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कम चीरे, तेज रिकवरी: 5-5-2-2 तकनीक से गॉलब्लैडर सर्जरी में सर गंगा राम अस्पताल की खास पहल

5-5-2-2 Technique: गॉलब्लैडर स्टोन की सर्जरी के लिए दिल्ली के सर गंगा राम हॉस्पिटल में 5-5-2-2 तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सर्जरी की गई. इस तकनीक से की गई सर्जरी में कम दर्द और कम चीरों के साथ मरीज का इलाज किया जाता है.

कम चीरे, तेज रिकवरी: 5-5-2-2 तकनीक से गॉलब्लैडर सर्जरी में सर गंगा राम अस्पताल की खास पहल
गॉलब्लैडर ऑपरेशन को बना रहा आसान 5-5-2-2 तकनीक.

5-5-2-2 Technique: मिनिमली इनवेसिव सर्जरी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति करते हुए, सर गंगा राम अस्पताल का लैप्रोस्कोपिक, लेज़र एवं जनरल सर्जरी विभाग अब गॉलब्लैडर (पित्ताशय) की सर्जरी के लिए 5-5-2-2 तकनीक द्वारा मिनी लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टॉमी कर रहा है, जिससे मरीजों को कम दर्द, तेज रिकवरी और लगभग न दिखाई देने वाले निशानों का लाभ मिल रहा है.

हाल ही में 35 वर्षीय एक महिला ने अस्पताल में यह प्रक्रिया करवाई. वह लंबे समय से गॉलब्लैडर स्टोन के कारण ऊपरी पेट में बार-बार होने वाले दर्द से परेशान थीं. कई युवा मरीजों की तरह उन्हें सर्जरी के साथ-साथ शरीर पर दिखाई देने वाले निशानों और लंबे रिकवरी समय की भी चिंता थी.

जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें 5-5-2-2 पोर्ट तकनीक से मिनी लैप्रोस्कोपिक सर्जरी कराने की सलाह दी. इस तकनीक में दो 5 मिमी पोर्ट और दो बेहद छोटे 2 मिमी पोर्ट का उपयोग किया जाता है, जबकि पारंपरिक लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में सामान्यतः 10-5-5-5 पोर्ट तकनीक इस्तेमाल होती है.

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सर्जरी सफलतापूर्वक की गई और मरीज की रिकवरी बेहद सहज रही. ऑपरेशन के केवल दो घंटे बाद ही मरीज आराम से बैठने और चलने लगीं. उन्हें बहुत कम दर्दनिवारक दवाओं की आवश्यकता पड़ी और जल्द ही अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. कुछ मामलों में मरीजों को उसी दिन डिस्चार्ज भी किया जा सकता है.

छोटे पोर्ट के उपयोग से शरीर के ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है, जिससे ऑपरेशन के बाद दर्द कम होता है, रिकवरी तेजी से होती है और कॉस्मेटिक परिणाम बेहतर मिलते हैं. कुछ ही दिनों में मरीज ने अपनी सामान्य दैनिक गतिविधियां फिर से शुरू कर दीं.

क्या है 5-5-2-2 तकनीक

इस तकनीक के बारे में बताते हुए प्रो. डॉ. तरुण मित्तल, वाइस चेयरमैन एवं यूनिट हेड, लैप्रोस्कोपिक, लेज़र एवं जनरल सर्जरी विभाग, सर गंगा राम अस्पताल ने कहा:

5-5-2-2 तकनीक द्वारा मिनी कोलेसिस्टेक्टॉमी से ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है. मरीजों को कम दर्द होता है, वे तेजी से रिकवर करते हैं और कॉस्मेटिक परिणाम भी बहुत बेहतर होते हैं. हमारा मानना है कि यह तकनीक हर उपयुक्त मरीज को उपलब्ध कराई जानी चाहिए. वर्तमान में हम उन चुनिंदा केंद्रों में शामिल हैं जहां यह तकनीक नियमित रूप से की जा रही है.

यह प्रक्रिया डॉ. तरुण मित्तल, डॉ. आशीष डे, डॉ. अनमोल आहूजा और डॉ. श्रेष्ठ मंगलिक की सर्जिकल टीम द्वारा की गई.

कैसे करता है काम

सर्जरी के दौरान विशेष मिनी-लैप्रोस्कोपिक उपकरणों के साथ एक विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया 5 मिमी एंडोबैग इस्तेमाल किया गया, जिसकी सहायता से गॉलब्लैडर को छोटे पोर्ट के माध्यम से बाहर निकाला गया.

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डॉक्टरों ने यह भी बताया कि हालांकि रोबोटिक सर्जरी आजकल लोकप्रिय हो रही है, लेकिन उसमें सामान्यतः 8–10 मिमी के बड़े पोर्ट का उपयोग किया जाता है, जिससे ऊतकों को अपेक्षाकृत अधिक नुकसान पहुंच सकता है और उपचार की लागत भी बढ़ सकती है. इसके विपरीत, 5-5-2-2 मिनी लैप्रोस्कोपिक तकनीक उपयुक्त मरीजों के लिए कम इनवेसिव और अधिक किफायती विकल्प प्रदान करती है.

हालांकि, सर्जनों ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ जटिल मामलों में मरीज की सुरक्षा और बेहतर परिणामों के लिए पारंपरिक लैप्रोस्कोपिक पोर्ट की आवश्यकता पड़ सकती है.

फॉलो-अप विजिट के दौरान मरीज ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि उनके पेट पर सर्जरी के निशान लगभग दिखाई ही नहीं दे रहे थे. उनके लिए यह अनुभव केवल सर्जरी तक सीमित नहीं था, बल्कि तेजी से सामान्य जीवन में आत्मविश्वास के साथ वापसी का अनुभव भी था.

मिनी कोलेसिस्टेक्टॉमी 5-5-2-2 तकनीक जैसी नई सर्जिकल विधियां यह दर्शाती हैं कि छोटे-छोटे नवाचार भी मरीजों की रिकवरी, आराम और संपूर्ण अनुभव में बड़ा बदलाव ला सकते हैं.

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Deeksha Singh
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