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पंजाब में लौटने वाले अग्निवीरों का भविष्य बन रहा चुनावी मुद्दा, 2027 चुनाव से पहले क्यों बढ़ी सरकार की चिंता?

चार साल की सैन्य सेवा के बाद जल्द ही अग्निवीर का पहला बैच लौटने वाला है, लेकिन उनकी नौकरी और पुनर्वास की गारंटी की मौजूदा हकीकत क्या है? पंजाब में यही सवाल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी सियासी लड़ाई बनता दिख रहा है.

पंजाब में लौटने वाले अग्निवीरों का भविष्य बन रहा चुनावी मुद्दा, 2027 चुनाव से पहले क्यों बढ़ी सरकार की चिंता?
अग्निवीरों का पुर्नवास पंजाब के विधानसभा चुनाव 2027 में बन रहा बड़ा मुद्दा
PTI/NDTV
  • पहले बैच के करीब 75 फीसद अग्निवीर इस साल के अंत तक सेना से बाहर होंगे, जिनमें 1,000 से ज्यादा पंजाब के हैं
  • पंजाब की प्रस्तावित नीति में कांस्टेबल के 10%, ऑफिस गार्ड के 20% पद अग्निवीरों के लिए आरक्षित करने की बात है
  • लेकिन ये अभी लागू नहीं है. अग्निवीरों के पुनर्वास का मुद्दा विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बहस तेज कर सकता है

केंद्र सरकार ने हाल ही में राज्यसभा को बताया है कि अग्निवीरों के पहले बैच के लगभग 75 फीसद जवान इस साल के आखिर तक भारतीय सशस्त्र बलों से बाहर हो जाएंगे. इनकी संख्या करीब 34500 होगी. इनमें 1000 से अधिक पंजाब से हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान की 12 मई को की गई घोषणा में इनके दोबारा रोजगार की योजनाएं अभी भी सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं. ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल यही है कि चार साल सेना में सेवा देने के बाद इन युवाओं के लिए आगे क्या है?

पंजाब सरकार ने रोजगार और पुनर्वास से जुड़ी घोषणाएं तो की हैं, लेकिन जमीन पर उनके लागू होने का इंतजार है. यही देरी और उनके अनिश्चित भविष्य का मुद्दा अब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीति के लिए एक बड़ा आधार बन रहा है. और लौटने वाले अग्निवीरों का अनिश्चित भविष्य विपक्ष को आम आदमी पार्टी सरकार को घेरने का मौका दे रहा है.

प्रस्तावित आरक्षण और पुनर्वास नीति में अग्निवीरों के लिए पुलिस कांस्टेबल के 10 फीसद पद और ऑफिस गार्ड के 20 फीसद पद आरक्षित करने की बात है. लेकिन यह नीति अभी तक लागू नहीं हुई है. विपक्ष इसी को मुद्दा बनाकर सरकार पर दबाव बनाने की तैयारी में है.

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Photo Credit: PTI/NDTV

पंजाब में सेना भर्ती क्यों घट रही है?

पंजाब और भारतीय सेना का रिश्ता काफी पुराना और मजबूत रहा है. राज्य के कई परिवारों में सेना में जाना गौरव और परंपरा का हिस्सा रहा है. लेकिन अब युवाओं में सेना में भर्ती होने का उत्साह कम होता दिखाई दे रहा है.

छोटी अवधि की सैन्य सेवा योजना को इसका एक बड़ा कारण माना जा रहा है. विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, लंबे समय से अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा को लेकर सवाल उठाते रहे हैं.

पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा था कि अग्निपथ योजना पंजाब के हितों के खिलाफ है और इसका राज्य के युवाओं पर नकारात्मक असर पड़ा है.

उनके मुताबिक, नई भर्ती व्यवस्था के कारण सेना में पंजाब की मौजूदा हिस्सेदारी 7.8 फीसद से घटकर 2.3 फीसद तक आ सकती है. उन्होंने इसे भारत के लिए पंजाबियों के बलिदान का अपमान बताया था.

Partap Singh Bajwa Congress PTI

कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा
Photo Credit: PTI

बाजवा ने यह चिंता भी जताई थी कि सेना से बाहर आने वाले युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार नहीं हुआ तो पैदा होने वाली स्थिति का फायदा देश विरोधी ताकतें और सीमा पार बैठे दुश्मन उठा सकते हैं.

हालांकि, सिर्फ कांग्रेस ही इस योजना का विरोध नहीं कर रही है.

सेना के पूर्व अधिकारी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी अग्निपथ योजना की आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने केंद्र सरकार से इस नीति की समीक्षा करने की मांग की थी.

उनका कहना था कि चार साल की सेवा एक सैनिक के लिए बहुत कम है और इससे सेना की रेजिमेंटल एकजुटता और लंबे समय से चली आ रही रेजिमेंट की विशिष्ट परंपराओं पर असर पड़ सकता है. उन्होंने इस योजना को एक बड़ी भूल तक बताया था.

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'सिख रेजिमेंट का भविष्य खतरे में' वाले बयान से क्यों मचा हड़कंप?

मुख्यमंत्री भगवंत मान का एक बयान भी काफी चर्चा में रहा है. उन्होंने कहा था कि सिख रेजिमेंट का भविष्य खतरे में है.

मान के मुताबिक, हाल ही में पश्चिमी कमान के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने उनसे मुलाकात की थी और चिंता जताई थी कि सिख रेजिमेंट में भर्ती होने के लिए युवा नहीं मिल रहे हैं.

मान ने सिख रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास का जिक्र करते हुए कहा था कि आज स्थिति ऐसी हो गई है कि रेजिमेंट के लिए पर्याप्त भर्ती नहीं मिल पा रही है. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सिख रेजिमेंट की विरासत को खत्म नहीं होने देगी और इसे बचाना जरूरी है.

यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पंजाब में सेना में भर्ती सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है. इसका संबंध राज्य की सामाजिक और सैन्य विरासत से भी जोड़ा जाता है.

Sikh Regiment ANI

सिख रेजिमेंट
Photo Credit: ANI

पंजाब में सेना भर्ती 60 से 70 फीसद तक घटी?

पंजाब सरकार द्वारा संचालित सेंटर फॉर ट्रेनिंग ऐंड डेवलपमेंट ऑफ पंजाब यूथ यानी C-PYTE के मुताबिक, पंजाब से सेना में भर्ती 60 से 70 फीसद तक घट गई है.

इस साल की शुरुआत में भारतीय सेना ने पंजाब के युवाओं से सिख रेजिमेंट में शामिल होने की अपील भी की थी. इसके बाद कुछ जिलों में भर्ती को लेकर सुधार देखने को मिला.

लेकिन सेना के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि भर्ती में गिरावट के पीछे सिर्फ अग्निपथ योजना नहीं है.

चार साल की सीमित सेवा, पेंशन का न होना और सेवा के बाद भविष्य को लेकर अनिश्चितता इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं.

युवा सेना छोड़कर विदेश क्यों जा रहे हैं?

रिटायर्ड कर्नल दलजीत सिंह चीमा के मुताबिक, पंजाब की नई पीढ़ी जल्दी पैसा कमाना चाहती है. इसलिए कई युवा विदेश जाने या निजी क्षेत्र में नौकरी करने का विकल्प चुन रहे हैं.

उनका कहना है कि सेना की जिंदगी कठिन है और निजी क्षेत्र की कुछ नौकरियों की तुलना में वहां मिलने वाला पैसा युवाओं को उतना आकर्षित नहीं करता.

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रूस में फंसे पंजाब के कुछ युवाओं का दावा है कि उन्हें यूक्रेन युद्ध में लड़ने के लिए मजबूर किया गया

इसके अलावा युवाओं की शारीरिक फिटनेस में गिरावट को भी एक कारण बताया गया है. नशे की समस्या और खेलों के प्रति घटता रुझान युवाओं की शारीरिक तैयारी पर असर डाल रहा है.

चीमा के मुताबिक, स्कूलों में पढ़ाई और ज्यादा नंबरों पर जोर बढ़ गया है. घर पर कई युवा मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं तो कुछ ट्यूशन भी जाते हैं. लेकिन कई युवा नशे के नेटवर्क में भी फंस जाते हैं, क्योंकि नशे की बिक्री से जल्दी पैसा कमाने का लालच मिलता है.

रूस की सेना में फंसने का खतरा

पंजाब के उन युवाओं की एक और समस्या सामने आई है जो सेना में भर्ती होने का इंतजार कर रहे थे.

2020-21 और 2021-22 के दौरान कोविड-19 महामारी की वजह से सेना की भर्ती रैलियां रुक गई थीं. इसके कारण कई ऐसे युवा, जो सेना में जाने का सपना देख रहे थे, उम्र सीमा पार कर गए.

इनमें से कुछ युवा बाद में एजेंटों के जरिए रूस की सेना तक पहुंच गए. यहां 'डंकी रूट' के जरिए विदेश जाने वाले नेटवर्क का भी जिक्र आता है. ऐसे रास्तों का इस्तेमाल अक्सर बेहतर रोजगार की तलाश में निकले युवाओं को गलत या जोखिम भरे रास्तों पर ले जाने के लिए किया जाता है.

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एक्सपर्ट्स की नजर में क्या उपाय किया जाना चाहिए?

सेना के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि लौटने वाले अग्निवीरों के लिए स्पष्ट और समयबद्ध पुनर्वास नीति जरूरी है.

उनके मुताबिक, पुलिस, वन विभाग, फायर सर्विस और होम गार्ड जैसी सेवाओं में अग्निवीरों के लिए सार्थक पद आरक्षित किए जाने चाहिए. सिर्फ आरक्षण की घोषणा काफी नहीं होगी, बल्कि भर्ती की प्रक्रिया और समयसीमा भी साफ होनी चाहिए.

इसके साथ अग्निवीरों को उनकी सैन्य ट्रेनिंग के आधार पर कौशल प्रमाणपत्र दिए जा सकते हैं. उन्हें अपना कारोबार शुरू करने के लिए प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता भी दी जा सकती है.

दलजीत सिंह चीमा के कहा, "जमीन पर नशे के नेटवर्क और फर्जी भर्ती एजेंटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के साथ स्कूलों में आधुनिक खेल और फिटनेस कार्यक्रम शुरू करने की जरूरत है. इससे युवाओं की शारीरिक क्षमता को फिर से बेहतर बनाया जा सकता है और युवाओं की महत्वाकांक्षाओं को सही दिशा दी जा सकती है."

साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया, 'विदेश में रोजगार के लिए भी पारदर्शी और सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराने की जरूरत है, ताकि रोजगार की तलाश में युवा खतरनाक और अवैध 'डंकी रूट' जैसे अवैध रास्तों के चक्कर में न फंसें."

ये भी पढ़ें: पंजाब 2027: नशे के मुद्दे से लेकर बूथ तक, बीजेपी ने चुनावी तैयारी का रोडमैप बनाया

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