- रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहली बार रूस के पूर्वी कुरिल द्वीप समूह का दौरा किया, जापान ने विरोध जताया
- कुरिल द्वीप समूह पर 1945 में सोवियत संघ ने कब्जा किया था, जो पहले जापान का हिस्सा थे
- जापान इन द्वीपों को नॉर्दर्न टेरिटरीज कहता है और उनका दावा करता है कि ये उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन गुरुवार, 13 अगस्त को पहली बार रूस के एकदम पूर्व में मौजूद कुरिल द्वीप समूह पहुंचे. पुतिन के इस दौरे से जापान नाराज हो गया और उसने रूस के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया. वजह है कि कभी ये द्वीप जापान के हिस्से में हुआ करते थे. लेकिन 81 साल पहले तब के सोवियत रूस को लीड करने वाले स्टालिन ने सबकुछ बदल गया. चलिए आपको बताते हैं कि तब क्या हुआ था, दोनों देशों के लिए ये द्वीप मायने क्यों रखते हैं. शुरुआत करते हैं यह जानने से कि अभी क्या हुआ है?
कुरिल द्वीप समूह पहुंचे पुतिन, नाराज हुआ जापान
रूस के राष्ट्रपति भवन क्रेमलिन ने पुतिन के कुरिल द्वीपों में होने का एक वीडियो जारी किया है. रूसी मीडिया के मुताबिक, पुतिन वहां एक मछली प्रोसेसिंग प्लांट भी गए, जहां उन्हें कैवियार खाने को दिया गया. यह मछलियों के अंड़ों से बनी खास डिश होती है.

कुरिल द्वीप के मछली प्रोसेसिंग प्लांट में कैवियार खाते व्लादिमीर पुतिन (फोटो- AFP)
कुरिल द्वीपों पर जाने से पहले पुतिन पास के रूसी द्वीप सखालिन गए थे. वहां रूस की नौसेना सैन्य अभ्यास कर रही थी. सखालिन में पुतिन ने ‘रूस की पूर्वी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने' को लेकर एक बैठक की.

रूसी द्वीप सखालिन पर नौसेना की तैयारी देखते पुतिन (फोटो- AFP)
पुतिन के इस दौरे पर जापान ने कड़ा ऐतराज जताया है. 2022 में रूस के यूक्रेन पर बड़े हमले के बाद रूस और जापान के रिश्ते और खराब हो चुके हैं. वहीं, इसी दौरान रूस के रिश्ते चीन और नॉर्थ कोरिया के साथ और मजबूत हुए हैं. न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने एक बयान में कहा कि ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज' इतिहास और अंतरराष्ट्रीय कानून, दोनों के हिसाब से जापान का हिस्सा हैं. उन्होंने कहा कि जापान इस दौरे का कड़ा विरोध करता है.
कैसे शुरू हुआ ये विवाद?
रूस और जापान के बीच इन विवादित द्वीपों को लेकर लंबे समय से तनाव चला आ रहा है. जापान इन्हें ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज' यानी उत्तरी क्षेत्र कहता है. इन द्वीपों पर 1945 में सोवियत संघ ने कब्जा कर लिया था. कुरिल द्वीप रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण हैं. ये ज्वालामुखीय द्वीपों की एक लंबी श्रृंखला है, जो रूस के कामचटका प्रायद्वीप से लेकर जापान के उत्तरी मुख्य द्वीप होक्काइडो तक फैली हुई है.
खास बात है कि इन विवादित द्वीपों के नाम दोनों देशों में लगभग एक जैसे हैं. रूस में इन्हें कुनाशिर, हाबोमाई, शिकोटान और इटुरुप कहा जाता है. जापान में इनके नाम कुनाशिरी, हाबोमाई, शिकोटान और एतोरोफू हैं. इन चार विवादित द्वीपों पर करीब 20 हजार रूसी नागरिक रहते हैं. यहां का मौसम काफी कठोर है. लेकिन इन द्वीपों में सोना और चांदी जैसे खनिज पाए जाते हैं और आसपास के समुद्र में मछलियों की भरपूर मात्रा है.
1945 में जापानी लोगों को हटाया गया
1945 में जब इन द्वीपों पर सोवियत संघ का कब्जा हुआ, तब वहां रहने वाले करीब 17 हजार जापानी लोगों को मॉस्को ने वहां से निकाल दिया. इसके बाद इन द्वीपों की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई. शीत युद्ध (कोल्ड वॉर) के दौरान सोवियत संघ ने यहां हवाई और समुद्री सैन्य ठिकाने बनाए. उस समय सोवियत संघ का मुकाबला अमेरिका और उसके सबसे करीबी प्रशांत सहयोगी जापान से था.
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