आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, टीवी, टैबलेट और वीडियो गेम बच्चों की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुके हैं. कई घरों में बच्चे कार्टून या वीडियो देखते हुए खाना खाते हैं. हालांकि, ये आदत बच्चों की खाने की मात्रा और भोजन चुनने की पसंद पर असर डाल सकती है. पीडियाट्रिक का मानना है कि स्क्रीन के सामने खाना खाने से बच्चे जरूरत से ज्यादा खा सकते हैं और अनहेल्दी स्नैकिंग की आदत डेबलेप हो सकती है.
स्किन देखकर क्यों ज्यादा खाते हैं बच्चे?
नारायणा हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक मेडिसिन एवं नियोनेटोलॉजी, सीनियर कंसल्टेंट डॉ. राजेश पाठक का कहना है कि जब बच्चा किसी कार्टून, वीडियो या गेम में बिजी होता है, तो उसका पूरा ध्यान स्क्रीन पर केंद्रित हो जाता है. ऐसे में वह ये महसूस नहीं कर पाता कि उसे वास्तव में कितनी भूख लगी है या उसका पेट कब भर गया है. इस स्थिति को माइंडलेस ईटिंग कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति बिना ध्यान दिए लगातार खाता रहता है. बच्चों में ये आदत आगे चलकर वजन बढ़ने और गलत खानपान की वजह बन सकती है.
स्क्रीन देखकर खाने से बढ़ जा सकता है मोटापे का रिस्क
डॉक्टर बताते हैं कि स्क्रीन के सामने बैठकर स्नैक खाना सबसे ज्यादा चिंता की बात है. टीवी या मोबाइल देखते समय बच्चे आसानी से चिप्स, बिस्किट, नमकीन, चॉकलेट और अन्य पैकेज्ड फूड अधिक मात्रा में खा सकते हैं.
क्योंकि उनका ध्यान भोजन पर नहीं होता, इसलिए वे ये अंदाजा नहीं लगा पाते कि उन्होंने कितना खा लिया है. यही वजह है कि स्क्रीन टाइम और मोटापे के बीच संबंध की बात कई अध्ययनों में सामने आई है.
फैमिली मील्स की आदत होती है कम
जब भोजन के दौरान बच्चे का पूरा ध्यान स्क्रीन पर होता है, तो परिवार के साथ बैठकर खाने और बातचीत करने का अवसर भी कम हो जाता है. डॉ. पाठक का कहना है कि परिवार के साथ बिना स्क्रीन के भोजन करने से बच्चे भोजन के स्वाद, मात्रा और शरीर के प्राकृतिक भूख और सेटिस्फेक्शन संकेतों को बेहतर तरीके से समझना सीखते हैं. ये स्वस्थ खानपान व्यवहार विकसित करने में मदद करता है.
माता-पिता क्या करें?
डॉक्टर का कहना है कि खाने और स्नैक टाइम को जितना संभव हो स्क्रीन-फ्री रखा जाए. बच्चों को एक निश्चित स्थान पर बैठाकर खाना खिलाएं और स्नैक्स की मात्रा पहले से तय करें.
साथ ही चिप्स और बिस्किट की जगह फल, दही, दूध, नट्स और अन्य पौष्टिक विकल्प उपलब्ध कराएं. इससे बच्चों में बेहतर खाने की आदतें विकसित हो सकती हैं.
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