किडनी को शरीर का ऐसा अंग माना जाता है, जो लगातार बिना किसी शोर के अपना काम करता रहता है. यही वजह है कि किडनी से जुड़ी कई समस्याओं का शुरुआती चरण में पता नहीं चल पाता. खासकर युवाओं में यह धारणा आम है कि किडनी की जांच केवल उम्रदराज लोगों या पहले से बीमार मरीजों के लिए जरूरी होती है. हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ जोखिम वाले युवाओं में कम उम्र से ही किडनी की सेहत पर नजर रखना भविष्य में गंभीर जटिलताओं से बचाने में मदद कर सकता है.
किडनी की बीमारी अक्सर तब पता चलती है जब काफी नुकसान हो चुका होता है. इसलिए अगर आपको हाई BP, डायबिटीज, बार-बार UTI या किडनी स्टोन की समस्या है तो कम उम्र में भी जांच जरूरी हो सकती है.
डॉ. अश्विन माल्या, यूरो-ऑन्कोलॉजिस्ट एवं रोबोटिक सर्जन, सर गंगाराम अस्पताल के मुताबिक, 20 वर्ष की उम्र के बाद हर स्वस्थ व्यक्ति को नियमित रूप से किडनी के महंगे या विस्तृत टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन जिन लोगों में जोखिम कारक मौजूद हैं, उनके लिए समय रहते जांच महत्वपूर्ण हो सकती है. किडनी की बीमारी लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकती है और जब लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो चुकी हो सकती है.
किन युवाओं को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत ?
डॉ. माल्या बताते हैं कि जिन युवाओं को
- हाई ब्लड प्रेशर
- डायबिटीज
- बार-बार किडनी स्टोन
- बार-बार यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI)
की समस्या रहती है, उन्हें किडनी की जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
इसके अलावा परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास होने पर भी डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराना उचित है. भारत सरकार की CKD गाइडलाइन में भी डायबिटीज, हाइपरटेंशन, किडनी स्टोन, बार-बार UTI और पारिवारिक इतिहास को किडनी रोग के जोखिम कारकों में शामिल किया गया है.
कौन-सी जांच हो सकती है उपयोगी?
किडनी की शुरुआती जांच के लिए डॉक्टर व्यक्ति की उम्र, लक्षण और जोखिम के आधार पर अलग-अलग टेस्ट की सलाह दे सकते हैं. इनमें ब्लड प्रेशर की जांच, सीरम क्रिएटिनिन से eGFR का आकलन और यूरिन टेस्ट महत्वपूर्ण हो सकते हैं. यूरिन में प्रोटीन या एल्ब्यूमिन की मौजूदगी भी किडनी को होने वाले शुरुआती नुकसान का संकेत दे सकती है.
विशेषज्ञों के अनुसार, Urine Albumin-to-Creatinine Ratio (UACR) और eGFR किडनी की कार्यक्षमता और नुकसान के जोखिम को समझने में उपयोगी जांच हैं. मौजूदा क्लिनिकल गाइडलाइन में डायबिटीज, हाइपरटेंशन, पहले हुई acute kidney injury, किडनी स्टोन, संरचनात्मक किडनी समस्या या परिवार में गंभीर किडनी रोग के इतिहास वाले लोगों में CKD की जांच पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है.
युवाओं की लाइफस्टाइल भी बन सकती है जोखिम
डॉ. अश्विन माल्या के अनुसार, युवाओं में किडनी की सेहत को लेकर एक बड़ी समस्या यह है कि वे अक्सर अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. कम पानी पीना, अत्यधिक नमक वाला भोजन, लंबे समय तक बैठे रहना, अनियंत्रित वजन, ब्लड प्रेशर या शुगर की समस्या और डॉक्टर की सलाह के बिना बार-बार दवाएं लेना किडनी की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है.
डॉ. माल्या कहते हैं-
उन्होंने कहा कि कम उम्र में किडनी जांच का मतलब हर व्यक्ति को बीमारी का मरीज मानना नहीं है, बल्कि जोखिम वाले लोगों में बीमारी की शुरुआत को समय रहते पहचानना है. अगर किसी व्यक्ति के यूरिन में लगातार झाग, पेशाब में खून, पैरों या चेहरे पर सूजन, पेशाब की मात्रा में असामान्य बदलाव, बार-बार पेशाब में जलन या कमर के आसपास लगातार दर्द जैसी समस्या हो तो उसे खुद से इलाज करने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए.
कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?
अगर किसी युवा व्यक्ति को बार-बार किडनी स्टोन हो रहे हैं, यूरिन में खून आ रहा है, बार-बार UTI हो रहा है या ब्लड प्रेशर कम उम्र में बढ़ गया है, तो इसे सामान्य मानकर टालना ठीक नहीं है. ऐसे मामलों में डॉक्टर जरूरत के अनुसार यूरिन, ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड जैसी जांच करा सकते हैं.
किडनी की बीमारी से बचाव का सबसे बेहतर तरीका
डॉ. माल्या का कहना है कि किडनी की बीमारी से बचाव का सबसे बेहतर तरीका जोखिम कारकों को नियंत्रित करना और जरूरत पड़ने पर समय पर जांच कराना है.
- युवाओं को पर्याप्त पानी पीने
- नमक का सेवन सीमित रखने
- नियमित शारीरिक गतिविधि करने
- वजन और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने
- बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं करने पर ध्यान देना चाहिए.
इसलिए 20 की उम्र पार करना अपने आप में किडनी जांच की अनिवार्य उम्र नहीं है, लेकिन यदि जोखिम कारक या कोई संदिग्ध लक्षण मौजूद हैं तो कम उम्र से ही किडनी की सेहत पर ध्यान देना भविष्य के लिए एक समझदारी भरा कदम हो सकता है.
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