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आप सिगरेट नहीं पीते फिर भी खतरे में हैं! पैसिव स्मोकिंग से हर साल 17 लाख मौतें, लांसेट रिपोर्ट ने चौंकाया

Lancet Study के अनुसार सेकेंड-हैंड स्मोकिंग यानी पैसिव स्मोकिंग से हर साल 17 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। जानें बच्चों, महिलाओं और दिल की सेहत पर इसका असर.

आप सिगरेट नहीं पीते फिर भी खतरे में हैं! पैसिव स्मोकिंग से हर साल 17 लाख मौतें, लांसेट रिपोर्ट ने चौंकाया
सिगरेट कोई और पी रहा है, लेकिन नुकसान आपके दिल और फेफड़ों को हो रहा है
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अगर आप सिगरेट नहीं पीते, तब भी धूम्रपान से जुड़ी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं. The Lancet में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, दूसरों की सिगरेट का धुआं यानी सेकेंड-हैंड स्मोक हर साल करीब 17 लाख लोगों की जान ले रहा है. सबसे ज्यादा खतरा बच्चों, महिलाओं और दिल के मरीजों पर मंडरा रहा है.

हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने जिंदगी में कभी बीड़ी या सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया. हमें लगता है कि जब हम नशा ही नहीं करते, तो हमारे फेफड़े और दिल बिल्कुल महफूज हैं. मगर जरा रुकिए और सोचिए. क्या आपके घर में, बस स्टॉप पर, चाय की दुकान पर या फिर ऑफिस के बाहर कोई दूसरा शख्स आपके बगल में खड़े होकर धुंआ उड़ा रहा होता है? अगर हां, तो आप अनजाने में ही सही, मौत के उस फंदे में फंस रहे हैं जिसे मेडिकल भाषा में 'सेकेंड-हैंड स्मोक' या पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है.

दुनिया के सबसे मशहूर मेडिकल जर्नल 'द लांसेट' की एक ताजा और बेहद चौंकाने वाली स्टडी सामने आई है. इस रिपोर्ट के आंकड़े इतने डरावने हैं कि किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं. रिपोर्ट बताती है कि अकेले साल 2023 में दुनिया भर के लगभग 17 लाख (1.66 मिलियन) बेगुनाह लोगों की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि वे दूसरों की छोड़ी हुई सिगरेट के धुएं की चपेट में सांस ले रहे थे. यानी सिगरेट किसी और ने सुलगाई, और सजा किसी मासूम को भुगतनी पड़ी.

270 करोड़ लोग रोज ले रहे हैं जहरीला धुआं

लांसेट की इस रिसर्च में 1990 से लेकर 2023 तक, यानी पूरे 33 सालों के दौरान दुनिया के 204 देशों और इलाकों के आंकड़ों की बारीकी से पड़ताल की गई है. इसके नतीजे बताते हैं कि आज भी पूरी दुनिया में 2.7 अरब (270 करोड़) से ज्यादा लोग दूसरों के तंबाकू के धुएं में सांस लेने को मजबूर हैं.

सबसे दुखद पहलू यह है कि इस जहरीली हवा का शिकार बनने वालों में 76 करोड़ से ज्यादा छोटे बच्चे शामिल हैं, जिनकी उम्र 14 साल से भी कम है.

साल 2023 में दुनिया भर में तंबाकू और धूम्रपान से जुड़ी बीमारियों के चलते कुल मिलाकर करीब 80 लाख लोगों ने दम तोड़ा. इनमें से लाखों वे लोग थे जिन्होंने खुद कभी सिगरेट नहीं पी थी.

डाक्टरों का साफ कहना है कि सेकेंड-हैंड स्मोक का कोई सुरक्षित दायरा या 'सेफ लेवल' होता ही नहीं. आप चाहे किसी बंद कमरे में हल्का सा धुआं सूंघें या खिड़की के पास, नुकसान उतना ही गहरा होता है.

Watch Video- धूम्रपान करने वालों को खांसी की दिक्कत क्यों होती है?

सुलगती सिगरेट का धुआं पीने वाले से ज्यादा आपके लिए खतरनाक क्यों?

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि जो इंसान सिगरेट पी रहा है, धुआं तो उसके अंदर जा रहा है, फिर पास खड़े व्यक्ति को इतना नुकसान कैसे हो सकता है? वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट में इसकी बहुत सीधी वजह समझाई है.

जब कोई स्मोकर सिगरेट पीता है, तो हवा में दो तरह का धुआं फैलता है: पहला, वह धुआं जो स्मोकर अपने फेफड़ों से बाहर छोड़ता है (एक्सहेल्ड स्मोक). दूसरा, वह धुआं जो सिगरेट या बीड़ी की नोक पर सीधे जलने से हवा में घुलता रहता है (साइडस्ट्रीम स्मोक).

अब असली खेल यहीं छुपा है. जो इंसान सिगरेट खींच रहा होता है, उसकी सिगरेट में फिल्टर लगा होता है जो थोड़े बहुत जहरीले तत्वों को रोकता है. लेकिन जो धुआं सिगरेट की नोक से सीधे हवा में उड़ता है, वह पूरी तरह अनफिल्टर्ड होता है. इस धुएं में कैंसर पैदा करने वाले तत्व (कार्सिनोजेन्स) और जहरीले केमिकल्स की मात्रा पीने वाले के धुएं से कहीं ज्यादा सघन होती है. यानी पास खड़ा बेकसूर इंसान बिना किसी फिल्टर के उस गाढ़े जहर को सीधे अपनी सांसों में खींच रहा होता है.

दिल पर सीधा हमला: इस्केमिक हार्ट डिजीज का खतरा

इस रिसर्च में यह बात खुलकर सामने आई है कि सेकेंड-हैंड स्मोक से होने वाली 17 लाख मौतों में सबसे बड़ी वजह दिल की बीमारियां हैं. खासकर 'इस्केमिक हार्ट डिजीज' (Ischemic Heart Disease).

यह वह गंभीर बीमारी है जिसमें सिगरेट का धुआं खून की नलियों को संकरा और सख्त बना देता है. नतीजतन दिल की मांसपेशियों तक सही मात्रा में आक्सीजन और खून नहीं पहुंच पाता. इससे सीने में तेज दर्द, एनजाइना और आखिरकार अचानक साइलेंट हार्ट अटैक आ जाता है.

कितने ही ऐसे लोग हैं जिन्हें कभी बीपी या शुगर नहीं था, जो शराब या सिगरेट नहीं पीते थे, फिर भी 40-45 की उम्र में हार्ट अटैक आ गया. डाक्टर मानते हैं कि इसके पीछे लंबे समय तक सेकेंड-हैंड स्मोक का साया भी एक बहुत बड़ा कारण है.

मासूम बच्चों पर टूटता सबसे बड़ा कहर

इस रिपोर्ट का सबसे दर्दनाक हिस्सा बच्चों से जुड़ा हुआ है. वो बच्चे जो खुद अपना बचाव नहीं कर सकते, अपने ही घरों में बड़ों की नासमझी का शिकार हो रहे हैं.

  • अध्ययन के अनुसार, साल 2023 में सिर्फ दूसरों के धुएं के कारण 52 लाख से ज्यादा बच्चों को फेफड़ों और सांस की गंभीर बीमारियों (रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन) ने घेर लिया.
  • जो बच्चे सिगरेट के धुएं वाले माहौल में रहते हैं, उनमें निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
  • छोटे बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते. जब उनके फेफड़ों में यह धुआं जाता है, तो उनकी सांस लेने की नली सूज जाती है, जिससे उन्हें बार-बार खांसी, घरघराहट और सांस फूलने की तकलीफ झेलनी पड़ती है.

घर की चारदीवारी में पिसती महिलाएं

अध्ययन में महिलाओं की स्थिति पर भी विशेष रोशनी डाली गई है. दुनिया के कई ऐसे इलाके हैं जहां महिलाओं में सिगरेट पीने का चलन न के बराबर है. लेकिन इसके बावजूद वे पुरुषों की तुलना में सेकेंड-हैंड स्मोक से ज्यादा बीमार पड़ रही हैं.

इसकी सबसे बड़ी वजह है हमारे घरों का माहौल. अक्सर पुरुष घर के अंदर, ड्राइंग रूम में या बालकनी में बैठकर धुआं उड़ाते हैं. महिलाएं घंटों उसी हवा में खाना बनाती हैं या काम करती हैं. समाज में इसे कभी गंभीर मसला माना ही नहीं गया.

लांसेट की रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि महिलाओं की सेहत के लिए सेकेंड-हैंड स्मोक एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है, लेकिन इस पर वैसी चर्चा या जागरूकता देखने को नहीं मिलती जैसी होनी चाहिए.

दुनिया में स्मोकिंग कम हुई, फिर भी खतरा जस का तस क्यों?

रिपोर्ट में एक दिलचस्प और आंखें खोलने वाला पहलू यह भी है कि 1990 के बाद से दुनिया भर में सिगरेट पीने वालों के प्रतिशत में कमी आई है. सरकारों ने टैक्स बढ़ाए, विज्ञापनों पर रोक लगाई और सिगरेट के पैकेट पर डरावनी तस्वीरें छापीं. लेकिन इसके बावजूद सेकेंड-हैंड स्मोक के शिकार लोगों की कुल संख्या कम नहीं हुई.

इसकी दो मुख्य वजहें हैं:

बढ़ती आबादी: पिछले 30 सालों में दुनिया की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है. भले ही सिगरेट पीने वालों का प्रतिशत गिरा हो, पर कुल संख्या अभी भी बहुत ज्यादा है.
कुछ इलाकों में बढ़ता धुआं: अफ्रीका और मिडिल ईस्ट जैसे विकासशील क्षेत्रों में तंबाकू का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिससे वहां की बहुत बड़ी आबादी इस धुएं की चपेट में आ गई है.

अब आगे का रास्ता क्या है? सरकार और समाज क्या करे?

लांसेट के शोधकर्ताओं ने दुनिया भर की सरकारों से सख्त कदम उठाने की मांग की है. सिर्फ पार्क या बस स्टैंड पर 'धूम्रपान निषेध' का बोर्ड लगा देने से काम नहीं चलेगा.

सार्वजनिक जगहों पर जीरो-टालरेंस: रेलवे स्टेशन, रेस्टोरेंट, बस स्टैंड और ऑफिस के आसपास स्मोकिंग पर कड़ाई से जुर्माना लगना चाहिए.
घर को बनाएं स्मोक-फ्री जोन: सबसे बड़ी जंग घर के अंदर है. अगर परिवार में कोई सिगरेट पीता भी है, तो उसे यह सख्त हिदायत होनी चाहिए कि वह घर की चारदीवारी के भीतर कभी सिगरेट न सुलगाए. खिड़की खोलकर या पंखा चलाकर सिगरेट पीना कोई हल नहीं है, क्योंकि धुआं सोफे, पर्दों और कपड़ों में चिपक जाता है.
बच्चों के सामने तौबा: कार में या बच्चों के साथ कमरे में सिगरेट पीना एक तरह से उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है.

अगर कोई आपके सामने सिगरेट जलाए, तो चुप मत रहिए. प्यार से या सख्ती से, उसे दूर जाने को कहिए. क्योंकि साफ हवा में सांस लेना आपका बुनियादी हक है, और किसी की बुरी लत की सजा आपके फेफड़ों को नहीं मिलनी चाहिए.

FAQs

क्या सेकेंड-हैंड स्मोकिंग भी उतनी ही खतरनाक है?

हां. विशेषज्ञों के अनुसार सेकेंड-हैंड स्मोक का कोई सुरक्षित स्तर नहीं माना जाता.

क्या बच्चों को सिगरेट का धुआं ज्यादा नुकसान पहुंचाता है?

हां. बच्चों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया और बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है.

क्या घर की बालकनी में सिगरेट पीने से परिवार सुरक्षित रहता है?

नहीं. धुआं घर के अंदर आ सकता है और कपड़ों, पर्दों व फर्नीचर पर भी जमा रह सकता है.

पैसिव स्मोकिंग से कौन-सी बीमारियां हो सकती हैं?

हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों की बीमारी, कैंसर और श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है.

क्या खिड़की खोलकर धूम्रपान करना पर्याप्त है?

नहीं, इससे धुएं के हानिकारक तत्व पूरी तरह खत्म नहीं होते.

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