"मेरी बेरी 2 साल की हो गई है, सारे इशारे समझ लेती है, लेकिन बोलती नहीं है, जब उसे सामान रखने के लिए बोलते हैं, तो वो रख देती है. वहीं, सारी चीजों को इशारा कर-करके बताती है." यह परेशानी नोएडा में रहने वाली मीनू झा की है. अपनी बेटी के ना बोलने को लेकर वो अक्सर परेशान दिखती हैं. जब वो इस परेशानी को लेकर डॉक्टर के पास गई तो डॉक्टर ने बताया कि यह परेशानी साइलेंट स्क्रीन के कारण है.
दरअसल, शुरू में जब बच्चा मोबाइल पर कार्टून देख रहा है, लेकिन घर में किसी को शायद ही उससे बात करनी पड़ रही है. वह शांत बैठा है, रो नहीं रहा, परेशान नहीं कर रहा, तो ऐसे में अक्सर पेरेंट्स को लगता है कि बच्चों को शांत रखने का ये सबसे आसान तरीका है. लेकिन आगे चलकर यही शांति कई घंटों की स्क्रीन आदत बन जाए, तो बच्चे के डेवेलेपमेंट पर असर डालती है. मीनू भी शुरू में अपने बच्ची को शांत करने के लिए कुछ मिनट के लिए टीवी चला दिया करती थी, जो धीरे-धीरे बच्चे की आदत बन गई. जिसकी वजह से स्पीच डिले हो गया. यहां जानते हैं साइलेंट स्क्रीन की आदत के बारे में विस्तार से-
यहां बात सिर्फ मोबाइल या टीवी देखने की नहीं, बल्कि उस समय की है जो बच्चा स्क्रीन के सामने बिताते हुए बातचीत, खेल, इशारों, चेहरे के भाव और आसपास की चीजों से सीखने में नहीं लगा रहा. भाषा सीखना सिर्फ शब्द सुनने से नहीं होता, बच्चे को शब्दों का इस्तेमाल करने, सवाल पूछने, जवाब देने और बातचीत में शामिल होने के लगातार अवसर चाहिए.
क्या होता है साइलेंट स्क्रीन?
नारायणा हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक मेडिसिन, नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. राजेश पाठक का कहना है कि साइलेंट स्क्रीन वह स्थिति है, जब छोटा बच्चा लंबे समय तक टीवी, मोबाइल या टैबलेट देखता है, लेकिन स्क्रीन से कोई बातचीत या इंटरैक्शन नहीं करता. इसमें बच्चा सिर्फ वीडियो देखता रहता है, जबकि बोलने, सामाजिक कौशल और भाषा विकास के लिए जरूरी बातचीत कम हो जाती है. जरूरत से ज्यादा साइलेंट स्क्रीन टाइम लैंग्वेज और कम्युनिकेशन स्किल्स के विकास को प्रभावित कर सकता है.
बच्चों को लिए स्क्रीन टाइम नहीं, टॉक टाइम है जरूरी
डॉ. राजेश का कहना है कि छोटे बच्चों के स्पीड डेवलेपमेंट के लिए स्क्रीन टाइम नहीं, बल्कि टॉक टाइम जरूरी है. जब बच्चा लंबे समय तक अकेले स्क्रीन देखता है, तो वह सुनने के साथ-साथ प्रतिक्रिया देने, नए शब्द बोलने और बातचीत का अभ्यास करने के मौके खो सकता है.
माता-पिता बच्चे से रोजमर्रा के काम करते हुए बात करें, जैसे- नहाते समय शरीर के अंगों के नाम बताना, खाना खिलाते समय रंग और स्वाद के बारे में पूछना या कहानी पढ़ते समय बच्चे से सवाल करना. इस तरह की आदत से बच्चों में लैंग्वेज डेवलेप होता है.
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