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World Organ Donation Day: मौत के बाद डॉक्टर सबसे पहले क्या करते हैं? अंगदान की पूरी प्रक्रिया समझिए

World Organ Donation Day 2026: क्या सिर्फ डोनर कार्ड बनवाने से अंगदान हो जाता है? जानिए मौत के बाद अंगदान की पूरी प्रक्रिया और परिवार की भूमिका.

World Organ Donation Day: मौत के बाद डॉक्टर सबसे पहले क्या करते हैं? अंगदान की पूरी प्रक्रिया समझिए

World Organ Donation Day: हर साल 13 अगस्त को दुनिया भर में 'विश्व अंगदान दिवस' मनाया जाता है। इसका मकसद अंगदाताओं की अहम जरूरत के बारे में जागरूकता फैलाना, अंगदान से जुड़ी आम गलतफहमियों को दूर करना और लोगों को जान बचाने के लिए अंगदान का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करना है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शपथ लेने के बाद वास्तव में होता क्या है? क्या सिर्फ डोनर कार्ड बनवाने या ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने से अंगदान सुनिश्चित हो जाता है? ऐसा नहीं है, रजिस्ट्रेशन के बाद भी डोनर और उसके परिवार को एक प्रोसेस का पालन करना जरूरी होता है.

लोग सोचते हैं कि डोनर कार्ड बनवाने से सब हो जाएगा, जबकि मौत के समय परिवार की सहमति भी जरूरी होती है.

डोनर की मौत के समय मेडिकल टीम को यह देखना होता है कि अंग दान के लिए सही स्थिति में हैं या नहीं. साथ ही परिवार या शव की कानूनी जिम्मेदारी रखने वाले व्यक्ति की सहमति भी जरूरी होती है. यानी अंगदान की शपथ एक जरूरी शुरुआत है, पूरी प्रक्रिया नहीं.

क्या सिर्फ डोनर कार्ड बनवाने से अंगदान सुनिश्चित हो जाता है?

भारत में कोई भी व्यक्ति, उम्र या लिंग की परवाह किए बिना, मौत के बाद अंग और ऊतक दान करने की इच्छा जता सकता है. इसके लिए फॉर्म 7 के जरिए अंगदान का संकल्प दर्ज किया जा सकता है. NOTTO यानी नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, डोनर कार्ड या रजिस्ट्रेशन होने के बावजूद मौत के समय परिवार या उस व्यक्ति की सहमति जरूरी होती है जो कानूनी तौर पर शव की जिम्मेदारी रखता है.

यही वजह है कि अगर आपने अंगदान का संकल्प लिया है, तो सिर्फ रजिस्ट्रेशन करके चुप न रहें. अपने परिवार को बताएं कि आपने यह फैसला लिया है.

मौत के बाद डॉक्टर क्या करते हैं?

मौत के बाद डॉक्टर यह देखते हैं कि अंगदान की स्थिति बन सकती है या नहीं. एक मेडिकल टीम यह तय करती है कि कौन से अंग और ऊतक ट्रांसप्लांट के लिए सही हैं. किसी व्यक्ति ने डोनर बनने का संकल्प लिया है, इसका मतलब यह नहीं कि उसके सभी अंग दान किए ही जाएंगे. मेडिकल स्थिति के हिसाब से फैसला होता है.

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अंगदान के लिए परिवार की सहमति क्यों जरूरी है?

अंगदान के बाद परिवार को शरीर सौंप दिया जाता है और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सामान्य तरीके से की जा सकती है. अंग निकालने का पूरा काम इस ढंग से किया जाता है कि बाहरी शरीर को ज्यादा नुकसान न हो. यानी अंगदान का फैसला करने का मतलब यह नहीं है कि परिवार अंतिम विदाई सामान्य तरीके से नहीं दे पाएगा.

घर पर मौत होने पर क्या अंगदान संभव है?

घर पर हुई मौत के बाद आम तौर पर अंगों की वह रिट्रीवल प्रक्रिया नहीं हो सकती, जो अस्पताल में ब्रेन स्टेम डेथ के बाद की जाती है. NOTTO के अनुसार, घर पर मौत के मामले में आंखों और कुछ ऊतकों के दान की संभावना हो सकती है. इसके लिए संबंधित मेडिकल या आई रिट्रीवल टीम से जल्द संपर्क करना जरूरी होता है.

अंगदान के बाद शरीर का क्या होता है?

परिवार को बताना. यही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे अहम बातों में से एक है. आपका नाम डोनर रजिस्टर में दर्ज होना जरूरी है, लेकिन मौत के समय मेडिकल टीम को परिवार या कानूनी रूप से शव की जिम्मेदारी रखने वाले व्यक्ति से बात करनी होती है. इसलिए अपने फैसले को परिवार से छिपाकर रखना अंगदान की प्रक्रिया को मुश्किल बना सकता है.

अगर अंगदान की शपथ ली है तो सबसे जरूरी काम क्या है?

भारत में अंगदान के लिए ऑप्ट इन व्यवस्था है, यानी व्यक्ति को अपनी इच्छा जतानी होती है. सिर्फ यह मान लेना कि मृत्यु के बाद हर व्यक्ति के अंग दान कर दिए जाएंगे, सही नहीं है. अंगदान की शपथ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आपकी इच्छा पहले से दर्ज रहती है और जरूरत पड़ने पर अस्पताल की टीम उसे देख सकती है.

यानी डोनर बनना सिर्फ एक कार्ड या ऑनलाइन फॉर्म भरने तक सीमित नहीं है. असली फर्क तब पड़ता है, जब आपकी इच्छा आपके परिवार को भी पता हो और सही समय पर मेडिकल टीम तक पहुंच सके.

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