पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक ऐसा गांव है, जहां सिर्फ ब्राह्मणों के परिवार रहा करते थे. लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया कि यह पंडितों का गांव रातों-रात खाली हो गया और यहां मुसलमान आकर बस गए. कहानी जिला ननकाना साहब की तहसील शाहकोट में बसे एक छोटे से गांव की, जिसे लोग 'पंडितवाला' कहते हैं.
कभी इस गांव की फिजाओं में वेद-मंत्र गूंजा करते थे. 1947 के उस खौफनाक मंजर से पहले, यहां हिंदू ब्राह्मणों और पंडितों का बसेरा हुआ करता था. गांव के सबसे रसूखदार व्यक्ति एक 'खत्री' बाबू थे, जो पूरे गांव की जमीन के मालिक थे. उनका रुतबा ऐसा था कि शाम ढलते ही गांव के दोनों बड़े दरवाजे बंद कर दिए जाते थे, ताकि परिंदा भी पर न मार सके और पूरा गांव बेफिक्र होकर सोए.
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रातों-रात उजड़ गया गांव
फिर आया बंटवारे का वो काला दौर, जिसने रातों-रात सब कुछ उजाड़ दिया. यहां के हिंदू परिवार अपनी जान बचाकर भारत पलायन कर गए, और अमृतसर, गुरदासपुर से जो मुस्लिम परिवार अपना सब कुछ छोड़कर आए थे, उन्होंने इन खाली घरों में पनाह ली.
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आलीशान हवेलियां दे रही गवाही
आज भी इस गांव में 1947 से पहले की एक आलीशान हवेली सीना ताने खड़ी है. वक्त की मार से इसकी छतें कमजोर हो चुकी हैं और कदम संभलकर रखने पड़ते हैं, लेकिन इसकी चौखटें और नक्काशीदार दरवाजे आज भी बीते जमाने की दास्तान सुनाते हैं. हवेली के कमरों में बने छोटे-छोटे आले गवाही देते हैं कि कभी यहां भक्ति के दीये रोशन हुआ करते थे. यहां के लोगों ने इसे बहुत सहेज कर रखा है. आज भी इस हवेली को बांटकर इसमें सात-आठ परिवार रहते हैं, और कुछ लोगों ने तो यहां अपनी दुकानें भी खोल ली हैं.

खुफिया सुरंगें और प्यासा कुआं
गांव के बुजुर्ग याद करते हैं कि यहां कभी खुफिया सुरंगें भी हुआ करती थीं, जो अब नए घरों के नीचे हमेशा के लिए दफ्न हो चुकी हैं. गांव के बाहर एक पुराना कुआं और पानी की टंकी आज भी मौजूद है, जहां से पूरे गांव की प्यास बुझती थी. दुख की बात है कि आज वो कुआं कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुका है.
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दस्तावेजों और पुरानी तख्तियों की मानें तो 1940 के आसपास इस जगह का नाम 'जोधा नगर' हुआ करता था, जो बाद में पंडितों की बहुलता के कारण 'पंडितवाला' के नाम से मशहूर हो गया.

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