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ग्रहण में खाना क्यों नहीं खाना चाहिए? आयुर्वेद के अनुसार जानें वजह और सावधानियां

12 अगस्त 2026 को साल का आखिरी सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है. ग्रहण के दौरान खाना खाना चाहिए या नहीं? जानिए आयुर्वेद एक्सपर्ट डॉ. राम अवतार की राय, पारंपरिक मान्यताएं और वैज्ञानिक नजरिया.

ग्रहण में खाना क्यों नहीं खाना चाहिए? आयुर्वेद के अनुसार जानें वजह और सावधानियां
ग्रहण में खाना खाने से क्या होता है | What happens if you eat during an eclipse
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साल 2026 का दूसरा और आखिरी सूर्य ग्रहण 12 अगस्त को पड़ने वाला है. यह पूर्ण सूर्य ग्रहण (टोटल सोलर एक्लिप्स) होगा, जिसकी शुरुआत भारतीय समयानुसार रात 9:04 बजे होगी और यह 13 अगस्त की सुबह 4:25 बजे तक रहेगा. चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए सूतक काल प्रभावी नहीं माना जाएगा. जब भी ग्रहण आता है, तो एक सवाल हमेशा साथ में लाता है कि इस दौरान कुछ खाना क्‍यों नहीं चाह‍िए.

सूर्य ग्रहण के दौरान खाना नहीं खाना चाहिए, यह बात आपने बचपन से सुनी होगी. लेकिन क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है या यह सिर्फ परंपरा है? 12 अगस्त को लगने वाले साल के आखिरी सूर्य ग्रहण से पहले जानिए आयुर्वेद एक्सपर्ट की राय.

आयुर्वेदाचार्य और योग गुरु प्रो. डॉ. राम अवतार का कहना है कि ग्रहण के दौरान पाचन कमजोर हो जाता है. इस समय खाना सही से पचता नहीं है, जिसकी वजह से शरीर को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. यही कारण है कि ग्रहण के समय या तो व्रत रखने की सलाह दी जाती है या फिर कुछ हल्का खाने की.

ग्रहण में खाना खाने से क्या होता है? | Grahan Mein Khana Kha Sakte Hain Ya Nahin

सूर्य ग्रहण हो या चंद्र ग्रहण, हमारे घर के बड़े-बूढ़े हमेशा एक ही बात कहते हैं- "ग्रहण के दौरान कुछ खाना-पीना मत!" हम में से कई लोग इसे सिर्फ पुरानी दकियानूसी बातें मानकर टाल देते हैं. लेकिन क्या कभी सोचा है कि इसके पीछे कोई लॉजिक भी है या ये सिर्फ सुनी-सुनाई बातें हैं?

खासकर आयुर्वेद इस बारे में काफी सख्त नजर आता है. चलिए आज बिल्कुल सीधी और बोलचाल की भाषा में समझते हैं कि ग्रहण के वक्त खाना क्यों मना किया जाता है और इसके क्या नुकसान बताए गए हैं.

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Photo Credit: Pexels

आयुर्वेद क्या कहता है?

आयुर्वेद के मुताबिक, हमारी बॉडी का सिस्टम सूरज की रोशनी से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है. जैसे सूरज ढलने पर हमारी पाचन अग्नि (Digestive Fire) मंद पड़ जाती है, ठीक वैसे ही ग्रहण के वक्त भी होता है.

जब ग्रहण लगता है, तो कुदरत में एक अजीब सी तब्दीली आती है. सूरज की किरणें रुक जाने से हमारी बॉडी का 'जठराग्नि' यानी खाना पचाने वाला सिस्टम धीमा पड़ जाता है. ऐसे में अगर आप कुछ भारी या तला-भुना खा लेते हैं, तो पेट उसे सही से पचा नहीं पाता.

आयुर्वेदिक मान्यता के अनुसार:

  • अपच, गैस या पेट में भारीपन महसूस हो सकता है.
  • भोजन पचने में अधिक समय लग सकता है.
  • शरीर में सुस्ती या आलस्य महसूस हो सकता है.

लेकिन यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वैज्ञानिक शोध ग्रहण के समय भोजन खाने से होने वाले इन प्रभावों की पुष्टि नहीं करते हैं.

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किन लोगों को छूट दी जाती है?

पारंपरिक धार्मिक और आयुर्वेदिक मान्यताओं में आमतौर पर निम्न लोगों को भोजन करने की छूट दी जाती है:

  • गर्भवती महिलाएं
  • छोटे बच्चे
  • बुजुर्ग
  • बीमार व्यक्ति
  • नियमित दवा लेने वाले लोग

इन लोगों के लिए स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है.

ग्रहण के दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

क्या करें?

  • ग्रहण शुरू होने से पहले हल्का और सुपाच्य भोजन करें.
  • ध्यान, जप, प्रार्थना या आध्यात्मिक गतिविधियों में समय बिताएं.
  • ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करें और ताजा भोजन ग्रहण करें.
  • जरूरत हो तो पर्याप्त पानी पीते रहें.

क्या न करें?

  • भारी, तैलीय और बहुत अधिक भोजन न करें.
  •  ग्रहण के दौरान लंबे समय तक रखा हुआ भोजन न खाएं.
  •  केवल मान्यताओं के आधार पर जरूरी दवाएं छोड़ने की गलती न करें.
  •  यदि आप बीमार, गर्भवती या चिकित्सकीय स्थिति में हैं तो उपवास के लिए खुद को मजबूर न करें.

अगर ग्रहण में खा लिया तो क्या नुकसान हो सकता है?

अगर आप ग्रहण के दौरान जबरदस्ती ठूंस-ठूंसकर खा लेते हैं, तो सेहत पर इसका सीधा असर दिख सकता है:

बदहजमी और गैस: आयुर्वेद में माना जाता है कि खाना पेट में पचने के बजाय सड़ने लगता है, जिससे एसिडिटी, अफारा और पेट दर्द की शिकायत हो सकती है.
टॉक्सिंस यानी 'आम' का बनना: आयुर्वेद में माना गया है कि अधपचा खाना शरीर में जहर (टॉक्सिंस) की तरह काम करता है, जिसे हम 'आम' कहते हैं. ये आगे चलकर स्किन की बीमारियों और सुस्ती का कारण बनता है.
इन्फेक्शन का खतरा: पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के वक्त हवा में बैक्टीरिया और जर्म्स तेजी से पनपते हैं. पहले से बना हुआ खाना बहुत जल्दी खराब या दूषित (contaminate) हो जाता है.

फिर क्या करना चाहिए?

अगर आप इस दौरान खुद को और अपनी फैमिली को फिट रखना चाहते हैं, तो बस इन छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखें:

खाली पेट रहें: ग्रहण शुरू होने से कम से कम 2-3 घंटे पहले ही हल्का-फुल्का खाना खा लें. ग्रहण के दौरान खाने से परहेज ही बेहतर है.
तुलसी के पत्ते का देसी नुस्खा: कुछ विशेषज्ञों का मानना है पानी या पहले से बने दूध-खाने में तुलसी के पत्ते डालकर रखें. तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं जो खाने को खराब होने से बचाते हैं.
लिक्विड चीजें लें: अगर भूख बिल्कुल बर्दाश्त न हो (खासकर बच्चों, बुजुर्गों या मरीजों के लिए), तो सिर्फ पानी, नारियल पानी या बहुत हल्का सूप लिया जा सकता है.
ग्रहण के बाद नहाएं और ताजा खाएं: ग्रहण खत्म होने के बाद नहाकर ताजा और गरम खाना बनाकर ही खाएं. बासी खाने को फेंक देना ही बेहतर है.

साइंस माने या न माने, लेकिन अपने शरीर के डाइजेशन को थोड़ा रेस्ट देने में कोई बुराई नहीं है. अगली बार जब ग्रहण लगे, तो कम से कम अपने पेट को थोड़ा ब्रेक जरूर दें!

"आयुर्वेद और पारंपरिक मान्यताओं में ग्रहण के दौरान भोजन न करने की सलाह दी जाती है, लेकिन आधुनिक विज्ञान ग्रहण के समय भोजन खाने से स्वास्थ्य को होने वाले किसी प्रत्यक्ष नुकसान की पुष्टि नहीं करता. इसलिए व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए."

डॉ. राम अवतार

क्या कहती है साइंस?

जब बात ग्रहण की आती है, तो सिर्फ दादी-नानी के नुस्खे ही नहीं, बल्कि कुछ साइंटिफिक फैक्ट्स भी ध्यान देने वाले हैं:

यूवी रेज (UV Rays) की कमी और बैक्टीरिया का बढ़ना: वैज्ञानिकों का मानना है कि सूर्य ग्रहण के समय सूरज की नेचुरल अल्ट्रावायलेट किरणें रुक जाती हैं, जो आमतौर पर हवा में मौजूद बैक्टीरिया को मारती हैं. शोध दर्शाते हैं कि रोशनी कम होने से वातावरण में पैथोजेन्स (रोगजनक कीटाणु) तेजी से पनपते हैं, जिससे खुला रखा खाना बहुत जल्दी दूषित हो जाता है.

2011 में प्रकाशित एक अध्ययन में सूर्य ग्रहण के दौरान कुछ सूक्ष्मजीवों के व्यवहार में बदलाव देखे गए थे, हालांकि इससे भोजन के खराब होने का प्रत्यक्ष निष्कर्ष नहीं निकाला गया.

बायोलॉजिकल क्लॉक (Circadian Rhythm) पर असर: कई एनवायरमेंटल और बायोलॉजिकल स्टडीज में पाया गया है कि ग्रहण के वक्त अचानक रोशनी और तापमान घटने से इंसानों और जानवरों की 'सर्कैडियन रिदम' यानी बॉडी क्लॉक प्रभावित होती है. पाचन तंत्र इसी रिदम पर चलता है, जिससे इस दौरान डाइजेशन धीमा पड़ जाता है. शोध बताते हैं कि शरीर की सर्कैडियन रिदम (बॉडी क्लॉक), भोजन के समय और आंतों के माइक्रोबायोम के बीच गहरा संबंध होता है. रिदम में बदलाव पाचन और मेटाबोलिज्म को प्रभावित कर सकता है.

तुलसी के एंटी-बैक्टीरियल गुण: स्टडीज में साबित हो चुका है कि तुलसी के पत्तों में स्ट्रॉन्ग एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-माइक्रोबियल प्रॉपर्टीज होती हैं, जो पके हुए खाने को बैक्टीरिया और खराब होने से बचाने में मदद करती हैं. वैज्ञानिक साहित्य बताता है कि प्रकाश और अंधकार का चक्र शरीर की जैविक घड़ी, प्रतिरक्षा प्रणाली और कई मेटाबोलिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है.

लेखक के बारे में : डॉ. राम अवतार दिल्ली सरकार के योग विभाग के सेवानिवृत्त प्रोजेक्ट ऑफिसर हैं. उनके पास योग और ध्यान (Yoga & Meditation) के क्षेत्र में 38 से अधिक वर्षों का दीर्घकालिक और व्यावहारिक अनुभव है. वे योग, प्राणायाम, ध्यान, नाड़ी विज्ञान, जड़ी-बूटी/पारंपरिक चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy), रेकी, होम्योपैथी और आयुर्वेद के माध्यम से कई जटिल एवं असाध्य रोगों का सफल इलाज कर चुके हैं.

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