मुंबई में 28 सितंबर को एक बहुत बड़ा जलसा होने जा रहा है. एनडीटीवी युवा का मंच सजकर तैयार है और इस बार का नारा है 'यंग वॉइस, बोल्ड डायलॉग'. सियासत से लेकर खेल के मैदान तक के चेहरे तो जुट ही रहे हैं, लेकिन हमारी रसोई, हमारी थाली और रोजमर्रा की सेहत पर सीधी बात करने के लिए तीन ऐसी शख्सियतें आ रही हैं, जिनका नाम सुनते ही लोग कान खड़े कर लेते हैं.
NDTV Yuva 2026 में इस बार हेल्थ, पोषण और मेंटल हेल्थ जैसे अहम मुद्दों पर खास चर्चा होने वाली है. इस कार्यक्रम में Food Pharmer रेवंत हिमातसिंगका, IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे और डिजिटल क्रिएटर Dr M युवाओं के साथ फूड सेफ्टी, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बेहतर जीवनशैली पर अपने विचार साझा करेंगे.
ये तीनों लोग ऐसे हैं जिन्होंने सोशल मीडिया से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में लोगों की आंखें खोली हैं. जब बात सेहत और खाने की आती है, तो झूठे वादों के बीच सच की बहुत जरूरत होती है.
मंच पर कौन-कौन आ रहा है खास
रेवंत हिमातसिंगका (Food Pharmer): डिब्बाबंद खाने के पीछे लिखे बारीक अक्षरों का सच सामने लाने वाले रेवंत को आज कौन नहीं जानता. पैकेट वाले चिप्स, जूस और बिस्कुट में छुपे जहर जैसी चीनी और केमिकल्स की पोल खोलकर इन्होंने पूरे देश में 'लेबल पढ़ो' आंदोलन खड़ा कर दिया. बड़ी-बड़ी कंपनियों को अपनी पैकेजिंग और फार्मूले बदलने पड़े हैं. एनडीटीवी के मंच पर रेवंत बताएंगे कि असल में हम क्या खा रहे हैं और बच्चों की थाली कितनी महफूज है.
तुकाराम मुंढे (IAS): सख्त फैसलों और बिना लाग-लपेट के काम करने के लिए मशहूर आईएएस अफसर तुकाराम मुंढे की छवि एक कड़क प्रशासक की है. जब बात पब्लिक हेल्थ और आम जनता तक बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की हो, तो इनका विजन देखने लायक होता है. वे बताएंगे कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे को कैसे मजबूत बनाया जाए ताकि हर आम आदमी तक सही इलाज और पोषण पहुंच सके.
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दानिश शेख उर्फ डॉ. एम: डिजिटल दौर में मेंटल हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़ी उलझनों को सुलझाने में दानिश शेख ने युवाओं के बीच खास जगह बनाई है. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में डिप्रेशन, तनाव और खराब खानपान ने इंसानी जिस्म को भीतर से खोखला कर दिया है. डॉ. एम इसी दर्द की नब्ज पकड़ते हैं और युवाओं को आसान तरीके से जीना सिखाते हैं.
बदलाव की नई शुरुआत
अक्सर हम सेहत और फूड को सिर्फ तब याद करते हैं जब डाक्टर के यहां पर्ची कटानी पड़ती है. मगर यह मंच सिर्फ किताबी बातों का नहीं, बल्कि सीधे एक्शन का गवाह बनेगा.
जब रेवंत की बेबाकी, तुकाराम मुंढे का कड़ा प्रशासनिक तजुर्बा और डॉ. एम की इंसानी समझ एक साथ टकराएगी, तो बहस का नतीजा बहुत दूर तक जाएगा. अगर आप भी अपने शरीर, अपने खानपान और अपने परिवार की भलाई को लेकर जरा भी फिक्रमंद हैं, तो 28 सितंबर को होने वाली यह बातचीत मिस करने जैसी बिल्कुल नहीं है. नई सोच और सच का यह सामना यकीनन बहुत कुछ सिखाकर जाएगा.
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