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IIT Indore ने विकसित की नई तकनीक, लार और स्वैब से होगा ओरल कैंसर का शुरुआती पता

Oral Cancer Detection Technology : IIT Indore के शोधकर्ताओं ने ऐसी नॉन-इनवेसिव तकनीक विकसित करने का दावा किया है जो लार और मुंह के स्वैब से ओरल कैंसर के शुरुआती संकेत पहचान सकती है. जानिए यह बायोप्सी से कैसे अलग है.

IIT Indore ने विकसित की नई तकनीक, लार और स्वैब से होगा ओरल कैंसर का शुरुआती पता

Oral Cancer Detection Technology : मेडिकल की दुनिया में IIT इंदौर ने मुंह के कैंसर की शुरुआती जांच को आसान बनाने की दिशा में बड़ी पहल की है. दरअसल, अभी तक मुंह में होने वाले कैंसर की पहचान के लिए अब तक बायोप्सी जैसी प्रक्रिया की जरूरत पड़ती है. इसमें प्रभावित हिस्से से टिश्यू का सैंपल लिया जाता है. लेकिन अब इस प्रक्रिया में बहुत जल्द बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. क्योंकि IIT इंदौर के रिसर्चर्स ने एक नॉन-इनवेसिव तकनीक डेवलप करने का दावा किया है, जो लार या मुंह के अंदर की सतह से लिए गए स्वैब से कैंसर का पता लगाएगी.

यह तकनीक अभी रिसर्च स्टेज में है और फिलहाल नियमित क्लिनिकल जांच या बायोप्सी का विकल्प नहीं है.

IIT Indore की नई तकनीक क्या है?

रिसर्चर्स के मुताबिक, यह तरीका तेज, सस्ता और बिना दर्द के शुरुआती बदलावों का पता लगाने में मदद कर सकता है. यह तकनीक ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के लिए संजीवनी का काम कर सकती है. क्योंकि ऐसे इलाकों में जांच की सुविधा बहुत ज्यादा सीमित है.

रिसर्चर्स ने ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा, जो मुंह के कैंसर का सबसे आम प्रकार है और ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस (OSF) को स्टडी किया. ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस अक्सर सुपारी, गुटखा या तंबाकू चबाने वाले लोगों में देखा जाता है और समय के साथ यह कैंसर का रूप ले सकता है.

लार और स्वैब से कैंसर की पहचान कैसे होगी?

रिसर्चर्स के अनुसार, लार में मुंह के अंदर चल रही बायोलॉजिकल एक्टिविटीज से जुड़े कई केमिकल सिग्नल्स मौजूद होते हैं. वहीं, मुंह की अंदरूनी सतह से लिया गया सॉफ्ट स्वैब सीधे टिश्यू से सेल्स और प्रोटीन से जुड़ी जानकारी हासिल करता है. 

Oral Submucous Fibrosis (OSF) क्या है और यह क्यों खतरनाक है?

रिसर्च टीम ने स्वस्थ लोगों, OSF से पीड़ित मरीजों और ओरल कैंसर के मरीजों के सैंपल की तुलना की. इस रिसर्च में लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री नाम की एडवांस लैब तकनीक का इस्तेमाल किया गया. रिसर्चर्स ने सैंपल में शरीर के फैट और ऊर्जा के इस्तेमाल, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, टिश्यू रिपेयर और इम्यून सिस्टम से जुड़े बदलावों की पहचान की.

इस दौरान बीमारी के कुछ लक्षण आसानी से नजर आ रहे थे. लार और स्वैब से मिले दोनों तरह के डेटा को एक साथ देखने पर हेल्दी टिश्यू से प्री-कैंसरस कंडीशन और फिर कैंसर तक होने वाले बदलावों की ज्यादा क्लियर तस्वीर मिली.

बायोप्सी से यह तकनीक कैसे अलग है?

मौजूदा समय में ओरल कैंसर की पुष्टि के लिए बायोप्सी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. इसमें प्रभावित हिस्से से टिश्यू निकालकर जांच की जाती है. यह प्रक्रिया दर्दनाक हो सकती है और बार-बार बायोप्सी करना ठीक नहीं माना जाता. इसके मुकाबले नई तकनीक में किसी टिश्यू को काटकर निकालने की जरूरत नहीं पड़ती.

रिसर्चर्स के मुताबिक, भविष्य में इसे कम लागत वाली और तेजी से रिजल्ट देने वाली स्क्रीनिंग तकनीक के रूप में डेवलप किया जा सकता है. IIT इंदौर के प्रोफेसर हेम चंद्र झा के नेतृत्व में यह तकनीक तैयार की गई है. याद रहे कि यह तकनीक अभी रेग्युलर क्लिनिकल जांच का ऑप्शन नहीं है. 

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