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न बुखार, न बीमारी - सब कुछ ठीक, फिर भी कुछ करने का मन नहीं, अचानक क्यों मर जाती है काम करने इच्छा? कारण जानिए

Why Everything Feels Pointless: न बुखार, न बीमारी फिर भी काम करने की इच्छा नहीं हो रही. आखिर ऐसा क्यों होता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ऐसा क्यों होता है और इसके पीछे क्या कारण हैं.

न बुखार, न बीमारी - सब कुछ ठीक, फिर भी कुछ करने का मन नहीं, अचानक क्यों मर जाती है काम करने इच्छा? कारण जानिए
सब कुछ ठीक होने के बाद भी काम करने का मन क्यों नहीं होता?

Sudden Loss of Drive: कई बार ऐसा होता है कि मेडिकल रिपोर्ट्स बिल्कुल नॉर्मल आती हैं. न बुखार, न दर्द, न कोई बड़ी बीमारी. फिर भी सुबह उठते ही लगता है आज कुछ करने का मन नहीं है. काम सामने हो, समय भी हो, जिम्मेदारियां भी हों, लेकिन अंदर से एनर्जी गायब. लोग इसे आलस, बहाना या मोटिवेशन की कमी कहकर टाल देते हैं. पर सच यह है कि यह स्थिति आलस नहीं, बल्कि शरीर और दिमाग का एक छुपा हुआ संकेत हो सकती है. यह वो स्टेज है जहां बीमारी नहीं होती, लेकिन काम करने की क्षमता (functional capacity) धीरे-धीरे गिरने लगती है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ऐसा क्यों होता है और इसके पीछे क्या कारण हैं.

सब कुछ ठीक होने के बाद भी काम करने का मन क्यों नहीं होता? | Why Do I Not Feel like Working Even When Everything Is Fine?

1. यह आलस नहीं, सिस्टम की थकान है

जब हम कहते हैं मन नहीं कर रहा, अक्सर समस्या मांसपेशियों में नहीं होती. असल थकान नर्वस सिस्टम में होती है जो शरीर को आदेश देता है कि कब काम करना है, कब रुकना है. लगातार अलर्ट मोड (काम, नोटिफिकेशन, चिंता) में रहने से यह सिस्टम थक जाता है. बाहर से शरीर ठीक दिखता है, लेकिन अंदर का कंट्रोल पैनल ओवरलोड हो चुका होता है.

2. लगातार मानसिक शोर

दिनभर सोचते रहना काम, पैसे, रिश्ते, भविष्य दिमाग को आराम नहीं देता. यह मेंटल ओवरस्टिमुलेशन धीरे-धीरे इच्छा को खा जाता है. जब दिमाग को खाली होने का समय नहीं मिलता, तो वह काम शुरू करने से ही मना कर देता है. इसलिए मन मरने जैसा लगता है.

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3. नींद पूरी, पर आराम नहीं

बहुत लोग 7-8 घंटे सोते हैं, फिर भी तरोताजा नहीं उठते. कारण है खराब क्वालिटी स्लीप रात को मोबाइल, देर से खाना, दिमाग में चलती बातें. नींद शरीर को तो आराम देती है, लेकिन दिमाग को नहीं. नतीजा सुबह काम करने की इच्छा शून्य.

4. भावनाओं को दबाते रहना

सब ठीक है कहकर दुख, गुस्सा, निराशा को दबाते रहना भी एनर्जी खाता है. यह इमोशनल लेबर है जो दिखती नहीं, पर बहुत थकाती है. जब भावनाएं सुनी नहीं जातीं, तो दिमाग काम से दूरी बना लेता है.

5. बहुत ज्यादा कंट्रोल और परफेक्शन

हर काम सही, हर कदम सोच-समझकर यह आदत शुरुआत में अच्छी लगती है, पर लंबे समय में थका देती है. परफेक्शन का दबाव काम को खुशी नहीं, बोझ बना देता है. फिर मन कहता है रहने दो.

6. उद्देश्य का धुंधलापन

काम तो है, पर क्यों साफ नहीं. जब उद्देश्य धुंधला हो जाता है, तो शरीर सहयोग नहीं करता। यह मीनिंग फटीग है—जहाँ काम का अर्थ खो जाता है, इसलिए मन भी साथ छोड़ देता है.

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7. लगातार तुलना और सूचना की बाढ़

सोशल मीडिया पर दूसरों की रफ्तार देखकर खुद को कम आंकना भी इच्छा को मारता है। दिमाग हमेशा तुलना में लगा रहता है, जिससे आत्म-विश्वास घटता है और काम शुरू करने की हिम्मत नहीं बचती.

इससे बाहर कैसे निकलें? 

  • काम छोटे हिस्सों में करें: पूरा दिन नहीं, सिर्फ 10 मिनट से शुरुआत.
  • दिमाग को खाली समय दें: दिन में 15-20 मिनट बिना स्क्रीन.
  • नींद की गुणवत्ता सुधारें: सोने से 1 घंटा पहले मोबाइल बंद, हल्का खाना.
  • भावनाएँ लिखें/कहें: जो दबा है, उसे जगह दें.
  • परफेक्शन छोड़ें: 70% सही भी पर्याप्त है.
  • उद्देश्य याद करें: यह काम आपके जीवन में क्यों है, एक लाइन में लिखें.

जब शरीर बीमार नहीं होता, लेकिन काम करने का मन मर जाता है, तो इसे कमजोरी या आलस न समझें. यह संकेत है कि आपका अंदरूनी सिस्टम थक गया है. 

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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