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क्या आपके बच्चे का फॉर्मूला मिल्क है सेफ? एक्सपर्ट से जानें क्यों है बेबी फूड दूसरे प्रोडक्ट्स से अलग

बेबी फूड अन्य फूड प्रोडक्ट्स से अलग होता है. ऐसे में इन प्रोडक्ट्स को विशेष निगरानी की जरूरत होती है. एक बार फिर इन फूड प्रोडक्ट्स की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. यहां जानते हैं इस बारे में-

क्या आपके बच्चे का फॉर्मूला मिल्क है सेफ? एक्सपर्ट से जानें क्यों है बेबी फूड दूसरे प्रोडक्ट्स से अलग
Baby Food Safety : एक बार फिर चर्चा में आया बेबी फॉर्मूला मिल्क

जब कोई माता-पिता अपने नवजात या छोटे बच्चे के लिए फॉर्मूला मिल्क या बेबी फूड खरीदते हैं, तो वे सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं, बल्कि भरोसा खरीदते हैं. लेकिन हाल के दिनों में शिशु पोषण प्रोडक्ट्स को लेकर सामने आए मामलों ने यही सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बच्चों के खाने में क्या है और उस पर कितनी निगरानी रखी जा रही है. इसी चिंता के बीच तुकाराम मुंढे की अगुवाई वाला महाराष्ट्र FDA अब बेबी फूड प्रोडक्ट्स को लेकर विशेष निगरानी में लेने जा रही है. 

सरकारी जांच में क्या मिला?

संसद में पेश सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में इंफेंट फूड और इंफेंट मिल्क सब्स्टीट्यूट के 522 सैंपलों की जांच की गई. इनमें से 45 सैंपल मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए. इनमें 5 सैंपल अनसेफ, 18 सब-स्टैंडर्ड और 22 मामलों में लेबलिंग खामियां, भ्रामक दावे या अन्य अनियमितताएं मिलीं. इससे पहले 2023-24 में 231 सैंपलों में 7 और 2022-23 में 389 सैंपलों में 30 नमूने नियमों का पालन नहीं करते पाए गए थे.

ये आंकड़े ये साबित नहीं करते कि बाजार में उपलब्ध अधिकांश बेबी फूड असुरक्षित हैं, लेकिन ये जरूर बताते हैं कि जांच के दौरान लगातार समस्याएं सामने आ रही हैं और इसलिए निगरानी की जरूरत बनी हुई है.

बेबी फूड सामान्य फूड प्रोडक्ट्स से क्यों होते हैं अलग?

मधुकर रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल की लैक्टेशन एंड डायटीशियन समीक्षा कालरा का कहना है कि बेबी फूड प्रोडक्ट्स सबसे सेंसटिव फूड प्रोडक्ट्स की लिस्ट में से एक हैं, क्योंकि इसका सेवन ऐसे बच्चे करते हैं, जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती. इसलिए इनमें किसी भी तरह की गड़बड़ी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है.

जांच के दौरान जिन बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, उनमें माइक्रोबियल कंटैमिनेशन, हैवी मेटल्स की मौजूदगी, कीटनाशक अवशेष, पोषण तत्वों का स्तर, सामग्री की गुणवत्ता और पैकेट पर किए गए दावे शामिल हैं. यही वजह है कि किसी प्रसिद्ध ब्रांड का नाम अपने आप में सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जाता.

नेस्ले फिर सवालों के घेरे में क्यों?

हाल ही में नेस्ले इंडिया के कुछ बेबी फूड प्रोडक्ट्स को लेकर FSSAI ने कानूनी कार्रवाई शुरू की है. जांच के दौरान नेस्ले नैन एक्सेला प्रो स्टेज 1 और लैक्टोजेन प्रो 1 से जुड़े कुछ विज्ञापन और प्रमोशनल दावों पर सवाल उठाए गए. नियामक का कहना है कि इन दावों में 5 HMOs', व्हे प्रोटीन जैसी बातें इस तरह पेश की गईं, जो शिशु आहार के प्रचार-प्रसार से जुड़े नियमों के अनुरूप नहीं थीं.

इसके अलावा एक फॉलो-अप फॉर्मूला के नमूने में बायोटिन का स्तर निर्धारित मानक से कम पाया गया. दोबारा जांच में भी यही स्थिति सामने आने के बाद प्रोडक्ट को सब-स्टैंडर्ड माना गया और मामला आगे बढ़ाया गया. हालांकि, कंपनी का कहना है कि वह भारतीय नियमों का पालन करती है और संबंधित एजेंसियों के साथ सहयोग कर रही है.

सेरेलक विवाद ने भी बढ़ाई थी बहस

बेबी फूड को लेकर विवाद सिर्फ मिलावट या गुणवत्ता तक सीमित नहीं हैं. 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय जांच में दावा किया गया था कि भारत में बिकने वाले कुछ सेरेलक प्रोडक्ट्स में ऐडेड शुगर मौजूद है. इस खुलासे के बाद नियामकीय स्तर पर जांच शुरू हुई थी. कंपनी ने तब कहा था कि उसके सभी प्रोडक्ट्स भारतीय नियमों और कोडेक्स स्टैंडर्स के अनुरूप हैं और उसने पिछले सालों में कई वैरिएंट्स में अतिरिक्त चीनी कम भी की है.

इस विवाद ने ये सवाल उठाया कि बच्चों के खाद्य उत्पादों में सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि पोषण संबंधी दावे और वास्तविक सामग्री भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं.

3.7 टन एक्सपायर्ड बेबी फूड का मामला

हाल ही में FSSAI ने ब्रिटिश लाइफ साइंसेस प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी कार्रवाई की थी. जांच के दौरान कथित तौर पर 3.7 मीट्रिक टन एक्सपायर्ड और मिसब्रांडेड बेबी फूड प्रोडक्ट्स बरामद किए गए. नियामक ने अदालत के निर्देशों के तहत इन उत्पादों को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू करवाई ताकि उन्हें दोबारा बाजार में न लाया जा सके.

ये मामला दिखाता है कि किसी खराब या एक्सपायर्ड उत्पाद की पहचान करना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सप्लाई चेन से पूरी तरह हटाना भी उतना ही जरूरी है.

एक शिकायत कैसे बन सकती है बड़ी जांच?

2015 में कोलकाता के एक कस्टमर ने Enfamil A+ Stage 3 में फफूंदी, काले कण और एक जीवित कीट मिलने की शिकायत की थी. इसके बाद प्रोडक्ट्स को लैब जांच के लिए भेजा गया, जहां नमूने को सब-स्टैंडर्ड और असुरक्षित बताया गया. मामला अदालत तक पहुंचा और वर्षों तक चला. बाद में 2026 में अदालत ने कुछ प्रक्रियागत आधारों पर एक पूर्व प्रबंध निदेशक के खिलाफ कार्रवाई रद्द कर दी. ये मामला बताता है कि एक आम कस्टमर की शिकायत भी बड़े खाद्य सुरक्षा तंत्र का हिस्सा बन सकती है.

महाराष्ट्र FDA की चुनौती क्या है?

महाराष्ट्र FDA के सामने अब सिर्फ सैंपलिंग नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की निगरानी की चुनौती है. उसे ये सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों के फूड प्रोडक्ट्स में पोषण संबंधी मानक, लेबलिंग, विज्ञापन, एक्सपायरी और सुरक्षा से जुड़े सभी नियमों का पालन हो. हाल के मामलों ने दिखाया है कि समस्या कभी गुणवत्ता में, कभी पोषण तत्वों में, कभी लेबलिंग में और कभी मार्केटिंग दावों में भी हो सकती है.

माता-पिता को क्या करना चाहिए?

डायटीशियन का कहना है कि ऐसे खबरों को लेकर पेरेंट्स को घबराने की जरूरत नहीं है. किसी एक प्रोडक्ट या कंपनी पर हुई कार्रवाई का मतलब यह नहीं कि पूरा बेबी फूड बाजार असुरक्षित है. लेकिन माता-पिता को हमेशा एक्सपायरी डेट, पैकेजिंग की स्थिति और डॉक्टर की सलाह का ध्यान रखना चाहिए. साथ ही अगर किसी उत्पाद को लेकर नियामक एजेंसियों की चेतावनी या रिकॉल नोटिस जारी हो तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

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