मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, साकेत ने एक बड़ी चिकित्सा उपलब्धि हासिल करते हुए चार मरीजों और उनके डोनरों के बीच सफल फोर-वे किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट किया है. इस प्रक्रिया में जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, बिहार और नागालैंड के मरीज और डोनर शामिल थे. इस ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में कुल आठ लोग शामिल थे, इनमें चार मरीज थे. जिन्हें किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत थी, और चार डोनर थे, जो अपने परिवार के सदस्य को किडनी देना चाहते थे, लेकिन ब्लड ग्रुप या अन्य मेडिकल कारणों की वजह से वे सीधे अपने मरीज को किडनी नहीं दे सकते थे. ऐसे में पेयर-एक्सचेंज प्रोग्राम के जरिए हर डोनर को दूसरे मरीज से मिलाया गया. इस तरह सभी चार मरीजों को उनके लिए उपयुक्त किडनी मिल सकी.
कौन-कौन शामिल हुआ?
इस ट्रांसप्लांट में अलग-अलग राज्यों और समुदायों से जुड़े परिवार शामिल थे. चार मरीजों में से एक मुस्लिम, एक ईसाई और दो हिंदू थे. यह दिखाता है कि किसी की जान बचाने का साझा उद्देश्य धर्म, क्षेत्र और समुदाय की अलग-अलग पहचान से ऊपर उठकर लोगों को एक साथ ला सकता है.
अनुमति लेना रहा सबसे बड़ी चुनौती
उत्तर भारत में पहली बार 4 परिवारों के बीच किडनी बदली गई थी. इसलिए इसकी इजाजत लेना बहुत मुश्किल था. इसके लिए बहुत सारे कागज जमा करने पड़े. बार-बार मीटिंग और जांच हुई. आखिर में इजाजत लेने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट भी जाना पड़ा. डॉक्टरों की तैयारी के साथ-साथ कानूनी और सरकारी काम भी कई महीने चला.
डॉक्टरों की स्पेशल टीम ने इस ऑपरेशन को संभाला
इस ट्रांसप्लांट को मैक्स हॉस्पिटल, साकेत के दो बड़े डॉक्टरों ने किया,
- प्रो. डॉ. दिनेश खुल्लर - नेफ्रोलॉजी विभाग के ग्रुप चेयरमैन
- प्रो. डॉ. अनंत कुमार - यूरोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट विभाग के चेयरमैन
इस काम में बीएलके-मैक्स हॉस्पिटल के डॉ. शफीक अहमद और उनकी टीम ने भी बहुत मदद की. डॉ. शफीक अहमद यूरोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट के सीनियर डायरेक्टर हैं.
एक ही दिन में हुईं आठ सर्जरी
13 जुलाई 2026 को यह किडनी अदला-बदली का ऑपरेशन हुआ. एक ही दिन में कुल 8 सर्जरी की गईं. इसमें 4 डोनर से किडनी निकाली गई और 4 मरीजों में नई किडनी लगाई गई. सर्जरी सुबह करीब 7 बजे शुरू हुई और शाम 6 बजे तक चली। इसके लिए एक साथ 5 ऑपरेशन थिएटर में काम किया गया. मरीज और डोनर की सही जोड़ी बनाने के लिए APKD नाम के खास कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद ली गई साथ ही यह जांच भी की गई कि ट्रांसप्लांट बिल्कुल सुरक्षित रहे.
क्या बोले डॉ. दिनेश खुल्लर?
प्रो. (डॉ.) दिनेश खुल्लर ने कहा, "पेयर किडनी एक्सचेंज उन मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकता है, जिनके पास डोनर तो है, लेकिन ब्लड ग्रुप या अन्य मेडिकल कारणों से सीधे ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता. सही डोनर और मरीज की जोड़ी चुनने के लिए HLA मैचिंग, क्रॉस-मैचिंग और इम्यूनोलॉजिकल जांच बहुत जरूरी होती है, इससे ट्रांसप्लांट की सुरक्षा और सफलता की संभावना बढ़ती है."
क्या बोले डॉ. अनंत कुमार?
प्रो. (डॉ.) अनंत कुमार ने कहा, "इस फोर-वे किडनी एक्सचेंज की सफलता दिखाती है कि जब परिवार सहयोग करने के लिए तैयार हों और मेडिकल टीम पूरी योजना और सावधानी के साथ काम करे, तो ऐसे जटिल ट्रांसप्लांट भी सफल हो सकते हैं. इस प्रक्रिया में सभी मरीजों और डोनरों की सर्जरी एक साथ और सही समय पर करना बेहद जरूरी था ताकि किसी तरह की गलती न हो."
चारों मरीजों की समस्या क्या थी?
- नागालैंड: त्सुत्संगला पोंगेन, 34 साल: इन्हें दूसरी बार किडनी चाहिए थी. भाई किडनी देना चाहते थे, लेकिन शरीर मैच नहीं कर रहा था क्योंकि एंटीबॉडी बन गई थीं.
- जम्मू-कश्मीर: अब्दुल रऊफ भट, 47 साल: इन्हें भी दूसरी बार ट्रांसप्लांट होना था. बहन डोनर थीं, लेकिन इम्यूनोलॉजिकल मैच नहीं था.
- दिल्ली: शिवानी खुराना, 46 साल: ये अपने पति से किडनी नहीं ले सकती थीं. प्रेगनेंसी और ब्लड ट्रांसफ्यूजन की वजह से एंटीबॉडी बन गई थीं.
- बिहार: लॉ बहादुर, 34 साल: ये अपनी पत्नी से किडनी नहीं ले सकते थे क्योंकि दोनों का ब्लड ग्रुप अलग था.
किसने किसे किडनी दी?
जांच के बाद 4 परिवारों की किडनी आपस में बदली गई,
- दिल्ली के वरुण ने नागालैंड की त्सुत्संगला को किडनी दी.
- नागालैंड के एरिकोकबा ने बिहार के लॉ बहादुर को किडनी दी.
- बिहार की निधि ने जम्मू-कश्मीर के अब्दुल रऊफ को किडनी दी.
- जम्मू-कश्मीर की नाजनीन ने दिल्ली की शिवानी को किडनी दी.
कैसे सफल हुआ?
हर डोनर ने अपने मरीज को नहीं, बल्कि दूसरे परिवार के मैच होने वाले मरीज को किडनी दी. बदले में उनके अपने मरीज को भी सही डोनर से किडनी मिल गई. इसी वजह से चारों का ऑपरेशन सफल हुआ. अब सभी मरीज ठीक हैं और घर जा चुके हैं.
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