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हाथ की घड़ी बताएगी दिल का हाल? कार्डियोलॉजिस्ट ने बताई सच्चाई

क्या आपकी स्मार्टवॉच दिल की धड़कन की गड़बड़ी पकड़ सकती है? जानिए कैसे घड़ी AFib का अलर्ट देती है, भारत में ये क्यों जरूरी है और अलर्ट आए तो क्या करना चाहिए.

हाथ की घड़ी बताएगी दिल का हाल? कार्डियोलॉजिस्ट ने बताई सच्चाई
स्मार्टवॉच पर कितना भरोसा करें
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पहले स्मार्टवॉच सिर्फ कदम गिनती थी, अब कहानी बदल गई है. आज की घड़ियां पूरे दिन आपकी पल्स पर नजर रखती हैं, कुछ में तो ECG तक हो जाता है. अब सवाल यही उठता है कि क्या कलाई पर बंधी ये छोटी सी घड़ी दिल की गड़बड़ी को सच में पकड़ सकती है? तो जवाब है हां, पकड़ सकती है, लेकिन एक शर्त के साथ. ये घड़ी AFib जैसी दिल की लय बिगड़ने की बीमारी का पैटर्न भांप सकती है, पर इसे डॉक्टर की पर्ची समझ लेना गलत होगा. इसका सबसे बड़ा फायदा यही है कि ये आपको वक्त रहते सावधान कर देती है, नहीं तो कई बार ऐसी दिक्कतें पता ही नहीं चलतीं.

जब घड़ी को कुछ गड़बड़ लगती है, तब क्या होता है?

ज्यादातर स्मार्टवॉच कलाई पर खून के बहाव को भांपने के लिए एक छोटे से लाइट सेंसर का इस्तेमाल करती हैं. इस तकनीक को 'पीपीजी' (PPG) कहते हैं. यह लगातार दिल की धड़कनों के गैप को ट्रैक करती रहती है और देखती है कि पैटर्न में कोई ऊपर-नीचे तो नहीं हो रहा. कुछ घड़ियों में तो यह सुविधा भी होती है कि आप अपनी उंगली ऊपर रखकर ईसीजी निकाल लें, जिससे दिल की बिजली जैसी गतिविधि का एक छोटा सा कच्चा चिट्ठा हाथ लग जाता है.

यह फीचर 'एट्रियल फिब्रिलेशन' (AFib) जैसी समस्या को पकड़ने में काफी काम आ सकता है, जिसमें दिल के ऊपर वाले हिस्से उल्टे-सीधे धड़कने लगते हैं. वैसे तो इसकी वजह से सीने में धड़कन महसूस होना, सांस उखड़ना या चक्कर आना जैसी परेशानियां घेर सकती हैं, लेकिन मज़े की बात यह है कि कई लोगों को इसका दूर-दूर तक पता नहीं चलता और कोई लक्षण नहीं दिखता. यही चक्कर है कि जब कभी ऐसी दिक्कत होती है, तो डॉक्टर के रूटीन क्लिनिक चेकअप में यह पकड़ में ही नहीं आती.

आखिर भारत के मामले में यह इतनी बड़ी बात क्यों है?

दिल की धड़कन की ये लुका-छिपी वाली बीमारियां सिर्फ किताबी बातें नहीं हैं, बल्कि इनकी हकीकत काफी अलग है. 'इंडियन हार्ट जर्नल' में छपी 2024 की एक रिसर्च में करीब 23,847 भारतीय वयस्कों की 24 घंटे की होल्टर रिकॉर्डिंग को बारीकी से परखा गया. चौकाने वाली बात यह सामने आई कि लगभग 17.4% लोगों में एट्रियल फिब्रिलेशन (AFib) की शिकायत मिली, और एक बार दिल के धड़कने का यह गड़बड़ पैटर्न औसतन सिर्फ 14 मिनट तक ही टिका.

अब आप खुद ही सोचिए, इतने छोटे से अंतराल के लिए कौन डॉक्टर के पास भागा-भागा फिरेगा और वहां पहुंचकर इसे पकड़ पाना भला कितना मुमकिन है?

मान लीजिए रात के ठीक दो बजे किसी की घड़ी ने दिल की गलत चाल का सायरन बजा दिया, पर सुबह उठते ही वह एकदम भला-चंगा महसूस कर रहा है. जब तक वह शख्स आराम से अपना बिस्तर छोड़कर डॉक्टर के क्लिनिक तक पहुंचेगा, तब तक तो दिल की चाल बिल्कुल सीधी हो चुकी होगी और वहां होने वाला आम ईसीजी एकदम साफ़ रिपोर्ट दे देगा. बस, यहीं पर स्मार्टवॉच का रिकॉर्डिंग वाला फीचर डॉक्टर के बड़े काम आ जाता है, क्योंकि इससे उन्हें यह सुराग मिल जाता है कि क्लिनिक की चारदीवारी के बाहर असल माजरा क्या हुआ था.

अलर्ट आने पर जांच कराएं, खुद डॉक्टर न बनें

घबराकर खुद डॉक्टर न बनें. घड़ी की ECG या रिदम रिपोर्ट को सेव रखें और नोट करें कि किस टाइम अलर्ट आया और क्या महसूस हुआ. डॉक्टर इसके बाद 12-लीड ECG, होल्टर या लंबे समय वाली मॉनिटरिंग लिख सकते हैं. गाइडलाइंस भी यही कहती हैं कि वियरेबल का डेटा मददगार है, पर फाइनल डायग्नोसिस हमेशा सही ECG और डॉक्टर की जांच से ही होगा.

डॉ. भरत बी. कुकरेती, डायरेक्टर एवं यूनिट हेड - इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, पारस हेल्थ, गुरुग्राम

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