Breast Cancer Treatment: ब्रेस्ट कैंसर आज दुनिया भर में महिलाओं में पाया जाने वाला सबसे आम कैंसर बन चुका है. हर साल करीब 20 लाख से ज्यादा लोग इस बीमारी से ग्रसित पाए जाते हैं. बीते कुछ दशकों में इलाज के कई आधुनिक विकल्प सामने आए हैं, लेकिन अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, किस मरीज पर कौन-सा इलाज सबसे बेहतर असर करेगा, यह पहले से कैसे पता चले? अक्सर मरीजों को अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं, जिनमें से कुछ काम करती हैं और कुछ नहीं. इससे न सिर्फ कीमती समय नष्ट होता है, बल्कि मरीज के शरीर पर अनावश्यक साइड इफेक्ट का बोझ भी पड़ता है.
अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक उम्मीद भरा समाधान खोज लिया है. लंदन स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर रिसर्च (ICR) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सरल डीएनए ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो इलाज शुरू होने से पहले ही यह बता सकता है कि ब्रेस्ट कैंसर का कौन-सा इलाज मरीज के लिए सबसे प्रभावी रहेगा.
क्या है यह नया ब्लड टेस्ट?
इस टेस्ट को लिक्विड बायोप्सी कहा जाता है. इसमें शरीर से किसी ट्यूमर का टुकड़ा निकालने की जरूरत नहीं होती. दरअसल, कैंसर कोशिकाएं अपने डीएनए के बहुत छोटे-छोटे टुकड़े खून में छोड़ती हैं, जिन्हें सर्कुलेटिंग ट्यूमर DNA (ctDNA) कहा जाता है. यही ctDNA इस टेस्ट का आधार है.
वैज्ञानिकों ने पाया कि खून में मौजूद ctDNA की मात्रा देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैंसर इलाज पर कितना अच्छा रिस्पॉन्स देगा.
स्टडी कैसे की गई?
इस रिसर्च में 167 एडवांस ब्रेस्ट कैंसर मरीजों के ब्लड सैंपल का अध्ययन किया गया. पहला टेस्ट इलाज शुरू होने से पहले किया गया. दूसरा टेस्ट सिर्फ चार हफ्ते बाद, यानी एक ट्रीटमेंट साइकल के बाद.
रिसर्च में सामने आया कि जिन मरीजों में इलाज शुरू होने से पहले ctDNA का लेवल कम था, उनमें इलाज का असर बेहतर रहा.

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दो अलग-अलग तरह के मरीज, अलग नतीजे
पहला ग्रुप:
इस ग्रुप में वे मरीज थे जिनके कैंसर में ESR1, HER2, AKT1 या PTEN जैसे म्यूटेशन पाए गए थे. इन्हें उन्हीं म्यूटेशन के अनुसार टारगेटेड इलाज दिया गया.
चार हफ्ते बाद जिन मरीजों के खून में ctDNA नहीं मिला उनका कैंसर औसतन 10.6 महीने तक कंट्रोल में रहा. जबकि जिनमें ctDNA बना रहा, उनमें यह समय सिर्फ 3.5 महीने था.
दूसरा ग्रुप (ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर):
यह ब्रेस्ट कैंसर का सबसे आक्रामक रूप है, जो 10–15% मरीजों में पाया जाता है. इसमें कोई टारगेटेड म्यूटेशन नहीं होता.
इस ग्रुप में इलाज से पहले कम ctDNA वालों में बीमारी 10.2 महीने तक कंट्रोल में रही. ज्यादा ctDNA वालों में सिर्फ 4.4 महीने. इतना ही नहीं, कम ctDNA वालों में 40% मरीजों ने इलाज का अच्छा जवाब दिया, जबकि ज्यादा ctDNA वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 9.7% था.
डॉक्टर क्या कहते हैं?
इस स्टडी की प्रमुख लेखिका डॉ. इसेल्ट ब्राउन के अनुसार, "अगर हमें इलाज की शुरुआत में या सिर्फ 4 हफ्ते में यह पता चल जाए कि दवा काम करेगी या नहीं, तो हम बेकार इलाज से मरीज को बचा सकते हैं और तुरंत बेहतर विकल्प चुन सकते हैं."
इस रिसर्च को ब्रेस्ट कैंसर नाउ, Cancer Research UK और अन्य संस्थानों का सपोर्ट मिला.
भविष्य में क्या बदलेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह ब्लड टेस्ट इलाज को ज्यादा पर्सनलाइज्ड बनाएगा. गलत दवाओं से बचाएगा. सही समय पर सही इलाज देकर मरीज की जिंदगी और क्वालिटी दोनों बढ़ाएगा. भविष्य में यह टेस्ट शुरुआती स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर में भी कारगर साबित हो सकता है.
यह नई स्टडी ब्रेस्ट कैंसर इलाज की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है. सिर्फ एक साधारण ब्लड टेस्ट के जरिये यह तय करना कि कौन-सी दवा काम करेगी, यह सोच ही इलाज को पूरी तरह बदल सकती है. आने वाले समय में यह तकनीक ब्रेस्ट कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकती है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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