अगर आप खुद सिगरेट नहीं पीते हैं और इसलिए खुद को सुरक्षित समझते हैं, तो यह खबर आपको चौंका सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, दूसरों की सिगरेट का धुआं यानी पैसिव स्मोकिंग (Passive Smoking) भी उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना खुद धूम्रपान करना. भारत में हर साल करीब 3.25 लाख लोगों की मौत सिर्फ सेकंड हैंड स्मोक (Second Hand Smoke) के संपर्क में आने के कारण हो रही है.
तो अगर आप यह सोचकर बेफिक्र रहते हैं कि आप कभी धूम्रपान नहीं करते, तो थोड़ा संभल जाइए. किसी दूसरे की सुलगाई सिगरेट का धुआं आपकी सांसों में घुलकर उतना ही जानलेवा साबित हो रहा है, जितना कि खुद स्मोकिंग करना. भारत में हर साल करीब 3.25 लाख लोग सिर्फ इसलिए जान गंवा रहे हैं क्योंकि वे 'पैसिव स्मोकिंग' (दूसरों के धुएं) का शिकार हो रहे हैं.
'टोबैको फ्री इंडिया' द्वारा आयोजित एक वेबिनार में देश के शीर्ष डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस खौफनाक आंकड़े पर गहरी चिंता जताई है. विशेषज्ञों का कहना है कि अब वक्त आ गया है जब देश को पूरी तरह '100% स्मोक-फ्री' पब्लिक स्पेस की तरफ कदम बढ़ाना होगा.
आंकड़ा घटा, लेकिन आबादी के चलते खतरा जस का तस
नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. वी.के. पॉल ने 'द लैंसेट पब्लिक हेल्थ' की हालिया ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि स्थिति कितनी गंभीर है:
प्रतिशत में कमी: साल 1990 में देश की करीब 43% आबादी पैसिव स्मोकिंग की चपेट में थी, जो अब घटकर 31% रह गई है.
मौतों की संख्या में इजाफा: आबादी बढ़ने की वजह से यह गिरावट बेअसर साबित हो रही है. देश में आज भी करीब 44.4 करोड़ लोग दूसरों के धुएं का शिकार हो रहे हैं.
जेंडर का फर्क: सालाना होने वाली 3.25 लाख मौतों में करीब 1.5 लाख महिलाएं और लगभग 1.75 लाख पुरुष शामिल हैं.
वैश्विक स्तर: पूरी दुनिया में हर साल सेकंड हैंड स्मोक से करीब 17 लाख लोगों की मौत होती है.
डॉ. पॉल के मुताबिक, सिर्फ स्मोकिंग जोन अलग बना देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सार्वजनिक जगहों से धुएं को पूरी तरह खत्म करना होगा. साथ ही चबाने वाले तंबाकू पर भी रोक जरूरी है.
An estimated 3.25 lakh deaths every year in India are attributed to second-hand smoke/passive smoking, according to health experts. Non-smokers are affected too, and often have little control over their surroundings. • Dr. VK Paul, former Member of NITI Aayog, disclosed that India has progressed in reducing exposure to second-hand smoke, but the problem remains substantial due to population growth. He stressed that India needs to move toward 100% smoke-free public places and eliminate tobacco use. • Dr. VM Katoch, former ICMR Director General and President of the Tuberculosis Association of India, stated that passive smoking affected people in public places, workplaces and homes. • Dr. KK Talwar, cardiologist and Padma Bhushan awardee, shared national efforts to discourage tobacco use, such as taxation. He warned that passive smoking can be as harmful as active smoking. • Dr. Uma Kumar, Head of Rheumatology, AIIMS, New Delhi and recipient of the National Award for Science Communication, highlighted that second-hand smoke is particularly a cause of public health concern for women and children who cannot always choose where they live, work or spend time. #AIIMSNewDelhi #SecondHandSmoke #SmokeFree #TobaccoFreeIndia #PublicHealth
— AIIMS, New Delhi 🇮🇳 (@aiims_newdelhi) October 5, 2026
सबसे ज्यादा पिस रहीं महिलाएं और बच्चे: AIIMS
एम्स (AIIMS) नई दिल्ली में रूमेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. उमा कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि पैसिव स्मोकिंग का सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं और बच्चों को झेलना पड़ रहा है.
अक्सर घर हो, काम की जगह या सफर.उनके पास यह चुनने का हक नहीं होता कि उनके आसपास कौन सिगरेट पी रहा है और कौन नहीं. बिना किसी गलती के वे इस जहरीले धुएं को फेफड़ों में भरने के लिए मजबूर हैं, जिससे उनकी सेहत पर सीधा और स्थायी असर पड़ रहा है.
पद्मभूषण से सम्मानित वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. के.के. तलवार का कहना है कि सिगरेट पर टैक्स बढ़ाना और विज्ञापनों से चेतावनी देना जरूरी कदम हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक सार्वजनिक जगहों को पूरी तरह धुआं-मुक्त न किया जाए.
डॉ. तलवार ने दो टूक कहा:
सिर्फ फेफड़े ही नहीं, बाकी अंग भी हो रहे खराब
आईसीएमआर (ICMR) के पूर्व महानिदेशक डॉ. वी.एम. कटोच ने चेतावनी दी कि पैसिव स्मोकिंग का असर सिर्फ सांस की नली या फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता. यह जहर धीरे-धीरे शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों को भी खोखला कर देता है.
डॉ. कटोच ने कहा कि लोग दफ्तरों, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और यहां तक कि अपने घरों में भी इसके शिकार बन रहे हैं. जब तक घरों और सार्वजनिक स्थलों पर शून्य-धूम्रपान (Zero Smoking) की आदत नहीं बनेगी, तब तक निर्दोष लोगों को इस जानलेवा खतरे से बचाना नामुमकिन रहेगा.
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