टीनएज की लड़कियों में पीरियड्स से जुड़ी अनियमितता आज के समय में आम समस्या बनती जा रही है. एम्स के एक सर्वे में हर पांच में से एक लड़की ने अनियमित पीरियड्स की शिकायत की है. डॉक्टर्स का मानना है कि अनियमित पीरियड्स को सीधे पीसीओएस (Polycystic Ovary Syndrome) नहीं माना जा सकता. टीनएज की लड़कियों में पीरियड्स शुरू होने के शुरुआती वर्षों में कुछ अनियमितता सामान्य हो सकती है. लड़की की उम्र और पहली माहवारी के बाद बीते समय को ध्यान में रखकर स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए.
कब जांच जरूरी?
एम्स के बाल रोग विभाग में पीडियाट्रिक एंडोक्रिनोलॉजी की प्रोफेसर डॉ. रजनी शर्मा ने बताया कि अगर पीरियड्स के बीच 21 दिन से कम या 35 दिन से ज्यादा का अंतर हो या लगातार तीन महीने तक पीरियड्स न आएं, तो जांच की जरूरत हो सकती है. उन्होंने कहा कि पीसीओएस की पहचान के लिए सिर्फ पीरियड्स का अनियमित होना पर्याप्त नहीं है. डॉक्टर एंड्रोजन हार्मोन की अधिकता से जुड़े लक्षणों जैसे चेहरे या शरीर पर ज्यादा बाल, गंभीर मुंहासे और अन्य संभावित कारणों को भी देखते हैं.
अल्ट्रासाउंड से PCOS की पुष्टि नहीं
डॉ. रजनी का कहना है कि किशोरियों में अल्ट्रासाउंड में अंडाशय का 'पॉलीसिस्टिक' दिखाई देना अपने आप में पीसीओएस की पुष्टि नहीं करता. लगातार मासिक धर्म की गड़बड़ी और एंड्रोजन की अधिकता जैसे लक्षणों को ध्यान में रखकर ही निदान किया जाना चाहिए.
4 हजार छात्राओं पर सर्वे
एम्स का सर्वेक्षण 2023 से सरकारी और निजी स्कूलों में किया जा रहा है. इसमें कुल 6-7 स्कूलों के करीब 4,000 स्कूली छात्राओं को शामिल किया गया. विशेषज्ञों के मुताबिक अभी इस सर्वे के आधार पर किशोरियों में पीसीओएस की वास्तविक दर बताना संभव नहीं है.
सिर्फ पीरियड्स तक सीमित नहीं PCOS का असर
डॉक्टरों के अनुसार, पीसीओएस का संबंध आगे चलकर इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, डायबिटीज, फैटी लिवर और शरीर में वसा से जुड़ी समस्याओं से हो सकता है. कुछ किशोरियों में चिंता, अवसाद, खान-पान से जुड़ी समस्या और शरीर की बनावट को लेकर तनाव भी देखा जा सकता है.
लाइफस्टाइल सुधारने की जरुरत
डॉक्टरों ने अनावश्यक दवाओं से बचने और लाइफस्टाइल में सुधार पर जोर दिया है. नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, पर्याप्त फल-सब्जियां और पर्याप्त प्रोटीन लेने की सलाह दी गई है. साथ ही, किशोरियों की लंबाई, वजन और खास तौर पर तेजी से बढ़ते वजन पर नजर रखने की जरूरत बताई गई है, क्योंकि इससे भविष्य में मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है.
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