताह भर में समीकरण बदल जाते हैं) में कैसे टॉप ऑर्डर बल्लेबाज को बाहर रखकर सूर्यवंशी को मौका देना जायज होता? उन खिलाड़ियों के बदले, जिन्होंने विश्व कप जिताया था. हां, सीरीज शुरू होने से पहले एक रास्ता जरूर था, लेकिन यह भी बहुत और बहुत ही ज्यादा धुंधला था.  

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आयरलैंड टीम की उसकी फर्स्ट XI के छह नियमित खिलाड़ी टीम में नहीं थे. चोट के कारण उसके स्टार क्रिकेटर और पूर्व कप्तान पॉल स्ट्रिंग (पिंडली की चोट), जोश लिटिल (फ्रैक्चर), मार्क एडेर (मांसपेशी की चोट), कर्ठिस कैंफर (हाथ में फ्रैक्चर), बैरी मैक्कार्थी (मांसपेशी में चोट) और जॉर्डन नील (कंधे में चोट) के कारण अपनी सेवाएं नहीं दे सके. क्या यह दूसरी पंक्ति की आयरिश टीम नहीं थी? बहरहाल, ऐसे में BCCI इस तर्क के साथ कुछ युवा खिलाड़ियों को आयरिश दौरे के लिए टीम में शामिल कर सकता था. लेकिन अगर ऐसा होता, तो फिर आयरलैंड दौरे के तुरंत दो दिन बाद इंग्लैंड के खिलाफ शुरू होने वाली पांच मैचों की सीरज का क्या होता? इस सीरीज के लिए सीनियर खिलाड़ियों को तैयारी का मंच और जरूरी प्रैक्टिस कहां मिलती? और अगर दूसरी पंक्ति के कुछ खिलाड़ियो को भेजा भी जाता, तो मेजबान देश और ब्रॉडकास्टर के के प्रथम पंक्ति की टीम भेजने के दबाव का क्या होता? जाहिर है कि कुछ युवा खिलाड़ियों को जगह देने का तर्क भी बेदम हो जाता है. फिर वही सवाल अपनी जगह आ खड़ा होता है कि टॉप ऑर्डर में आखिर गौतम एंड प्रबंधन किसकी और क्यों वैभव को जगह देता? 

आयरिश सीरीज में करोड़ों फैंस ने बिना कदमताल के पहले मैच में संजू सैमसन को खड़े-खड़े काफी दूर से और फिर दूसरे मैच में कप्तान श्रेयस अय्यर खासी दूर से गेंद का पीछा करने कीशिश में बोल्ड होते देखा. जिस पिच पर गेंद का खासा इंतजार करने की जरूरत थी, अय्यर चौथे-पांचवें स्टंप की गेंद को खेलने चले गए. उनकी मनोदशा ऐसी थी कि मानो वह बेल्फास्ट में नहीं, बल्कि दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में खेल रहे हों. स्टेट-ऑफ-माइंड (मनोदशा), एप्रोच (रवैया) और एप्पलीकेशन (अमलीकरण) तीनों ही पहलुओं में आईपीएल समाया हुआ था. आयरलैंड की स्पॉन्जी पिच (जहां गेंद उम्मीद से काफी ठहरकर आती है, अक्सर दोहरा उछाल भी, आयरलैंड में करीब 40 %) जहां गेंद बहुत ज्यादा रुक कर आ रही थीं, जहां गेंद को लेट और काफी इंतजार करके खेलना था, जहां तकनीकी समायोजन करने थे, वहां भारतीय बल्लेबाजों का क्या हाल हुआ, यह दुनिया के सामने है.

जरा खुद से सवाल कीजिए कि क्या वैभव आयरलैंड की पिचों के खासे धीमपेन से समायोजित कर पाते? क्या आति आक्रामक शैली में खेलने वाले वैभव आयरलैंड की पिच पर तकनीकी समायोजन (खासतौर पर बैकलिफ्ट को तुलनात्मक रूप से धीमा..वगैरह-...वगैरह) कर पाते? वैभव जो फ्रंटफुट पर पैर निकालकर स्लैश हार्ड (दोनों हाथ खोलकर प्वाइंट से मारने जैसा) या स्कवॉयरिश ड्राइव खेलते हैं, उसमें यहां की पिचों पर सफल हो पाते? यह वह पहलू है, जिसमें वैभव की 'पावर-शैली' से खेलने और आयरलैंड की पिचों के धीमेपन को देखते हुए खासा जोखिम निहित था. अब कल्पना कीजिए कि अगर वैभव शुरुआती दोनों मैचों में फ्लॉप हो जाते, तो इस स्थिति में वो तमाम पंडित क्या कह रहे होते, जो वैभव को शुरुआती मैचों से ही मौका देने की बात कर रहे हैं? और वैभव को मौका न देने के लिए गंभीर के खून के प्यासे बन गए हैं. बहरहाल, अब आयरलैंड सीरीज में हार के बाद क्या?

अब एक बड़ा वर्ग वैभव को इंग्लैंड में पहले मैच से ही XI में खिलाने की बात कर रहा है? क्यों? तीन महीने पहले विश्व कप जिताने वाले प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट सिर्फ दो ही मैचों में तो नाकाम हुए हैं. आखिर किसी इस स्तर के खिलाड़ी को ड्रॉप करने के लिए कम से कम कितने मैचों का पैमाना होना चाहिए? आखिर क्यों इस स्तर के परफॉरमर ही नहीं, बल्कि किभी भी खिलाड़ी को चार-पांच मैच नहीं मिलने चाहिए? कुछ दिन पहले ही महान गावस्कर ने कहा था कि एकदम से ही किसी को इंडिया कैप नहीं देनी चाहिए? इंडिया कैप को खिलाड़ी विशेष को आप कमाने दें. ऐसे में वैभव को भी आप इंडिया कैप कमाने दें? दरवाजे का एक गेट खुला है! शुरुआती दो मैचों में टॉप ऑर्डर के दोनों बल्लेबाज नाकाम हुए हैं, लेकिन दरवाजे का आधा हिस्सा खुलना अभी बाकी है. शुरुआत जब प्रबंधन ने मेरिट आधारित चयन पर की थी, तो इस मेरिट को बने ही रहनें दें. बाकी वैभव का अपना,  सही और जायज समय आएगा. ठीक वैसे ही, जैसे उन्हें अगरकर एंड कंपनी ने 15 सदस्य टीम में जगह देकर लाया. धैर्य रखें, सचिन का रिकॉर्ड भी टूटेगा, वैभव का बल्ला भी  सुनामी अंदाज में बोलेगा, लेकिन फिलहाल वर्तमान समय में तो गंभीर एंड कंपनी अपने फैसले में सही है.

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