आजकल कमर दर्द लोगो की सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन गया है. इसके साथ ही मोटापा भी बहुत तेजी से बढ़ने वाली पब्लिक हेल्थ की चुनौती बन कर सामने आया है. हम में से ज्यादातर लोग यह तो जानते है कि मोटापे की वजह से डायबिटीज, दिल की बिमारी और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है. लेकिन बहुत कम लोग यह बात समझ पाते है कि शरीर का जरूरत से ज्यादा वजन हमारी रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइन पर भी बहुत भयानक दबाव डालता है.
मेरे क्लिनिक में आजकल ऐसे बहुत से मरीज आते है जिनकी उम्र सिर्फ 30 या 40 साल के आसपास होती है और वो कमर दर्द से प्रेसान रहते है. ऐसा किसी बढ़ती उम्र की वजह से नहीं हो रहा है, बल्कि उनके शरीर के ज्यादा वजन ने उनकी रीढ़ की हड्डी को समय से पहले ही घिसना शुरू कर दिया है. खासकर हमारे भारतीय लाइफस्टाइल में जहां फिजिकल एक्टिविटी कम हो गई है, यह समस्या और भी गंभीर रूप ले चुकी है. लेकिन इसमें एक अच्छी खबर भी है.
मोटापा एक ऐसा रिस्क फैक्टर है जिसे हम बदल सकते है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर आप अपने वजन को कंट्रोल कर लेते है, तो आप अपनी रीढ़ की हड्डी की सेहत को सुधार सकते है और भविष्य में होने वाली कई बड़ी परेशानियों से बच सकते है.
ज्यादा वजन रीढ़ की हड्डी को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
हमारी रीढ़ की हड्डी का डिजाइन कुछ इस तरह का होता है कि यह हमारे शरीर का पूरा वजन भी संभालती है, हमें चलने फिरने में मदद भी करती है और हमारे स्पाइनल कॉर्ड को पूरी तरह से सुरक्षित भी रखती है. जब हमारे शरीर का वजन एक किलो भी बढ़ता है, तो उसका सीधा असर हमारी रीढ़ की हड्डियों (वर्टेब्रा), उनके बीच मौजूद गद्देदार डिस्क, जॉइंट्स और उनको सपोर्ट करने वाली मांसपेशियों पर पड़ता है.
खासकर जब पेट का मोटापा बढ़ता है, तो शरीर का सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी आगे की तरफ खिसक जाता है. इससे रीढ़ की हड्डी पर आगे की तरफ बहुत तेज खिंचाव पड़ता है. इसे एक बहुत ही आसान से उदाहरण से समझते है. आप अपनी रीढ़ की हड्डी को एक कार के सस्पेंशन या शॉक एब्जॉर्बर की तरह मान लीजिए. अगर कोई गाड़ी पांच लोगो को बिठाने के लिए बनाई गई है और आप उसमे रोज दस लोगो को बैठा कर खराब रास्तो पर सफर करेंगे, तो क्या होगा. जाहिर सी बात है कि उस गाड़ी का सस्पेंशन बहुत जल्दी खराब हो जाएगा.
बिल्कुल ऐसा ही हमारी रीढ़ की हड्डी के साथ भी होता है. जब हमारी स्पाइन को रोज रोज उसकी क्षमता से बहुत ज्यादा वजन उठाना पड़ता है, तो उस पर भयानक स्ट्रेस पड़ता है. इस एक्स्ट्रा लोड की वजह से रीढ़ की हड्डी के स्ट्रक्चर में तेजी से टूट फूट होने लगती है और यही चीज आगे चलकर लगातार रहने वाले दर्द का कारण बन जाती है.
मोटापे से जुड़ी रीढ़ की हड्डी की आम बीमारियां
क्रोनिक लोअर बैक पेन (लगातार रहने वाला कमर के निचले हिस्से का दर्द)
कई सारी मेडिकल रिसर्च में यह बात साफ तौर पर सामने आई है कि मोटापे का सीधा संबंध कमर के निचले हिस्से में रहने वाले दर्द से है. अक्सर मरीज मुझे अपनी इन दिक्कतों के बारे में बताते है:
- कमर के निचले हिस्से में लगातार एक मीठा मीठा दर्द बना रहना
- सुबह बिस्तर से उठने पर कमर में बहुत ज्यादा अकड़न महसूस होना
- किचन में या किसी काम के लिए ज्यादा देर तक एक जगह पर खड़े रहने में परेशानी होना
- थोड़ा सा चलने पर ही थक जाना या कमर का जवाब दे देना
डीजेनरेटिव डिस्क डिजीज (डिस्क का घिसना)
शरीर का वजन ज्यादा होने से रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद रबर जैसी डिस्क पर दबाव काफी बढ़ जाता है. इसकी वजह से डिस्क का पानी कम होने लगता है, वो सूखने लगती है और समय के साथ उसकी ऊंचाई भी कम हो जाती है. वैसे तो उम्र बढ़ने के साथ डिस्क का घिसना एक नार्मल बात है, लेकिन मोटापा इस प्रोसेस को बहुत ज्यादा तेज कर देता है. जैसे एक पुरानी गाड़ी का टायर जल्दी घिस जाता है, वैसे ही भारी शरीर के नीचे डिस्क भी जल्दी घिस जाती है.
स्लिप्ड डिस्क (डिस्क हर्नियेशन)
रीढ़ की हड्डी पर जब मेकेनिकल स्ट्रेस बढ़ता है तो डिस्क के डैमेज होने या फटने का रिस्क भी काफी बढ़ जाता है. जब डिस्क की बाहरी लेयर कमजोर पड़ जाती है, तो उसके अंदर का जेली जैसा मटेरियल बाहर निकल आता है. यह मटेरियल आस पास की नसों को दबाने लगता है, जिससे कई तरह की भारी परेशानियां होती है जैसे:
- साइटिका का दर्द (कमर से लेकर पैर की एड़ी तक जाने वाला करंट जैसा दर्द)
- पैरों में भयंकर दर्द होना
- पैरों में झुनझुनी या चींटियां चलने जैसा महसूस होना
- पैरों का सुन्न पड़ जाना
- चलते समय पैरों में कमजोरी आना
यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि हर स्लिप डिस्क मोटापे की वजह से ही हो, लेकिन ज्यादा वजन इसके होने के चांस को बढ़ा देता है और इसे आसानी से ठीक भी नहीं होने देता.
लंबर कैनाल स्टिनोसिस
मोटापे के कारण रीढ़ की हड्डी में जो लगातार बदलाव आते है, उनकी वजह से स्पाइनल कैनाल (वो नली जिससे हमारी नसें गुजरती है) अंदर से सिकुड़ सकती है. इसमें मरीजों को अक्सर यह सब महसूस होता है:
- बहुत तेज कमर दर्द
- थोड़ा सा भी पैदल चलते समय पैरों में खिंचाव और दर्द होना
- पैरों का भारी होकर सुन्न होना
- ज्यादा लंबी दूरी तक चलने में बहुत परेशानी होना
कई मरीज मुझे बताते है कि जब वो दर्द के मारे आगे की तरफ झुकते है या कुर्सी पर बैठ जाते है तो उन्हें इस दर्द में काफी आराम मिल जाता है.
फेसट जॉइंट अर्थराइटिस : फेसट जॉइंट्स बहुत छोटे छोटे जॉइंट्स होते है जो हमारी रीढ़ की हड्डी के पिछले हिस्से में मौजूद होते है. जैसे जैसे इंसान के शरीर का वजन बढ़ता है, इन जॉइंट्स पर बहुत भारी बोझ पड़ने लगता है. इसकी वजह से इन जॉइंट्स का कार्टिलेज बहुत तेजी से घिसने लगता है जो आगे चलकर अर्थराइटिस और पुराने कमर दर्द का सबसे बड़ा कारण बनता है.
हालांकि यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि मोटापा सिर्फ एक रिस्क फैक्टर है, यह कमर दर्द का इकलौता कारण नहीं है. ऐसे बहुत से लोग है जिनका वजन बहुत ज्यादा है लेकिन उन्हें कभी कमर दर्द नहीं होता. वही दूसरी तरफ ऐसे भी कई लोग है जिनका वजन एकदम नार्मल है फिर भी उन्हें रीढ़ की हड्डी की गंभीर बीमारियां हो जाती है. स्पाइन की परेशानियां अक्सर कई सारी चीजों के एक साथ मिलने से होती है. इसमें आपके जेनेटिक्स, आपकी उम्र, आपकी रोज की फिजिकल एक्टिविटी, आपका काम कैसा है, क्या आप स्मोकिंग करते है, आपकी हड्डियों की अंदरूनी ताकत और आपकी ओवरआल फिटनेस जैसी बहुत सी चीजें शामिल होती है.
वजन कम करने के क्या फायदे होते है?
- रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाला दबाव और स्ट्रेस एकदम से कम हो जाता है
- आपके चलने फिरने और दौड़ने की क्षमता में गजब का सुधार आता है
- शरीर के अंदरूनी हिस्सों में होने वाली सूजन कम होती है
- आपकी ओवरआल फिजिकल फिटनेस काफी बेहतर हो जाती है
- मांसपेशियों और घुटनों के जोड़ों पर पड़ने वाला खिंचाव भी कम हो जाता है
- अगर आपको कभी स्पाइन सर्जरी की जरूरत पड़ती भी है, तो रिकवरी बहुत जल्दी होती है और रिजल्ट बहुत अच्छे आते है
लेकिन यह भी सच है कि सिर्फ वजन कम कर लेने से हड्डी में आ चुकी हर तरह की पुरानी खराबी ठीक नहीं हो सकती. अगर आपकी कोई नस बहुत बुरी तरह से दब गई है, स्पाइन में बहुत ज्यादा अस्थिरता (इनस्टेबिलिटी) आ गई है या स्पाइनल कॉर्ड पर भारी दबाव है, तो ऐसे में आपको किसी अच्छे स्पाइन डाक्टर से खास इलाज करवाने की जरूरत पड़ेगी ही. हमारा मकसद सिर्फ तराजू पर वजन कम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि रीढ़ की हड्डी की पूरी सेहत को लंबे समय के लिए सुधारना होना चाहिए.
एक कम्पलीट अप्रोच ही सबसे अच्छा काम करती है
मोटापे से जुड़े कमर दर्द को हमेशा के लिए ठीक करने के लिए सिर्फ मेडिकल स्टोर से पेनकिलर खा लेना काफी नहीं है. इससे सिर्फ कुछ घंटो का आराम मिलेगा. इसके लिए आपको एक सही और पक्के ट्रीटमेंट प्लान की जरूरत होती है जिसमे यह सब चीजें शामिल होती है:
रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी
ज्यादातर मरीजों के लिए रोज सुबह शाम पैदल चलना यानी वाकिंग सबसे सुरक्षित और असरदार एक्सरसाइज में से एक है. इसके अलावा अपनी कोर मसल्स (पेट और पीठ की मांसपेशियां) को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज या योगासन करने से स्पाइन को एक मजबूत सपोर्ट मिलता है और आपके उठने बैठने का पोस्चर भी सुधरता है.
हेल्दी न्यूट्रिशन (सही खानपान)
एक बैलेंस डाइट लेना बहुत जरूरी है जिसमे शामिल हो:
- भरपूर प्रोटीन वाली चीजें जैसे दालें और पनीर
- हड्डियों के लिए कैल्शियम
- धूप और डाइट से मिलने वाला विटामिन डी
- ताजे फल
- ढेर सारी हरी सब्जियां
- साबुत अनाज
यह सब चीजें आपकी हड्डियों और मांसपेशियों को अंदर से मजबूत बनाती है और साथ ही वजन को बिना किसी कमजोरी के कंट्रोल में रखने में भी बहुत मदद करती है.
फिजियोथेरेपी
हर मरीज की तकलीफ के हिसाब से एक अलग फिजियोथेरेपी प्लान बनाया जाता है जिससे इन चीजों में बहुत सुधार आता है:
- शरीर का लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी)
- कोर स्ट्रेंथ
- शरीर का बैलेंस
- आपके रोजमर्रा के काम करने और चलने का तरीका
लाइफस्टाइल में बदलाव
आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में किए गए कुछ छोटे छोटे बदलाव बहुत बड़ा असर दिखा सकते है:
- टीवी या लैपटॉप के सामने बहुत देर तक एक ही जगह पर बैठे रहने से बचे.
- अपने ऑफिस या काम करने की जगह की कुर्सी और टेबल को अपनी हाइट के हिसाब से आरामदायक बनाए.
- सिगरेट और तंबाकू जैसी चीजों से बिल्कुल दूर रहे क्योकि ये हड्डियों को खोखला करती है.
- रात को कम से कम सात से आठ घंटे की एक अच्छी और गहरी नींद ले.
- अपने काम के तनाव या स्ट्रेस को कम करने की पूरी कोसिस करे.
मेडिकल और सर्जिकल ट्रीटमेंट
जब लाइफस्टाइल में बदलाव और एक्सरसाइज से भी पूरा आराम नहीं मिलता, तब इलाज के इन एडवांस तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है:
- दर्द कम करने की खास दवाइयां
- इमेज गाइडेड स्पाइनल इंजेक्शन जो सीधा दर्द वाली जगह पर दिया जाता है
- मिनिमली इनवेसिव प्रोसीजर (जिसमे बहुत छोटे चीरे लगते है)
- एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी
- स्पाइनल फिक्सेशन या डीकंप्रेसन सर्जरी
- इनमे से कौन सा इलाज आपके लिए सही रहेगा, यह सिर्फ आपके मोटापे पर निर्भर नहीं करता बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि आपको असल में बिमारी क्या है और आपकी नसें कितनी दबी हुई है.
बचाव की शुरुआत आपके सोचने से भी पहले हो जानी चाहिए
अपनी रीढ़ की हड्डी को बचाने का सबसे सही समय वो होता है जब उसमे कोई बड़ा डैमेज या दर्द शुरू ही नहीं हुआ होता है. अगर आप अपनी पूरी जवानी और आने वाले बुढ़ापे में एक सही वजन मेन्टेन करके रखते है, तो आप हर दिन अपनी रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाले फालतू बोझ को कम कर रहे होते है.
नियमित रूप से एक्सरसाइज करना, घर का बना अच्छा खाना खाने की आदतें डालना और कमर दर्द शुरू होते ही उसे इग्नोर करने के बजाय उसका सही इलाज करवाना, ये सब आपके फ्यूचर के लिए एक बहुत अच्छे इन्वेस्टमेंट की तरह है. ये सारी आदतें आपको लंबे समय तक चलने फिरने के काबिल और अपने काम खुद करने के लिए आत्मनिर्भर बनाए रखती है.
अगर आप अपना थोड़ा सा भी वजन कम कर लेते है और साथ में अपनी रोज की फिजिकल एक्टिविटी को बढ़ा देते है, तो इससे आपके कमर के दर्द में, आपके काम करने की क्षमता में और आपकी पूरी सेहत में बहुत बड़े और पॉजिटिव बदलाव आ सकते है.
रीढ़ की हड्डी से जुड़ी गंभीर बीमारियां किसी भी इंसान को हो सकती है, चाहे उसका वजन कुछ भी हो. लेकिन एक स्वस्थ और मजबूत रीढ़ की हड्डी ही एक एक्टिव और शानदार जीवन का आधार होती है. इसलिए आज अगर आप अपने बढ़ते हुए वजन का ध्यान रख रहे है, तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप आने वाले सालो के लिए अपनी कमर और अपनी पीठ को मजबूत बना रहे है.
लेखक: डाक्टर सिद्धार्थ कातकड़े, कंसल्टेंट स्पाइन सर्जन, बॉम्बे स्पाइन क्लिनिक. कटकड़े मुंबई के जाने-माने स्पाइन सर्जन हैं. वे मिनिमल एक्सेस स्पाइन सर्जरी और वयस्क एवं बाल्यावस्था (Adult & Paediatric) स्पाइनल डिफॉर्मिटी सर्जरी के विशेषज्ञ हैं. वर्तमान में वे बॉम्बे स्पाइन क्लिनिक के डायरेक्टर एवं हेड के रूप में कार्यरत हैं. रीढ़ की हड्डी से जुड़ी जटिल समस्याओं, कमर दर्द, स्कोलियोसिस और अन्य स्पाइन विकारों के उपचार में उन्हें विशेष अनुभव प्राप्त है.
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