Brain Cancer Misdiagnosis : कैंसर का नाम सुनते ही मन में एक डर सा बैठ जाता है. लोग कैंसर के मरीजों के लिए दुआएं करते हैं, ताकि वो जल्द से जल्द ठीक हो जाए. इसके लिए कई तरह की लंबे ट्रीटमेंट का सहारा भी लिया जाता है. लेकिन जरा सोचिए अगर आपको सालों तक कैंसर का मरीज समझकर इलाज दिया जाए और बाद में पता चले कि आपको कभी भी कैंसर था ही नहीं. शायद एक पल के लिए ये एक खुशी हो सकती है, लेकिन जब आप सोचने बैठेंगे, तो ये डॉक्टर की बड़ी गलती और अचानक से लगा झटका हो सकता है. क्योंकि 11 सालों तक ट्रीटमेंट का दर्द और मन में एक डर मरीज ने झेला है. ठीक ऐसी ही घटना ब्रिटेन के एक महिला के साथ हुई, वो 11 साल तक ब्रेन कैंसर का इलाज कराती रहीं और लगातार कीमोथेरेपी लेती रहीं, लेकिन बाद में जब डॉक्टर ने रिव्यू किया, तो पता चला महिला को कभी कैंसर था ही नहीं.
2012 में माइग्रेन के दर्द से शुरू हुई कहानी
खबरों में बताया जा रहा है कि बेकी जोन्स नाम की महिला को 2012 में माइग्रेन की समस्या हुई थी. इस दौरान जब महिला ने टेस्ट कराया, तो उसके ब्रेन स्कैन के स्कैन में एक घाव दिखाई दिया, जिसे उस समय के डॉक्टर्स ने ट्यूमर मान लिया. इसी ट्यूमर के आधार पर महिला को ब्रेन कैंसर का मरीज मान लिया गया और कीमोथेरेपी शुरू कर दी गई.
बताया जा रहा है कि डॉक्टर ने महिल को कई बार कहा कि अगर वो बीच में इलाज बंद कराती है, तो उसकी जान को भी खतरा हो सकता है. इसी डर की वजह से महिला ने सालों तक ट्रीटमेंट जारी रखा.
11 साल बाद सामने आई सच्चाई
साल 2025 में स्वतंत्र न्यूरोसर्जनों और रेडियोलॉजिस्टों ने उनके मेडिकल रिकॉर्ड और स्कैन की दोबारा रिव्यू की. टेस्ट में पाया गया कि जो घाव ट्यूमर समझा गया था, वो वास्तव में ट्यूमेफैक्टिव डिमाइलिनेशन नामक एक सूजन संबंधी स्थिति हो सकती थी, जो कई बार ब्रेन ट्यूमर जैसी दिखाई देती है.
डॉक्टर का कहना है कि ये कभी कैंसर था ही नहीं. इस खुलासे के बाद महिला और उनके परिवार को गहरा झटका लगा, क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा एक ऐसी बीमारी के इलाज में बिताया जो थी ही नहीं.
हर इलाज में क्यों जरूरी होता है सेकंड ओपिनियन?
इस तरह के मामलों से लोगों को सबक लेनी चाहिए कि जब भी किसी बीमारी का इलाज कराएं, तो सेकंड ओपिनियन जरूर लें. दूसरी मेडिकल राय लेना कई बार फायदेमंद साबित हो सकता है. खासकर तब जब बीमारी रेयर हो, रिपोर्ट स्पष्ट न हो या इलाज लंबे समय तक चलने वाला हो. डॉक्टर मानते हैं कि दूसरा डॉक्टर अक्सर रिपोर्ट को अलग नजरिए से देख सकता है, जिससे गलत निदान की संभावना कम हो सकती है.
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