ब्रेस्ट कैंसर की सर्जरी सिर्फ एक बीमारी का इलाज नहीं होती, यह एक महिला के आत्मसम्मान और पहचान से जुड़ा गहरा इम्तिहान बन जाती है. सर्जरी और इलाज के कुछ ही हफ्तों बाद जब मरीज मेरे क्लिनिक में बैठती हैं, तो लगभग हर किसी की आंखों में एक ही अनकहा सवाल तैर रहा होता है- “डॉक्टर, क्या मैं फिर कभी खुद को पहले जैसा महसूस कर पाऊंगी?”
एक प्लास्टिक सर्जन होने के नाते इस जज्बाती सवाल का कोई एक सीधा जवाब मेरे पास नहीं होता. लेकिन मैं उन्हें यह भरोसा जरूर दिला सकता हूं कि आज की मेडिकल साइंस उस दौर से मीलों आगे निकल चुकी है जहां रिकंस्ट्रक्शन महज एक 'औपचारिकता' हुआ करता था.
पिछले दस सालों में तकनीकों ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब शरीर के अपने ही हिस्से से, बिल्कुल कुदरती बनावट तैयार करना मुमकिन हो गया है.
जब अपने ही शरीर का हिस्सा बनता है सहारा: ऑटोलॉगस रिकंस्ट्रक्शन
'ऑटोलॉगस रिकंस्ट्रक्शन' (Autologous Reconstruction) का सीधा मतलब है मरीज के अपने ही शरीर के टिश्यूज का इस्तेमाल करके ब्रेस्ट को दोबारा आकार देना. इसके लिए आमतौर पर पेट के निचले हिस्से, जांघों या पीठ से स्किन और फैट लिया जाता है.
मेरी पसंदीदा और सबसे भरोसेमंद तकनीकों में से एक है DIEP Flap.
इसमें पेट के निचले हिस्से से फैट और स्किन तो ली जाती है, लेकिन पेट की मांसपेशियों (Abdominal Muscles) को बिल्कुल नहीं छुआ जाता.
पुरानी तकनीकों में जब मांसपेशियां हटानी पड़ती थीं, तो मरीजों को असहनीय दर्द होता था और उठने-बैठने की कोर-स्ट्रेंथ कमजोर पड़ जाती थी. DIEP फ्लैप में दर्द काफी कम होता है और मरीज बहुत तेजी से सामान्य जिंदगी में लौट आते हैं.
सबसे बड़ा सुकून? क्योंकि यह शरीर का अपना ही जीवित टिश्यू है, यह बिल्कुल 'नेचुरल' व्यवहार करता है. छूने पर यह असली ब्रेस्ट जैसा महसूस होता है और उम्र या वजन के बदलावों के साथ स्वाभाविक रूप से ढलता भी है.
अगर 40 की उम्र में किसी महिला की सर्जरी हुई है, तो यह विकल्प सिलिकॉन इम्प्लांट्स की तरह बार-बार बदलने की झंझट पैदा नहीं करता, बल्कि ताउम्र साथ निभाता है.
फैट ग्राफ्टिंग: वो फिनिशिंग टच जो निशान मिटा दे
कई बार सर्जरी के बाद आकार तो बन जाता है, लेकिन स्किन में गड्ढे या खिंचाव रह जाते हैं. यहीं काम आती है फैट ग्राफ्टिंग (Fat Grafting).
बेहद कोमल लिपोसक्शन तकनीक के जरिए शरीर के किसी हिस्से से थोड़ा सा फैट निकाला जाता है, उसे लैब में प्रोसेस करते हैं और फिर पतली सुई से बहुत बारीक मात्रा में प्रभावित जगह पर इंजेक्ट कर दिया जाता है.
यह तकनीक ब्रेस्ट के खालीपन को भरती है और असमान उभारों को एकदम स्मूद बना देती है.
सबसे जादुई असर इसका उन महिलाओं पर दिखता है जिनका रेडिएशन हुआ हो. रेडिएशन के बाद सीने की चमड़ी अक्सर कागज जैसी पतली, खिंची हुई और सख्त हो जाती है. फैट ग्राफ्टिंग के चंद सेशंस के बाद वहां की स्किन में गजब की नरमी और जान लौटते देखी गई है.
अक्सर मरीजों के मन में डर होता है:
अब तक की तमाम आधुनिक रिसर्च इस डर को खारिज करती हैं. फिर भी, हम हर मरीज का चुनाव बेहद बारीकी से करते हैं और पूरी निगरानी रखते हैं
हर शरीर अलग, इसलिए हर फैसला अलग
मेडिकल साइंस में कोई 'एक फॉर्मूला सबके लिए' नहीं चलता.
अगर कोई महिला बहुत ज्यादा दुबली है, तो उसके शरीर में इतना फैट ही नहीं होता कि फ्लैप बनाया जा सके.
कुछ मरीज ऐसी होती हैं जिनकी सेहत लंबी सर्जरी की इजाजत नहीं देती.
ऐसे मामलों में हम इम्प्लांट्स की राह चुनते हैं. और जहां मुमकिन हो, सिलिकॉन इम्प्लांट के साथ हल्की फैट ग्राफ्टिंग जोड़ दी जाती है ताकि ऊपर से वह बिल्कुल बनावटी न लगे. जहां कैंसर की स्थिति अनुकूल होती है, वहां 'निप्पल-स्पैरिंग मास्टेक्टॉमी' के जरिए ब्रेस्ट के असली रूप को काफी हद तक बचाया जा सकता है.
सर्जरी से पहले की प्लानिंग ही तय करती है नतीजा
सबसे बेहतरीन नतीजे तभी सामने आते हैं जब ब्रेस्ट सर्जन, कैंसर स्पेशलिस्ट (ऑन्कोलॉजिस्ट), रेडिएशन टीम और प्लास्टिक सर्जन पहले दिन से एक साथ बैठकर योजना बनाएं.
वजह साफ है रेडिएशन थेरेपी का असर सीधे तौर पर इस बात पर पड़ता है कि रिकंस्ट्रक्शन कब होना चाहिए और किस तकनीक से होना चाहिए. इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि मास्टेक्टॉमी (ब्रेस्ट हटाने की सर्जरी) की टेबल पर जाने से पहले ही रिकंस्ट्रक्शन का खाका खींच लेना सबसे समझदारी भरा कदम है.
यह कोई खूबसूरती की सनक नहीं, जिंदगी की वापसी है
समाज अक्सर इसे केवल 'दिखने' या खूबसूरती से जोड़कर देखता है, जबकि हकीकत यह है कि ब्रेस्ट रिकंस्ट्रक्शन कोई वैनिटी (शौक) नहीं है. यह बीमारी की ट्रॉमा से उबरने और जिंदगी को दोबारा मजबूती से थामने का जरिया है.
अगर कोई महिला फैसला करती है कि उसे कोई रिकंस्ट्रक्शन नहीं कराना, तो उसका वह फैसला भी उतना ही सम्मानजनक है. लेकिन फैसला जो भी हो, वह डर या जानकारी के अभाव में नहीं, बल्कि हर पहलू को अच्छी तरह समझकर लिया जाना चाहिए.
तो सवाल वही: क्या आपके अपने शरीर का फैट आपको पुराना आत्मविश्वास लौटाने के काम आ सकता है?
जवाब है, बिल्कुल, और पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित तरीके से.
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एक्सपर्ट के बारे में
डॉ. अनमोल चुघ सीके बिरला हॉस्पिटल, गुरुग्राम में एसोसिएट डायरेक्टर एवं हेड, एस्थेटिक्स एंड प्लास्टिक सर्जरी हैं. उन्हें प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और कॉस्मेटिक सर्जरी के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है. डॉ. चुघ सीना स्ट्रॉन्ग के संस्थापक भी हैं, जो ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित महिलाओं के पुनर्वास, जागरूकता और आत्मविश्वास को बढ़ावा देने की दिशा में कार्यरत एक पहल है. वे ब्रेस्ट रिकंस्ट्रक्शन और मरीजों की समग्र रिकवरी से जुड़े विषयों पर विशेष रुचि रखते हैं.
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