आज के समय में जब भी हम कैंसर का नाम सुनते हैं, तो रूह कांप जाती है. महिलाओं में अगर सबसे तेजी से फैलने वाले किसी कैंसर की बात करें, तो वह ब्रेस्ट कैंसर यानी स्तन कैंसर है. हमारे देश में सबसे बड़ी दिक्कत यह नहीं है कि इसका इलाज नहीं है, बल्कि सबसे बड़ा संकट यह है कि इसका पता बहुत देर से चलता है. जब तक महिला को अहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है, तब तक बीमारी अक्सर दूसरे या तीसरे स्टेज में पहुंच चुकी होती है.
वजह बहुत साफ है. हमारे देश के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में बड़े-बड़े अस्पताल तो दूर, एक्स-रे और मैमोग्राफी की रिपोर्ट को बारीकी से समझने वाले माहिर डॉक्टर ही नहीं मिलते. लेकिन अब इस मुश्किल का एक बहुत बड़ा समाधान सामने आया है. देश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान एम्स दिल्ली (AIIMS New Delhi) ने एक ऐसा कमाल कर दिखाया है, जो आने वाले दिनों में लाखों महिलाओं की जान बचाने में मददगार साबित होगा.
एम्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित एक ऐसी तकनीक तैयार की है, जो मैमोग्राफी की तस्वीरों को देखकर चुटकियों में बता देगी कि कहीं कैंसर का खतरा तो नहीं है. और सबसे अच्छी बात यह है कि यह तकनीक अब सिर्फ एम्स के कमरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे बाजार में लाने के लिए बीपीएल टेक्नोलॉजीज लिमिटेड को सौंप दिया गया है.
आइए समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और एक आम परिवार के लिए यह कितनी बड़ी राहत की बात है-
एम्स और बीपीएल के बीच हुआ बड़ा समझौता
16 सितंबर को एम्स दिल्ली में एक बड़ा कार्यक्रम हुआ, जिसमें एम्स के डायरेक्टर प्रोफेसर निखिल टंडन और बीपीएल टेक्नोलॉजीज के सीएफओ अजय जिंदल मौजूद थे. दोनों के बीच इस बात का करार हुआ कि एम्स की बनाई इस एआई तकनीक को अब बीपीएल कंपनी आगे बढ़ाएगी.
एम्स के रेडियोलॉजी विभाग और कंप्यूटर इंजीनियरों ने मिलकर यह एआई मॉडल तैयार किया है. इस प्रोजेक्ट को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने पैसे देकर मदद की थी.
अब बीपीएल कंपनी इस तकनीक की मदद से ऐसी मशीनें और सॉफ्टवेयर बनाएगी, जिनका इस्तेमाल देश के किसी भी छोटे अस्पताल या क्लीनिक में हो सकेगा.
एम्स का कहना है कि यह लैब की रिसर्च को सीधे आम मरीज के बेड तक पहुंचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है.
छोटे शहरों में डॉक्टरों की कमी को दूर करेगा यह नया सिस्टम
आज हमारे देश में मैमोग्राफी मशीनें तो कई जगह लग जाती हैं, लेकिन सबसे बड़ा सिरदर्द यह होता है कि उस मैमोग्राफी रिपोर्ट को पढ़ेगा कौन. ब्रेस्ट इमेजिंग के एक्सपर्ट रेडियोलॉजिस्ट देश में बहुत कम हैं और जो हैं, वो ज्यादातर दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे महानगरों के महंगे अस्पतालों में बैठते हैं.
छोटे शहर की किसी महिला की अगर मैमोग्राफी होती भी है, तो उसकी रिपोर्ट आने में कई-कई दिन लग जाते हैं. कई बार सामान्य डॉक्टर से रिपोर्ट की कोई बारीक गांठ छूट जाती है, जो बाद में बड़ा कैंसर बन जाती है. यह एआई मॉडल बिल्कुल एक सीनियर डॉक्टर की तरह मैमोग्राफी की हर इमेज का कोना-कोना खंगाल लेता है.
यह तुरंत लाल निशान लगाकर डॉक्टर को सचेत कर देगा कि किस हिस्से में गड़बड़ी दिख रही है, जिससे जांच में कोई चूक नहीं होगी.
जल्दी पहचान यानी जिंदगी की पूरी गारंटी
कैंसर के डॉक्टर हमेशा एक बात कहते हैं कि अगर ब्रेस्ट कैंसर का पता पहली स्टेज में चल जाए, तो मरीज के पूरी तरह ठीक होने की संभावना 90 प्रतिशत से भी ज्यादा होती है.
शुरुआती दौर में न तो भारी-भरकम कीमोथैरेपी की जरूरत पड़ती है और न ही बहुत ज्यादा पैसा खर्च होता है. यह नई एआई तकनीक रिपोर्ट पढ़ने की रफ्तार को कई गुना तेज कर देगी, यानी जिस काम में घंटों लगते थे वो चंद मिनटों में हो जाएगा.
रिपोर्ट एकदम सटीक होगी, जिससे मरीज को बार-बार इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं पड़ेगी. समय पर इलाज शुरू होने से मरीज की जिंदगी बिना किसी डर के बचाई जा सकेगी.
एम्स की इस टीम ने दिन-रात एक करके बनाया यह मॉडल
इस शानदार तकनीक को तैयार करने के पीछे एम्स के कई होनहार डॉक्टरों और नौजवान इंजीनियरों की कड़ी मेहनत है. एम्स के रेडियोलॉजी विभाग की डॉक्टर कृतिका रंगराजन और प्रोफेसर स्मृति हरि ने इस पूरे काम की अगुवाई की.
- मशीन लर्निंग की टीम में शामिल ओम शिवोम, कुशाग्र चतुर्वेदी और आशीष रस्तोगी ने इस एआई दिमाग को ट्रेन किया.
- इसके साथ ही रेडियोलॉजिस्ट डॉ अमित गुप्ता और डॉ वरुण होल्ला ने हजारों मैमोग्राफी स्कैन देखकर कंप्यूटर को सिखाया कि एक साधारण गांठ और कैंसर की गांठ में क्या बारीक फर्क होता है.
- हेमा मल्होत्रा और उनकी पूरी टीम ने इस पूरे प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने का जिम्मा संभाला.
- इन सबकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज भारत खुद अपने बलबूते पर ऐसी हाईटेक मेडिकल तकनीक बना रहा है.
एक आम इंसान को इससे क्या फायदा मिलेगा
अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि इस बड़ी टेक्नोलॉजी से एक आम आदमी का क्या लेना-देना. इसका सीधा असर आपकी जेब और आपकी सेहत पर पड़ने वाला है:
जांच होगी सस्ती: जब यह तकनीक भारतीय कंपनी बीपीएल के जरिए अस्पतालों में पहुंचेगी, तो विदेशों से आने वाले महंगे सॉफ्टवेयर पर निर्भरता खत्म होगी और जांच का खर्च कम होगा.
रिपोर्ट मिलेगी तुरंत: जांच कराने के बाद हफ्ते भर का दिल दहलाने वाला इंतजार नहीं करना पड़ेगा, रिपोर्ट उसी दिन मिल जाएगी.
गांव-देहात में भी सुविधा: अब किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार की महिला को सिर्फ मैमोग्राफी की सही रिपोर्ट के लिए बड़े शहर के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे.
सही समय पर सलाह: स्थानीय डॉक्टर भी इस एआई रिपोर्ट के सहारे मरीज को तुरंत सही बड़े अस्पताल में रेफर कर सकेंगे.
महिलाओं को इन लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
तकनीक अपनी जगह काम करेगी, लेकिन हर महिला और उसके परिवार को खुद भी सजग रहना पड़ेगा. अगर शरीर में ये बदलाव दिखें, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं:
- स्तन में किसी भी तरह की गांठ, भले ही उसमें कोई दर्द न हो रहा हो.
- त्वचा के रंग में बदलाव, खिंचाव या संतरे के छिलके जैसा गड्ढा दिखना.
- निप्पल से किसी तरह का असामान्य पानी या खून जैसा स्राव निकलना.
- बगल (अंडरआर्म) में किसी नई गिल्टी या सूजन का महसूस होना.
40 साल की उम्र के बाद हर महिला को साल में एक बार मैमोग्राफी या डॉक्टर से जांच जरूर करानी चाहिए.
एम्स और बीपीएल का यह हाथ मिलाना इस बात का बहुत बड़ा सबूत है कि अगर सरकारी रिसर्च और देसी उद्योग मिलकर काम करें, तो आम इंसान की जिंदगी कितनी आसान हो सकती है. उम्मीद की जानी चाहिए कि बहुत जल्द यह तकनीक हमारे आसपास के क्लीनिकों में भी देखने को मिलेगी और कैंसर के खिलाफ जंग में एक मजबूत हथियार साबित होगी.
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