पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन से अमरिंदर सिंह राजा वारिंग के विरोधी गुट को राहत मिली है और परगट सिंह की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की इच्छा भी पूरी हो गई है. लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के अंदर जारी गुटबाजी होगी. यही गुटबाजी लंबे समय से पंजाब कांग्रेस को कमजोर करती रही है.
इस बदलाव के बाद चरणजीत सिंह चन्नी का गुट मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है. वारिंग ने भी इसे 'चन्नी और पार्टी की जीत' बताया है. इसी बीच चन्नी के बेटे रिदमजीत सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट ने पार्टी के अंदर नई हलचल पैदा कर दी. उन्होंने अपनी पोस्ट में वारिंग और पंजाब कांग्रेस के पूर्व प्रभारी भूपेश बघेल पर भी निशाना साधा. बघेल ने पहले चन्नी गुट की उस मांग को मानने से इनकार कर दिया था, जिसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने की मांग की गई थी.
परगट सिंह के लिए कितनी बड़ी है चुनौती
रिदमजीत सिंह का पोस्ट यह दिखाता है कि परगट सिंह का प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनना गुटबाजी के बीच उन्हें मिला कांटों से भरा ताज है. हालांकि रिदमजीत सिंह का पंजाब कांग्रेस में कोई औपचारिक पद या प्रभाव नहीं है. उनकी पहचान मुख्य रूप से पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बेटे के तौर पर है, लेकिन उनकी पोस्ट ने पार्टी के अलग-अलग गुटों के बीच तनाव बढ़ा दिया है.
चन्नी ने अभी तक अपने बेटे की इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी नेतृत्व ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए कई बड़े लक्ष्य तय किए हैं. उन्हें पूरा करने के लिए वरिष्ठ नेताओं का साथ जरूरी है. चन्नी खेमे की ऐसी प्रतिक्रियाएं पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की चिंता बढ़ा सकती हैं. अगर नेताओं में महत्वाकांक्षा और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश बढ़ती है, तो इससे पार्टी के अंदर नए विवाद पैदा हो सकते हैं.
वारिंग की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रही. उन्होंने भूपेश बघेल के साथ अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की. यह तस्वीर उस रिश्ते की ओर इशारा करती है, जिसने पहले पंजाब कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन अब प्रदेश संगठन में उसकी भूमिका पहले जैसी नहीं है.
हालांकि वारिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसकी वजह यह है कि वह पंजाब के प्रभावशाली जाट सिख नेताओं में शामिल हैं. पार्टी नेतृत्व के पक्ष में होने के बावजूद वारिंग कई बार खुद पद छोड़ने की पेशकश भी कर चुके थे.
अमरिंदर सिंह राजा वारिंग के खिलाफ क्या गया?
चन्नी गुट से जुड़े नेताओं के मुकाबले गुरदासपुर के सांसद और पंजाब के पूर्व गृह मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा का बयान ज्यादा संतुलित और महत्वपूर्ण रहा.राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी रंधावा ने कहा कि जिन लोगों ने पार्टी में मतभेद पैदा किए, उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए. उन्होंने माना कि इस स्थिति के लिए वह खुद भी जिम्मेदार हैं और वारिंग और कांग्रेस के दूसरे नेता भी जिम्मेदार हैं. रंधावा ने पहले चन्नी का समर्थन किया था. उन्होंने सीधे तौर पर वारिंग को हटाने की मांग नहीं की थी, लेकिन वारिंग को 'समझौता कर चुके नेता' के तौर पर पेश करके उनके खिलाफ माहौल बनाने में भूमिका निभाई थी.

पंजाब कांग्रेस के नए प्रमुख परगट सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटों में बंटी कांग्रेस को एक करने की है.
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पंजाब कांग्रेस में रंधावा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वारिंग के बीच सार्वजनिक विवाद ने पार्टी के अंदर मौजूद गहरी खींचतान को सामने ला दिया था. रंधावा ने अप्रत्यक्ष रूप से वारिंग पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं.
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, वारिंग के कार्यकाल से जुड़ा कथित बस बॉडी निर्माण घोटाला भी उनके लिए परेशानी का कारण बना. इसके अलावा पार्टी के दलित नेताओं को लेकर उनकी एक विवादित टिप्पणी ने भी उनके खिलाफ माहौल बनाया.
बस बॉडी निर्माण मामला क्या है?
यह मामला 2021 से 2022 के बीच अमरिंदर सिंह राजा वारिंग के परिवहन मंत्री रहने के समय का है. आरोप है कि सरकार ने 841 सरकारी बसों की बॉडी बनाने का ठेका जयपुर की एक कंपनी को दिया. आलोचकों का कहना था कि इसके लिए प्रति बस करीब 11.98 लाख रुपये का भुगतान किया गया, जबकि पंजाब की स्थानीय कंपनियां लगभग आधी कीमत में यह काम करने को तैयार थीं. आरोपों के मुताबिक, इस सौदे और निजी बसों के रूट परमिट में कथित अनियमितताओं के कारण सरकारी खजाने को करीब 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
यह मामला तब फिर चर्चा में आया जब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने नौ सितंबर 2023 को जालंधर के एक कार्यक्रम में वारिंग पर निशाना साधा. मान ने आरोप लगाया था कि बसों की बॉडी बनाने का काम राज्य से बाहर देकर वारिंग ने पैसे कमाए. मान ने कहा था कि मामले से जुड़ी फाइलें और वित्तीय आंकड़े सामने लाए जाएंगे. इसके कुछ सप्ताह बाद पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने मामले की औपचारिक जांच शुरू की.
गुटबाजी से कैसे निपटेंगे परगट सिंह
परगट सिंह को पंजाब कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष इसलिए बनाया गया क्योंकि उनकी छवि कम विवादित और साफ-सुथरे नेता की है. अमरिंदर सिंह राजा वारिंग को लेकर विवाद बढ़ने के बाद कांग्रेस के लिए परगट एक स्वीकार्य विकल्प बन गए. यह पार्टी के अंदर उनकी ताकत है, लेकिन बाहर उनके लिए चुनौती भी है.
परगट सिंह भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कप्तान रह चुके हैं. वह चरणजीत सिंह चन्नी सरकार में खेल और शिक्षा मंत्री भी रहे और जालंधर कैंट सीट से तीन बार विधायक चुने गए. लेकिन गुटों में बंटी पार्टी का कप्तान बनना खेल टीम की कप्तानी से बिल्कुल अलग चुनौती है.
उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर अलग-अलग गुटों के बीच एक तरह की सहमति बनी है. वह चन्नी या रंधावा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बजाय एक ऐसा विकल्प हैं, जिसे दोनों गुट स्वीकार कर सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें अपने आप पूरा अधिकार मिल गया है.
वारिंग पहले ही कह चुके हैं कि नेतृत्व परिवर्तन चन्नी गुट की जीत है. परगट उस गुट का हिस्सा नहीं हैं. इसलिए अब उन्हें दिन-रात मेहनत करके सभी गुटों को साथ लाना होगा और पार्टी को एकजुट दिखाना होगा.
चुनाव से पहले अब कांग्रेस के पास कितना समय है
परगट सिंह के पास ज्यादा समय नहीं है. 2027 का विधानसभा चुनाव कुछ ही महीनों दूर है. चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद पार्टी के संगठन में बड़े बदलाव की गुंजाइश काफी कम हो जाएगी. इसलिए परगट का पहला काम वरिष्ठ नेताओं को एक साथ चुनाव अभियान में लगाना होगा.
चन्नी को चुनाव अभियान समिति में भूमिका दी जा सकती है. रंधावा को प्रदेश अध्यक्ष बनने की दौड़ से बाहर रहना होगा और वारिंग भले ही अध्यक्ष पद से हट गए हों, लेकिन उन्हें पार्टी से बाहर नहीं किया जा सकता.
पंजाब कांग्रेस को अपने विरोधियों से ज्यादा नुकसान अक्सर अपने ही गुटों से हुआ है. एक शांत और जमीन से जुड़े अध्यक्ष पार्टी के अंदर तनाव जरूर कम कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ अध्यक्ष बनने से गुटबाजी खत्म नहीं हो जाती है.
परगट सिंह कैसे खड़ा करेंगे जमीनी संगठन
परगट सिंह के सामने दूसरी बड़ी चुनौती पार्टी के बूथ स्तर के संगठन को मजबूत करना है. उन्हें कांग्रेस की जमीनी मशीनरी को फिर से खड़ा करना होगा और अपनी सादगी व गैर-आक्रामक शैली को ऐसा राजनीतिक संदेश बनाना होगा, जो आम आदमी पार्टी और फिर से मजबूत हो रहे अकाली दल के मुकाबले प्रभावी हो.
हॉकी, रोजगार और पंजाब से युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे उनके लिए उपयोगी हो सकते हैं. लेकिन इन मुद्दों पर तभी असर होगा जब पार्टी उन्हें इन मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखने की आजादी दे. कांग्रेस को इस बदलाव का फायदा तभी मिलेगा, जब जनता और कार्यकर्ताओं को लगे कि पार्टी में अनुशासन लौट रहा है, एक अध्यक्ष, एक प्रभारी और नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर आरोप लगाने का दौर खत्म.
लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ और परगट केवल नाम के अध्यक्ष रह गए, जबकि वारिंग को हटाने वाला गुट ही पार्टी में असली फैसले करता रहा, तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. परगट को इसलिए फुल-बैक की तरह पार्टी की रक्षा करने के लिए चुना गया है, लेकिन 2027 का चुनाव उनसे मैदान में आगे बढ़कर आक्रामक भूमिका निभाने की मांग करेगा.

पंजाब में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले अपने कप्तान बदलने का जोखिम लिया है.
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चुनाव में हार-जीत की जिम्मेदारी कौन लेगा
2027 के चुनाव का नतीजा सिर्फ परगट सिंह की जिम्मेदारी नहीं होगा. इसमें चन्नी गुट की भी बराबर जिम्मेदारी होगी. चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा ने अमरिंदर सिंह राजा वारिंग को हटाने के लिए दबाव बनाया था. नया प्रदेश अध्यक्ष भी ऐसा नेता है जिसे उनका गुट स्वीकार कर सकता है.
इसलिए अगर पंजाब कांग्रेस 2027 में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाती है, तो जिस गुट ने नेतृत्व परिवर्तन को अपनी जीत बताया है, उसे भी उस हार की जिम्मेदारी लेनी होगी.
हिंदू वोटर भी बनेंगे कांग्रेस की चुनौती
परगट सिंह के सामने एक और चुनौती अभी से दिखाई देने लगी है. परगट, चन्नी और रंधावा तीनों सिख नेता हैं. वहीं यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि विजय इंदर सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया गया और इस वजह से कांग्रेस में हिंदू चेहरों की अनदेखी हुई है. यह धारणा सही है या गलत, इसे रोकना अब परगट की जिम्मेदारी होगी. उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस मुद्दे की वजह से हिंदू मतदाता कांग्रेस से दूरी न बनाने लगें.
यानी सिर्फ पार्टी के अंदर गुटबाजी खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा. परगट सिंह को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पंजाब के किसी बड़े सामाजिक या मतदाता वर्ग को यह महसूस न हो कि नेतृत्व परिवर्तन उसके लिए नहीं हुआ है.
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