2026 फीफा विश्व कप में जापान की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. ग्रुप एफ के अपने आखिरी मुकाबले में जापान ने स्वीडन को 1-1 से बराबरी पर रोककर राउंड ऑफ 32 में जगह बना ली. इससे पहले उसने ट्यूनीशिया को 4-0 से हराया और नीदरलैंड्स जैसी मजबूत टीम को 2-2 की बराबरी पर रोका. ग्रुप में नीदरलैंड्स पहले और जापान दूसरे स्थान पर रहा. विश्व कप से पहले भी जापान ने अपने इरादे साफ कर दिए थे. दोस्ताना मुकाबलों में उसने स्कॉटलैंड और इंग्लैंड जैसी टीमों को हराया.
मोरियासु की रणनीति ने बदली टीम की पहचान
जापान की मौजूदा सफलता के पीछे मुख्य कोच हाजिमे मोरियासु की बड़ी भूमिका है. वर्ष 2018 से टीम की कमान संभाल रहे मोरियासु ने जापान को नई पहचान दी है. उनकी टीम अब केवल रक्षात्मक फुटबॉल तक सीमित न रहकर मौका मिलते ही तेज और संगठित आक्रमण भी करती है.
2022 विश्व कप में जर्मनी और स्पेन जैसी दिग्गज टीमों को हराने वाली रणनीति ने मोरियासु को दुनिया के सम्मानित कोचों में शामिल कर दिया. उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे किसी एक स्टार खिलाड़ी पर निर्भर नहीं रहते.
यूरोप में निखरी प्रतिभा, विश्व कप में दिख रहा असर
आज की जापानी टीम पहले की तुलना में कहीं अधिक अनुभवी है. इसकी बड़ी वजह यह है कि अधिकांश प्रमुख खिलाड़ी यूरोप की शीर्ष लीगों में खेलते हैं. ताकेफुसा कुबो स्पेन के रियल सोसिदाद के लिए खेलते हैं और उन्हें जापान का सबसे रचनात्मक खिलाड़ी माना जाता है. दाइची कामादा इंग्लैंड के क्रिस्टल पैलेस का हिस्सा हैं.
अयासे उएदा नीदरलैंड्स के फेयेनूर्ड क्लब के लिए खेलते हैं. ताकेहिरो तोमियासु ने इंग्लैंड के आर्सेनल में अपनी अलग पहचान बनाई है. हिरोकी इतो जर्मनी के बायर्न म्यूनिख से जुड़े हैं, जबकि रित्सु दोआन बुंडेसलीगा में लगातार प्रभाव छोड़ रहे हैं. यूरोप की शीर्ष लीगों में खेलने का फायदा विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में साफ दिखाई देता है.
J1 लीग: जापानी फुटबॉल की बढ़ती ताकत का राज
जापान की सफलता केवल यूरोप में खेलने वाले खिलाड़ियों की वजह से ही संभव नहीं हुई है. इसकी असली नींव उनकी घरेलू J1 लीग में दिखाई देती है. एशिया की सबसे व्यवस्थित और पेशेवर लीगों में शामिल J1 लीग ने जापानी फुटबॉल को नई दिशा दी है. यहां क्लब स्तर पर युवा खिलाड़ियों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है.
आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं, वैज्ञानिक फिटनेस कार्यक्रम और शानदार अकादमी सिस्टम इस लीग की पहचान हैं. यही कारण है कि जापान लगातार ऐसे खिलाड़ी तैयार कर रहा है जो बाद में यूरोप के बड़े क्लबों तक पहुंचते हैं. राष्ट्रीय टीम को भी इसी प्रक्रिया का लाभ मिलता है.
तीन दशक की योजना का नतीजा
जापान की मौजूदा स्थिति लगभग तीन दशक की योजना और निवेश का नतीजा है. 1993 में पेशेवर J लीग की शुरुआत के बाद जापान ने फुटबॉल को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना शुरू किया. स्कूलों, कॉलेजों और क्लबों के बीच मजबूत ढांचा तैयार किया गया. युवा खिलाड़ियों को शुरुआती उम्र से ही पेशेवर माहौल उपलब्ध कराया गया.
इसका असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा. 1998 में पहली बार विश्व कप खेलने वाला जापान आज लगातार विश्व कप में हिस्सा लेने वाली टीम बन चुका है. एशियाई फुटबॉल में उसकी स्थिति लंबे समय से मजबूत रही है और पिछले कुछ वर्षों में उसने विश्व स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाई है.
क्या जापान बन सकता है इस विश्व कप का सबसे बड़ा सरप्राइज?
ग्रुप चरण में ट्यूनीशिया पर 4-0 की धमाकेदार जीत और नीदरलैंड्स, स्वीडन जैसी तगड़ी टीमों के खिलाफ ड्रॉ ने साबित कर दिया है कि जापान इस विश्व कप में इतिहास रचने आया है. अब राउंड ऑफ 32 में उसके सामने पांच बार का विश्व चैंपियन ब्राजील होगा. कागज पर ब्राजील मजबूत टीम जरूर है, लेकिन जापान ने पिछले कुछ वर्षों में बार-बार साबित किया है कि वह बड़े मंच पर दिग्गज टीमों को चौंकाने का दम रखता है.
यह भी पढ़ें: पूरे इक्वाडोर में आज जीत की छुट्टी, फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप में बड़े उलटफेर का दिन- अमेरिका को तुर्किये ने और जर्मनी
यह भी पढ़ें: फीफा वर्ल्ड कप 2026: मेस्सी, रोनाल्डो से लेकर वोज़िन्हा, एलॉय रूम तक, उम्र को मात दे रहे धुरंधर
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं