टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टीसीएस, टाटा नमक, टाटा चाय, एयर इंडिया, जैगुआर, लैंड रोवर, टाइटन, फास्ट्रैक, तनिष्क, स्टारबक्स, वोल्टास, जारा, वेस्टसाइड, कल्टफिट, टाटा एआईजी, टाटा प्ले, टाटा वनएमजी और टाटा कैपिटल... पढ़ते-पढ़ते शायद जब आप थक जाएंगे तब जाकर ये लिस्ट खत्म होगी. संभव है फिर भी कुछ नाम छूट जाएं, क्योंकि हम बात कर रहे हैं टाटा ग्रुप की. इसी ग्रुप को चलाने वाली संस्था टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने बुधवार यानी 12 अगस्त को इस्तीफा दे दिया... अब वे अगले साल फरवरी माह तक ही समूह की जिम्मेदारी संभालेंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में रेलवे और डिफेंस के बाद सबसे ज्यादा नौकरी देने वाला ये समूह काम कैसे करता है? इस सवाल का जवाब जानना इसलिए भी जरूरी है कि ये पूरा समूह एक-दो या तीन लाख करोड़ नहीं बल्कि 26 लाख करोड़ का समूह है. तो इस रिपोर्ट में जानते हैं भारतीय कॉर्पोरेट जगत का सबसे विश्वसनीय समूह टाटा ग्रुप फंक्शन कैसे करता है...
21,000 रुपये की पूंजी और 4 सपनों से शुरू हुआ ये सफर
जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब एक दूरदर्शी शख्सियत ने आजादी से पहले भारत के औद्योगिक विकास का सपना देखा था. वो साल था 1868...और वो शख्सियत थे जमशेदजी नौसरवानजी टाटा. जिन्होंने महज 21,000 रुपये की शुरुआती पूंजी से एक छोटी सी ट्रेडिंग कंपनी शुरू की थी. इसके बाद उन्होंने मुंबई में एक बंद पड़ी कॉटन मिल खरीदकर कपड़ा उद्योग में कदम रखा. लेकिन जमशेदजी का मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं था. वे जानते थे कि भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए भारी उद्योगों की जरूरत है.
भले ही जमशेदजी अपने जीवनकाल में केवल ताज महल पैलेस होटल (1903) को ही पूरा होते देख सके, लेकिन उनके वंशजों सर दोराबजी टाटा, जे आरडी टाटा और सर रतन टाटा ने उनके इन विचारों को आगे बढ़ाया. इसी बुनियाद पर टाटा स्टील (1907), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc Bengaluru) और टाटा पावर जैसी ऐतिहासिक संस्थाएं खड़ी हुईं.

3-टियर गवर्नेंस मॉडल: कैसे बंटता है पावर और कंट्रोल?
अब बात इतने बड़े समूह के फंक्शन की....इतना बड़ा साम्राज्य किसी एक व्यक्ति, परिवार या सेंट्रलाइज्ड ऑफिस से नहीं चलाया जा सकता. टाटा समूह की सबसे बड़ी खासियत इसका 3-स्तरीय (3-Tier) पारदर्शी ढांचा है, जो मैनेजमेंट और ओनरशिप को पूरी तरह अलग-अलग रखता है:
टाटा ट्रस्ट्स (गार्डियन / मालिक): टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' में लगभग 66% हिस्सेदारी 'सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट' और 'सर रतन टाटा ट्रस्ट' के पास है. ये ट्रस्ट्स व्यावसायिक फैसलों में सीधे तौर पर दखल नहीं देते. ये एक गार्डियन या संरक्षक की तरह काम करते हैं, जिनका मुख्य काम समूह की नैतिकता, वैल्यूज और लाभांश (Dividends) के जरिए समाज सेवा को सुनिश्चित करना है.
टाटा संस (होल्डिंग कंपनी व रणनीतिक कमान): टाटा संस पूरे टाटा समूह की प्रमोटर और होल्डिंग कंपनी है. बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और इसके चेयरमैन पूरे समूह की कैपिटल एलोकेशन, बड़े रणनीतिक फैसले और लॉन्ग-टर्म विजन की कमान संभालते हैं. यही कंपनी ऑपरेटिंग कंपनियों में पूंजी लगाती है और बोर्ड स्तर पर दिशा दिखाती है.
ऑपरेटिंग कंपनियां (इंडिपेंडेंट ऑपरेशंस): टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाइटन, वोल्टास जैसी तमाम कंपनियां अपने स्वतंत्र बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, मैनेजिंग डायरेक्टर्स और CEOs के जरिए चलती हैं. वे रोजाना के बिजनेस ऑपरेशंस, प्रोडक्ट लॉन्च और मार्केट स्ट्रैटेजी बनाने के लिए पूरी तरह आजाद हैं.
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66% कमाई का समाज सेवा में इस्तेमाल: मुनाफा नहीं, सेवा का मॉडल
आम तौर पर कॉरपोरेट कंपनियों में मुनाफा प्रमोटर्स या शेयरधारकों की जेब में जाता है, लेकिन टाटा में खेल बिल्कुल अलग है. जब TCS या टाटा मोटर्स जैसी कंपनियां कमाती हैं, तो वे टाटा संस को लाभांश देती हैं. टाटा संस के इस लाभांश का 66% हिस्सा सीधे टाटा ट्रस्ट्स के पास जाता है. टाटा ट्रस्ट्स की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इस फंड का बड़ा हिस्सा यानि लगभग 40% से अधिक अकेले हेल्थकेयर और कैंसर रिसर्च में जाता है. मुंबई का ऐतिहासिक 'टाटा मेमोरियल अस्पताल' और देश के कई राज्यों में बन रहे एडवांस्ड कैंसर केयर सेंटर इसी लाभांश से संचालित होते हैं.भारत का नंबर-1 रिसर्च इंस्टीट्यूट 'IISc बेंगलुरु' (Indian Institute of Science), TIFR (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च) और TISS (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) जैसे विश्वस्तरीय संस्थान इसी फंड से संचालित होते हैं. इसके अलावा जल जीवन मिशन, कुपोषण के खिलाफ अभियान और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी योजनाओं में हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये सीधे खर्च किए जाते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो जब आप टाटा का नमक या टाटा टी खरीदते हैं, तो indirect रूप से आपकी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा देश के किसी दूर-दराज गांव में स्कूल या अस्पताल बनाने या चलाने में लग रहा होता है.
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चेयरमैन के पास वीटो की ताकत
इतने बड़े समूह में कोई गलत फैसला न हो और ट्रस्ट्स के मूल्य सुरक्षित रहें, इसके लिए टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' (Articles of Association) में विशेष प्रावधान किए गए हैं. टाटा ट्रस्ट्स द्वारा मनोनीत (Nominated) डायरेक्टर्स के पास बोर्ड के बेहद संवेदनशील फैसलों पर 'वीटो' और विशेष सहमति का अधिकार होता है. उदाहरण के लिए—अगर टाटा संस को किसी नई बड़ी कंपनी का विलय (Merger) करना हो, कोई अरबों डॉलर का नया निवेश करना हो या फिर समूह का नया चेयरमैन चुनना हो, तो इसके लिए ट्रस्ट्स द्वारा मनोनीत डायरेक्टर्स की मंजूरी अनिवार्य होती है. यही वजह है कि एन चंद्रशेखरन के इस्तीफे के बाद अब नए चेयरमैन के चुनाव में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका सबसे निर्णायक होगी.संक्षेप में कहें तो टाटा समूह सिर्फ एक बिजनेस हाउस नहीं है, बल्कि एक ट्रस्टीशिप मॉडल पर आधारित भारत की औद्योगिक पहचान है. यही कारण है कि नेतृत्व बदलता है, चेयरमैन बदलते हैं, लेकिन 158 साल बाद भी 26 लाख करोड़ रुपये का यह साम्राज्य बिना डगमगाए देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बना हुआ है.
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