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पेरेंट्स की ये छोटी सी गलती बच्चों में बढ़ा रहा है ADHD का खतरा, जानें बच्चों को मोबाइल से कैसे रखें दूर

Parenting Mistakes: आज के डिजिटल समय में मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. लेकिन एक्सपर्ट्स की मानें तो बच्चों की इस समस्या के पीछे पेरेंट्स की एक बड़ी गलती होती है. इस आर्टिकल में जानते हैं कि बच्चों को मोबाइल क्यों नहीं देना चाहिए.

पेरेंट्स की ये छोटी सी गलती बच्चों में बढ़ा रहा है ADHD का खतरा, जानें बच्चों को मोबाइल से कैसे रखें दूर
Parenting Mistakes: बच्चे को चुप कराने के लिए देते हैं मोबाइल, तो आज से ही कर दें बंद.

Parenting Mistakes: ऐसे बहुत से बच्चे हैं जिन्हें आजकल ADHD यानी Attention Deficit Hyperactivity Disorder जैसी समस्याओं का काफी ज्यादा सामना करना पड़ रहा है. इसका एक बड़ा कारण फोन या स्क्रीन है. आज के डिजिटल समय में मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. लेकिन एक्सपर्ट्स की मानें तो बच्चों की इस समस्या के पीछे पेरेंट्स की एक बड़ी गलती होती है. जी हां, अक्सर माता-पिता बच्चों को चुप कराने या बिज़ी रखने के लिए उनके हाथ में फोन थमा देते हैं, लेकिन यही आदत उनके दिमाग पर लंबे समय तक असर डाल सकती है.

बच्चों का दिमाग कैसे करता है काम? (How does a child's brain work?)

बचपन में दिमाग लगातार डेवलप हो रहा होता है. इस दौरान बच्चा फोकस करना, धैर्य रखना और बोरियत को समझना सीखता है. ये सभी स्किल्स आगे चलकर पढ़ाई, बिहेवियर और इमोशनल बैलेंस के लिए बेहद जरूरी होती हैं. लेकिन जब बच्चा बार-बार स्क्रीन के कॉन्टेक्ट में आता है, तो यह नेचुरल लर्निंग प्रोसेस रुक जाता है.

स्क्रीन और डोपामाइन-

मोबाइल, टैबलेट और टीवी तेज़ वीडियो, चमकीले रंग और लगातार बदलते कंटेंट के चलते तुरंत डोपामाइन रिलीज करते हैं. डोपामाइन वही केमिकल है जो दिमाग को खुशी और एक्साइटमेंट का एहसास देता है. जब बच्चे का दिमाग इसका आदी हो जाता है, तो उसे किताब पढ़ना, चुपचाप बैठना या किसी एक चीज़ पर ध्यान देना बोरिंग लगने लगता है.

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फोकस का कमजोर होना-

स्क्रीन की वजह से दिमाग का “पेशेंस सर्किट” पूरी तरह डेवलप नहीं हो पाता. फोकस मसल्स कमजोर होने लगती है. ऐसे में जब पेरेंट्स फोन छीन लेते हैं, तो बच्चे असली दुनिया से डील नहीं कर पाते. उन्हें सब कुछ बहुत स्लो और बर्दाश्त से बाहर लगने लगता है, जिससे ADHD के लक्षणों को बढ़ावा मिल सकता है.

लॉन्ग टर्म के साइड इफेक्ट्स-

एक बार अगर दिमाग में ये न्यूरल पाथवे सेट हो जाएं, तो उन्हें बदलना आसान नहीं होता. हर बार जब आप बच्चे को शांत रखने के लिए फोन देते हैं, तो आप कुछ मिनट की राहत के बदले उसके लंबे समय के फोकस और बिहेवियर से जुड़ी समस्याओं को बढ़ावा दे रहे होते हैं.

बोरियत बच्चों के लिए क्यों है ज़रूरी?

बोरियत को अक्सर नेगेटिव माना जाता है, लेकिन सच यह है कि बोरियत बच्चों के दिमाग को मजबूत बनाती है. जब बच्चा बोर होता है, तो उसका दिमाग खुद से सोचने, कल्पना करने और नए आइडिया ढूंढने की कोशिश करता है. यही प्रोसेस फोकस करने की क्षमता को बेहतर बनाता है.

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