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कैंसर ट्रीटमेंट के बाद प्रभावित हो सकती है फर्टिलटी! AIIMS ने बताई मां बनने की नई राह, पढ़ें पूरी खबर

कैंसर ट्रीटमेंट के बाद कुछ महिलाओं की फर्टिलिटी क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में AIIMS ने एक नई टेक्नीक शेयर कर ऐसी महिलाओं में मां बनने की उम्मीद जगाई है. यहां जानते हैं इस टेक्नीक के बारे में-

कैंसर ट्रीटमेंट के बाद प्रभावित हो सकती है फर्टिलटी! AIIMS ने बताई मां बनने की नई राह, पढ़ें पूरी खबर
Cancer Patients Motherhood : कैंसर ट्रीटमेंट के बाद भी मां बनने की बढ़ी उम्मीद

समय पर कैंसर का इलाज लाखों लोगों की जान बचाता है, लेकिन इसे कुछ नुकसान भी होते हैं, जिसमें फर्टिलिटी प्रभावित होना शामिल है. मुख्य रूप से कम उम्र की लड़कियों और महिलाओं में कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के दौरान ओवरी पर पड़ सकता है, जिससे फ्यूचर में मां बनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. महिलाओं की इसी चुनौती से निपटने के लिए दिल्ली एम्स ने एक जरूरी जानकारी शेयर की है, जिसमें ओवेरियन टिश्यू फ्रीजिंग (Ovarian Tissue Freezing) को फर्टिलिटी बचाने का एक प्रभावी ऑप्शन बताया गया है.

X पर AIIMS ने शेयर की जानकारी

AIIMS की ओर से X पर ये जानकारी शेयर की गई है. इस पोस्ट में बताया गया है कि कैंसर का इलाज शुरू होने से पहले ओवेरियन टिश्यू का एक छोटा हिस्सा निकालकर सुरक्षित तरीके से फ्रीज किया जा सकता है. ऐसा करने से भविष्य में जरूरत पड़ने पर इस टिश्यू का इस्तेमाल करके प्रजनन क्षमता को बेहतर करने की कोशिश की जा सकती है. 

AIIMS का कहना है कि ये प्रोसेस उन लड़कियों के लिए भी की जा सकती है, जो अभी प्यूबर्टी तक नहीं पहुंची हैं. अच्छी बात ये है कि AIIMS में भी पात्र मरीजों को ये सुविधा फ्री में उपलब्ध कराई जाती है.

कैसे प्रभावित होती है फर्टिलिटी?

कई हेलथ एक्सपर्ट का कहना है कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी कैंसर सेल्स को नष्ट करने का काम करती हैं. हालांकि, कुछ मामलों में इनका असर अंडाशय की हेल्दी कोशिकाओं पर भी पड़ सकता है. इससे अंडों  की संख्या कम हो सकती है और भविष्य में गर्भधारण करने में कठिनाई आ सकती है. यही कारण है कि अब दुनिया भर में कैंसर मरीजों के लिए फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.

क्या है ओवेरियन टिश्यू फ्रीजिंग?

ओवेरियन टिश्यू फ्रीजिंग एक ऐसा प्रोसेस है, जिसमें सर्जरी के जरिए अंडाशय के टिश्यू का छोटा हिस्सा निकालकर बेहद कम तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है. कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद इस टिशू को दोबारा शरीर में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है, जिससे ओवरी की कार्यक्षमता और प्रजनन क्षमता को बेहतर करने की कोशिश की जाती है.

इस टेक्नीक की खास बात ये है कि इसे उन बच्चियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनमें अभी एग्स परिपक्व नहीं हुए हैं. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे बचपन से ही कैंसर से जूझ रही लड़कियों के लिए उम्मीद की किरण मानते हैं. 

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