- आदिवासियों के पास न तो रोजगार है, न ही पेट भरने के लिए पर्याप्त अनाज
- लॉकडाउन ने भूमिहीन आदिवासियों से रोजगार छीन लिया
- पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता सरकारी राशन
महाराष्ट्र के पालघर जिले की जव्हार तहसील में एक आदिवासी महिला की खुदकुशी से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं. उसके पति का आरोप है कि गरीबी से परेशान होकर उसने छोटी बेटी को फंदे से लटका दिया और खुद भी आत्महत्या कर ली. सरकार के हर गरीब को मुफ्त राशन देने के दावे कितने सच्चे हैं, पालघर जिले के इन आदिवासियों की हालत उनकी हकीकत बयां करती है. आदिवासियों के पास न तो रोजगार है, न ही पेट भरने के लिए पर्याप्त अनाज है. वे सब्जियों की जगह जंगल की वनस्पति से काम चलाने के लिए मजबूर हैं. इस मामले में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने जांच कमेटी गठित कर दी है.
मुंबई से सटे पालघर जिले की जव्हार तहसील में एक आदिवासी महिला ने अपनी तीन साल की बेटी के साथ खुदकुशी कर ली जिस पर आदिवासियों की दशा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. महिला के पति ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि उसकी पत्नी गरीबी से परेशान थी.
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तो क्या जव्हार के आदिवासी भुखमरी में जी रहे हैं? यह जानने के लिए NDTV के संवाददाता सुनील सिंह ने मौके पर पहुंचकर पड़ताल की. मुंबई से तकरीबन 150 किलोमीटर दूर जव्हार तालुका के कडव्याचीमाली गांव में आदिवासी दिलीप जानू वाघ का घर है. दिलीप के घर में जमीन पर खाली बर्तन और कुछ बर्तन स्टैंड पर रखे हुए दिखे. जमीन पर लकड़ियां रखी हुई दिखीं. आदिवासी दिलीप जानू वाघ के घर में खाली बर्तन, ईंट से बना चूल्हा और जलाने के लिए लकड़ियां ही हैं.

आदिवासी कातकरी समाज के दिलीप और मंगला के घर में ज्यादा सामान नहीं है. सूप लटका है, चूल्हा है लेकिन गैस या मिट्टी के तेल का स्टोव नहीं है. बर्तन खाली पड़े हैं. मिट्टी के फर्श वाले घर की दीवारें ईंट की हैं. यह इंदिरा आवास योजना में बना है. दिलीप के घर में पत्तलें हैं जिनका इस्तेमाल वे खाना ले जाने के लिए तब करते हैं जब उन्हें कहीं काम मिलता है.
दिलीप की पत्नी मंगला ने 22 जून को दूर जंगल में जाकर खुदकुशी कर ली. वह साथ में अपनी तीन साल की छोटी बेटी को भी ले गई थी. उस नन्ही बच्ची का शव भी मां के साथ पेड़ से लटकता हुआ मिला. दिलीप से यह पूछने पर कि उनकी पत्नी ने खुदकुशी क्यों की, वे कहते हैं कि ''ईंट भट्टा से पैसा लाए था जो खत्म हो गया था. पैसा खत्म होने के बाद उनको क्या हो गया कुछ नहीं मालूम.. मैं तो काम पर गया था.'' काम के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि खेती के काम पर गए थे. खेत में मजदूरी करने के लिए गए थे. दिलीप ने बताया कि घर पहुंचने पर उन्हें लगा कि मंगला बाथरूम के लिए गई होगी. बाथरूम गांव में नहीं है. गरीबी के कारण आत्महत्या करने के सवाल पर दिलीप ने कहा कि पैसा तो नहीं था. खाना तो था पर बहुत कम था.

कडव्याचीमाली गांव में सभी आदिवासी कातकरी समाज के लोग रहते हैं. गांव में दूसरे कई घरों में भी लकड़ी के चूल्हे और खाली बर्तन ही दिखे. यहां लोग हाथों में घांस जैसी सब्जियां लिए हुए दिखे. पूछने पर पता चला कि सरकार से अनाज तो मिल जाता है लेकिन तेल और सब्जी नहीं मिलती लिहाजा जंगल से तोड़कर लाए गए पौधों की पत्तियों और फूलों का ही सहारा है. तेल भी महुआ के बिया को सुखाकर उसमें से निकाला जाता है.
गांव के लोगों ने एक जंगली वनस्पति का नाम सेवलु बताया जिसका वे सब्जी के रूप में इस्तेमाल करते हैं. महुआ के तेल की जगह बाजार में मिलने वाले तेल के इस्तेमाल को लेकर सवाल पूछने पर ग्रामीणों ने बताया कि वह खरीदने के लिए पैसा नहीं है तो इससे ही काम चलाना पड़ता है.
पालघर जिले के जव्हार, मोखाडा, विक्रमगढ़ में कुपोषण एक बड़ी समस्या है. यहां कोंकणा, वारली, ठाकुर, ढोर कोली और कातकरी आदिवासी रहते हैं. कातकरी आदिवासी सीताराम बालू वाघ ने बताया कि यहां किसी के पास खेती के लिए अपनी कोई जमीन नहीं है. ईंटभट्टा पर या वसई और भिवंडी में मजदूरी करके सब पेट पालते हैं लेकिन लॉकडाउन की वजह से वह भी बंद हो गया है.

सीताराम बालू वाघ ने बताया कि लॉकडाउन शुरू हुआ तब से सब काम बंद है. तब से सभी लोग गांव में ही हैं. खर्चा और रोजी रोटी चलाने के बारे में सवाल पर उन्होंने बताया कि रोजगार तो कुछ नहीं है लेकिन राशन से 25 किलो चावल, 10 किलो गेंहू और दाल मिलती है उसी से चला लेते हैं. थोड़ा पैसा लाए थे उसमें ही एडजस्ट करते रहे. अब तो कुछ नहीं है.
कुपोषित बच्चों के लिए बने अस्पताल की देखरेख करने वालीं और श्रमजीवी संघटना कार्यकर्ता सीता घाटाल बताती हैं कि कोरोना महामारी को रोकने के लिए जब से लॉकडाउन किया गया उसके बाद से ही इलाके के आदिवासियों में भुखमरी का आलम है. उन्होंने बताया कि जव्हार, मोखाडा दोनों जगहों पर आदिवासी इलाकों में भुखमरी की स्थिति है. रोजगार नहीं है, पैसा नहीं है, लोगों के पास खाने के लिए अनाज नहीं है.

सरकारी योजनाओं से मिलने वाले अनाज को लेकर सवाल करने पर सीता घाटाल ने कहा कि ''सरकारी राशन में अभी तीन महीने के लिए जो प्रधानमंत्री योजना के तहत अनाज दिया, एक व्यक्ति के लिए पांच किलो चावल. खाली चावल देकर ये लोग बोलते हैं कि हमने सब कुछ दे दिया है. खाली चावल लेकर क्या करेंगे. उसमें कुछ और भी तो चाहिए, दाल चहिए, तेल चहिए, मसाले चाहिए. वो तो कुछ भी नहीं मिल रहा है.''
गरीब आदिवासी महिला मंगला वाघ की खुदकुशी ने जिले में आदिवासियों की हालत पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को इस मामले में एक जांच समिति गठित करनी पड़ी है. समिति के प्रमुख राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त विवेक पंडित का दावा है कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है.
विवेक पंडित ने कहा कि ''जो स्थिति मैंने वहां देखी, जो राशनकार्ड और पेपर देखे, उससे ये साबित है कि सारे झूठे पेपर बनाए गए हैं. उस औरत और बेटी की बॉडी वहां से अस्पताल ले जाने के लिए जिस व्यक्ति को एक हजार रुपये पड़ोसियों से कर्जा लेना पड़ता है उससे और दरिद्रता क्या हो सकती है? मैं सरकार से अपील करता हूं कि वह समय बर्बाद न करे और आदिवासियों की जिदंगी बचाए.''

जव्हार आज पालघर जिले का आदिवासी बहुल और पिछड़ा इलाका जरूर है लेकिन यह जगह कभी जव्हार रियासत की राजधानी हुआ करती थी. ये बात 1343 की है तब जायबा मुकणे यहां के राजा हुआ करते थे. पश्चिमी घाट के बीच स्थित यह स्थान पर्यटन स्थल भी है और ऐतिहासिक रूप से भी अहम है. यह सन 1918 में स्थापित जव्हार राज्य की सबसे पुरानी नगर परिषदों में से एक है लेकिन सरकारी उपेक्षा के चलते प्राकृतिक रूप से सम्पन्न यह क्षेत्र आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ता चला गया है.
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